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Monday, 13 April 2026

नीतीश कुमार के इस्तीफे का अनोखा इतिहास: हर बार गद्दी छोड़कर वापस लौटना, अब क्या ये प्रधानमंत्री की राह का मास्टर स्ट्रोक है?

नीतीश कुमार के इस्तीफे का अनोखा इतिहास: हर बार गद्दी छोड़कर वापस लौटना, अब क्या ये प्रधानमंत्री की राह का मास्टर स्ट्रोक है?
-Friday World-April 14,2026 
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम सुनते ही सबसे पहले याद आता है—इस्तीफा। वो भी ऐसा इस्तीफा जो हमेशा "अस्थायी" साबित होता रहा। जैसे कोई नाटक का हीरो हो, जो स्टेज छोड़कर जाता है, लेकिन बैकस्टेज से फिर से एंट्री मारकर तालियां बटोर लेता है। अब जब बिहार के इस भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने राज्‍यसभा का रास्ता पकड़ा है, तो सवाल उठ रहा है—क्या ये आखिरी इस्तीफा साधारण है, या दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने का चतुराना **मास्टर स्ट्रोक**? सिर्फ दो कदम दूर—राज्‍यसभा से संसद, और फिर...? आइए, उनके इस्तीफों की पूरी व्यंग्यात्मक यात्रा पर नजर डालें।

 पहला कदम: 2000 का सात दिन का सपना
साल 2000। नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। NDA के समर्थन से गद्दी संभाली, लेकिन फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित नहीं कर पाए। सिर्फ 7 दिन बाद इस्तीफा। वो भी तब जब लालू-राबड़ी का दौर चल रहा था। राजनीतिक विश्लेषक मुस्कुराते हुए कहते थे— "नीतीश जी ने गद्दी देख ली, लेकिन बैठने का समय नहीं मिला।" ये इस्तीफा न तो दबाव में था, न गठबंधन टूटने का। बस, एक छोटा सा टेस्ट ड्राइव। लेकिन इससे सीख मिली—अगली बार तैयारी के साथ आना है। व्यंग्य की बात ये कि सात दिन में भी उन्होंने "सुशासन" का बीज बो दिया था, जो बाद में पूरे बिहार को हरा-भरा करने वाला था (कहने को)।

 2005-2014: लंबा राज, लेकिन 2014 में अचानक विदाई
2005 में असली खेल शुरू हुआ। NDA के साथ मिलकर नीतीश ने बिहार की सत्ता संभाली। 2010 में भारी बहुमत के साथ वापसी। विकास, सड़कें, बिजली—सुशासन बाबू की छवि बन गई। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जब NDA की करारी हार हुई (खासकर मोदी लहर के बावजूद बिहार में), तो नीतीश ने 17 मई 2014 को इस्तीफा दे दिया। जितन राम मांझी को गद्दी सौंपी। 

कहा गया— "जनता ने मुझे सजा दी, मैं स्वीकार करता हूं।" लेकिन असल में ये एक स्मार्ट मूव था। मांझी को आगे रखकर नीतीश ने खुद को "पीड़ित" नेता के रूप में पेश किया। कुछ महीनों बाद मांझी के साथ मनमुटाव, और फरवरी 2015 में नीतीश वापस। ठीक उसी दिन शपथ! व्यंग्य ये कि इस्तीफा देते वक्त उन्होंने कहा था "मैं दूर रहूंगा", लेकिन दूर रहना सिर्फ़ कुछ महीनों का था। बिहार की जनता ने सोचा— "ये तो रणनीति है, इस्तीफा नहीं।"

 2017: महागठबंधन से ब्रेकअप, फिर तुरंत NDA वापसी
2015 में RJD-कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2017 में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। नीतीश ने 26 जुलाई 2017 को इस्तीफा दे दिया। गठबंधन टूटा, और उसी दिन शाम को NDA के साथ वापस शपथ। 

ये उनका सबसे तेज़ "उलटफेर" था। सुबह महागठबंधन, शाम NDA। राजनीतिक पंडितों ने कहा— "नीतीश जी का इस्तीफा तो बस गठबंधन बदलने का फॉर्मेलिटी है।" व्यंग्यात्मक रूप से देखें तो ये जैसे शादी करके तलाक लेना और उसी दिन दूसरी शादी कर लेना। बिहार की जनता हैरान— "क्या ये नेता हैं या कोयला खदान, जो बार-बार मालिक बदलते रहते हैं?"

