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Thursday, 30 April 2026

भारत की विदेश नीति: रणनीतिक पीछे हटना या मजबूरी का खेल? – एक चिंतन

भारत की विदेश नीति: रणनीतिक पीछे हटना या मजबूरी का खेल? – एक चिंतन
-Friday World-April 30,2026 
                प्रतिकात्मक तस्वीर 
एक महान सभ्यता और उभरती हुई वैश्विक शक्ति आज अपनी लोकतांत्रिक गरिमा और रणनीतिक स्वायत्तता की अंतिम सांसें ले रही है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जो कदम उठाए, वे न केवल क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर कर रहे हैं बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय साख पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। चाबहार बंदरगाह से चुपचाप पीछे हटना, तजाकिस्तान के अयनी एयरबेस से निकल जाना और मध्य एशिया में बनाई गई दो दशकों की उपस्थिति का लगभग विलुप्त होना – ये घटनाएं संयोग नहीं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा लगती हैं।

 चाबहार: रणनीतिक गलियारे का सपना टूटा?

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए इंस्टसी (International North-South Transport Corridor) का महत्वपूर्ण द्वार था। ईरान के साथ समझौते के तहत भारत ने इस बंदरगाह को विकसित करने में भारी निवेश किया था, ताकि अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच आसान हो और पाकिस्तान-चीन के ग्वादर-सीपीईसी गलियारे को काउंटर किया जा सके। 

हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में यूएस सैंक्शंस वेवर की समय सीमा समाप्त होने के साथ भारत ने अपना स्टेक ईरानी इकाई को ट्रांसफर करने की तैयारी कर ली। अप्रैल 2026 में वेवर समाप्त होने के बाद भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) अपना होल्डिंग ईरानी कंपनी को बेचने की प्रक्रिया में है। यह कदम सैंक्शंस से बचने के लिए उठाया गया बताया जा रहा है, लेकिन आलोचक इसे रणनीतिक हार मान रहे हैं। चाबहार भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का प्रतीक था – अब यह अमेरिकी दबाव के आगे झुकने का उदाहरण बन गया है।

 अयनी एयरबेस: मध्य एशिया में खोया आधार

2002 से भारत तजाकिस्तान के अयनी एयरबेस को संचालित कर रहा था। यह भारत का एकमात्र पूर्ण विदेशी सैन्य अड्डा था, जिसने मध्य एशिया में रणनीतिक पहुंच, खुफिया जानकारी और क्षेत्रीय प्रभाव प्रदान किया। अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद भी यह आधार महत्वपूर्ण था। 

2022 में द्विपक्षीय समझौता समाप्त होने के बाद भारत ने धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति समाप्त कर दी। अक्टूबर 2025 तक यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। तजाकिस्तान ने लीज रिन्यू नहीं की और भारत को चुपचाप निकलना पड़ा। परिणामस्वरूप, पिछले 25-30 वर्षों में मध्य एशिया में बनाई गई कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक उपस्थिति काफी हद तक कमजोर हो गई है। रूस और चीन इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, जबकि भारत की पहुंच सीमित होती जा रही है।

ये दोनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। एक ओर चाबहार में अमेरिकी दबाव, दूसरी ओर मध्य एशिया में रूस-चीन की बढ़ती छाया – दोनों जगह भारत मजबूरन पीछे हट रहा है।

BRICS में भारत की स्थिति: अफवाहें या वास्तविक खतरा?