 2020: फिर वही ड्रामा, लेकिन छोटा
2020 विधानसभा चुनाव के बाद NDA की जीत हुई। नीतीश फिर CM बने। लेकिन अगस्त 2020 में अचानक इस्तीफा। वजह? कुछ कहते हैं आंतरिक कलह, कुछ कहते हैं रणनीतिक दबाव। लेकिन कुछ घंटों बाद ही वापस शपथ, नये डिप्टी CM के साथ। 

ये इस्तीफा सबसे छोटा और सबसे रहस्यमयी था। जैसे कोई फिल्म में "क्लिफहैंगर" सीन डालकर ब्रेक लेना, और ब्रेक के बाद कहना— "अरे, मैं तो यहीं था।" व्यंग्य की पराकाष्ठा ये कि हर बार इस्तीफा "सिद्धांत" के नाम पर दिया जाता, लेकिन वापसी "राष्ट्रीय हित" के नाम पर।

 2022: सबसे बड़ा उलटफेर
9 अगस्त 2022। नीतीश ने NDA छोड़ा, महागठबंधन में वापसी की। इस्तीफा दिया, और उसी दिन RJD-कांग्रेस के साथ नई सरकार बनाई। तेजस्वी डिप्टी CM बने। 

इस बार ड्रामा लंबा चला। नीतीश ने कहा— "BJP के साथ नहीं रह सकता।" लेकिन 2024-25 तक फिर से NDA में वापसी के संकेत। ये इस्तीफा सबसे ज्यादा चर्चित रहा क्योंकि इसमें "सिद्धांत" और "मौका" दोनों का मिश्रण था। व्यंग्यात्मक नजरिये से— नीतीश जी जैसे वो दोस्त हैं जो हर पार्टी में जाते हैं, लेकिन कहते हैं "मैं तो बस सुशासन के लिए हूं।"

 2025-2026: दसवीं बार CM, फिर राज्‍यसभा का रास्ता
2025 चुनाव में NDA की जीत के बाद नीतीश 20 नवंबर 2025 को दसवीं बार मुख्यमंत्री बने। रिकॉर्ड! लेकिन मार्च 2025 में अचानक ऐलान— राज्‍यसभा चुनाव लड़ेंगे। मार्च 2026 में नामांकन, अप्रैल 2026 में विधान परिषद से इस्तीफा, और अब CM पद से इस्तीफा (14 अप्रैल 2026 के आसपास)। 

ये इस्तीफा सबसे अलग है। पहले वाले इस्तीफे गद्दी बचाने या बदलने के लिए थे। ये वाला गद्दी छोड़कर ऊंची छलांग लगाने का। नीतीश ने खुद कहा— "मैं हमेशा बिहार और संसद दोनों में सेवा करना चाहता था।" लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है— क्या ये दिल्ली की तैयारी है? राज्‍यसभा से संसद पहुंचना, फिर राष्ट्रीय भूमिका? "सिर्फ दो कदम दूर" वाली बात यहीं से आती है।

  सार: इस्तीफा उनका सबसे बड़ा हथियार
नीतीश कुमार ने जितनी बार इस्तीफा दिया, उतनी बार वापस लौटे। 2000 का 7 दिन, 2014 का मांझी प्रयोग, 2017 का एक दिन का ब्रेक, 2020 का छोटा ड्रामा, 2022 का बड़ा स्विच, और अब 2026 का "अंतिम" (क्या वाकई अंतिम?)। हर बार मीडिया ने सुर्खियां बनाईं— "नीतीश का इस्तीफा!", "गठबंधन टूटा!", "सुशासन बाबू का त्याग!" लेकिन असल में ये सब रणनीति का हिस्सा लगता है। 

व्यंग्य ये है कि बिहार की जनता हर बार सोचती है— "इस बार सच में चले गए।" लेकिन नीतीश लौट आते हैं, जैसे कोई बॉलिवुड हीरो जो मरने का नाटक करता है और फिर अगले सीन में स्वस्थ दिखता है। उनके इस्तीफे कभी दबाव में नहीं, कभी "सिद्धांत" के नाम पर, लेकिन हमेशा फायदेमंद। 

अब सवाल ये कि आखिरी वाला इस्तीफा क्या वाकई आखिरी है? या ये प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का मास्टर स्ट्रोक? राज्‍यसभा में पहुंचकर राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलना, NDA के अंदर अपनी अहमियत बढ़ाना, और फिर... भविष्य कुछ भी हो सकता है। बिहार ने देखा है नीतीश का "इस्तीफा राज", अब देश देखने को तैयार हो?

नीतीश कुमार की ये यात्रा सिखाती है— राजनीति में इस्तीफा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे मजबूत चाल हो सकती है। बिहार के लोग कहते हैं— "नीतीश जी का इस्तीफा देखकर लगता है जैसे ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ रही हो, लेकिन अगले स्टेशन पर फिर वही इंजन।" 

चाहे जो हो, एक बात तय है— नीतीश का राजनीतिक सफर अभी खत्म नहीं हुआ। बस, स्टेशन बदला है। दिल्ली का प्लेटफॉर्म अब इंतजार कर रहा है। क्या ये दो कदम आगे बढ़ने का समय है? बिहार की राजनीति की तरह, जवाब भी "इस्तीफा" जैसा अनिश्चित ही रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 14,2026