हाल ही में सोशल मीडिया और कुछ पाकिस्तानी हैंडल्स में यह अफवाह फैलाई गई कि BRICS से भारत को बाहर निकालकर पाकिस्तान को शामिल किया जा रहा है। हाल के BRICS डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर्स मीटिंग (अप्रैल 2026, नई दिल्ली) में ईरान युद्ध, इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर मतभेद हुए और कोई संयुक्त बयान नहीं जारी हो सका। भारत ने कुछ भाषा को नरम करने की कोशिश की, जिसका विरोध हुआ। 

वास्तविकता यह है कि भारत BRICS की फाउंडिंग सदस्य है और 2026 में उसकी प्रेसिडेंसी चल रही है। BRICS विस्तार पर आम सहमति जरूरी है और पाकिस्तान को शामिल करने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव या चर्चा नहीं है। भारत ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की सदस्यता का विरोध किया है, खासकर सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर। ये खबरें ज्यादातर प्रोपगैंडा लगती हैं, लेकिन वे भारत की बढ़ती अलगाव की भावना को जरूर दर्शाती हैं।

राहुल गांधी का “कम्प्रोमाइज्ड” आरोप

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को “व्यक्तिगत नीति” और “कम्प्रोमाइज्ड” बताया है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पता है कि मोदी क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। “अगर प्रधानमंत्री कम्प्रोमाइज्ड हैं, तो हमारी विदेश नीति भी कम्प्रोमाइज्ड है।” राहुल ने जोर दिया कि भारत की विदेश नीति जनता की सामूहिक इच्छा, इतिहास, भूगोल और सत्य-अहिंसा पर आधारित होनी चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति के दबाव या समझौते पर।

यह आरोप चाहे जितना राजनीतिक हो, लेकिन हाल की घटनाएं – चाबहार में अमेरिकी सैंक्शंस का असर, रूस से तेल खरीद पर वेवर की जरूरत, मध्य एशिया में पीछे हटना – इनमें स्वायत्तता की कमी दिखाई देती है।

क्या यह सरेंडर है या रणनीतिक पुनर्गठन?

भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था, परमाणु शक्ति और लोकतंत्र है। फिर भी, इन पीछे हटने के कदमों से लगता है कि हम बहु-संरेखण (multi-alignment) की नीति को सही से संतुलित नहीं कर पा रहे। QUAD और अमेरिका के साथ करीबी, रूस से ऊर्जा निर्भरता, चीन के साथ सीमा तनाव और ईरान के साथ पुराने संबंध – इनके बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो गया है।

मध्य एशिया में चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और रूस की पारंपरिक मौजूदगी ने भारत को किनारे कर दिया। चाबहार का मामला दिखाता है कि जब बड़े शक्तियों के बीच दबाव पड़ता है, तो छोटे-मोटे समझौते टिक नहीं पाते।

 आगे का रास्ता क्या हो?

1. स्वायत्त विदेश नीति की पुनर्स्थापना: निर्णय केवल दबाव में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित में लिए जाएं।

2. मध्य एशिया में नई रणनीति: सैन्य अड्डों के बजाय आर्थिक निवेश, कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक संबंधों पर जोर।

3. BRICS और अन्य मंचों में सक्रिय भूमिका: भारत को अपनी प्रेसिडेंसी 2026 में “Humanity First” थीम को मजबूती से लागू करना चाहिए, लेकिन बिना किसी ब्लॉक का गुलाम बने।

4. आंतरिक मजबूती: रक्षा बजट, तकनीकी आत्मनिर्भरता और कूटनीतिक क्षमता बढ़ाना जरूरी है ताकि हर मोर्चे पर “कम्प्रोमाइज” न करना पड़े।

भारत की साख केवल बंदरगाहों या एयरबेस से नहीं, बल्कि उसकी दृढ़ता और दूरदर्शिता से बनती है। अगर हम लगातार पीछे हटते रहे, तो वैश्विक मंच पर हमारा वजन कम होता जाएगा। समय है कि हम “सुरेंडर” की छवि को तोड़ें और एक सशक्त, स्वतंत्र भारत की छवि को फिर से स्थापित करें।

: राहुल गांधी ने जो कहा, वह पूरी तरह सही नहीं हो सकता, लेकिन सवाल जरूर वैध है। क्या हमारी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रही है या केवल तात्कालिक दबावों से बच रही है? एक महान देश को बैइज्जती की सांसें नहीं, बल्कि गरिमा और शक्ति की सांसें लेनी चाहिए। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 30,2026