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Sunday, 19 April 2026

मणिपुर: बच्‍चों की निर्दोष मौत ने फिर भड़काई हिंसा की लपटें एक राज्य जो शांति की आस में सिसक रहा है

मणिपुर: बच्‍चों की निर्दोष मौत ने फिर भड़काई हिंसा की लपटें एक राज्य जो शांति की आस में सिसक रहा है-Friday World-April 20,2026 
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में एक बार फिर से अशांति की काली छाया घिर गई है। कई महीनों की मेहनत से धीरे-धीरे लौट रही शांति की किरणें, अप्रैल 2026 की शुरुआत में एक भयानक बम विस्फोट के साथ बुझ गईं। दो निर्दोष नाबालिग बच्चों की मौत और उनकी मां की गंभीर हालत ने पूरे इम्फाल घाटी को आग की लपटों में झोंक दिया। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए, मशाल जुलूस निकाले गए, और कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक रूप ले बैठे। यह घटना न सिर्फ एक परिवार की तबाही है, बल्कि पूरे राज्य के घावों को फिर से हरा कर देने वाली सच्चाई है।

 7 अप्रैल 2026: वो रात जो भूल नहीं पाएगा मणिपुर

7 अप्रैल की आधी रात, बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी (Tronglaobi) अवांग लीकाई गांव में एक साधारण परिवार सो रहा था। घर के मालिक ओइनाम मंगलंगबा सिंह सुरक्षा बलों से जुड़े थे। अचानक एक तेज विस्फोट ने पूरे इलाके को हिला दिया। बम के छर्रे घर की दीवारों को भेदते हुए बच्चों के बिस्तर तक पहुंच गए। 

पांच साल के ओइनाम टॉमथिन मौके पर ही शहीद हो गए। उनकी मात्र पांच महीने की बहन ओइनाम लैसाना (या याइसाना) भी घायल हुईं और बाद में उनकी मौत हो गई। मां ओइनाम बिनीता (35 वर्ष) गंभीर रूप से घायल होकर अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही हैं। यह हमला एक सुरक्षा कर्मी के परिवार पर हुआ, जो पहले से ही राज्य की अशांति से जूझ रहा था।
स्थानीय लोगों और मैतेई संगठनों ने तुरंत इसे कुकी-जो उग्रवादियों का हमला बताया। उनका आरोप था कि बम “पहाड़ी इलाकों” से आया। हालांकि कुकी संगठनों ने किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया। सुरक्षा बलों ने मौके से unexploded RPG और IED बरामद किए, जिससे हमले की गंभीरता साफ झलकती है।

 आक्रोश की लहर: प्रदर्शन से हिंसा तक

घटना की खबर फैलते ही बिष्णुपुर में गुस्सा फूट पड़ा। सैकड़ों लोग CRPF कैंप पर टूट पड़े, वाहनों को आग के हवाले कर दिया। सुरक्षा बलों ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए गोली चलाई, जिसमें दो प्रदर्शनकारी मौके पर मारे गए और कई घायल हुए। कुल मिलाकर उस दिन चार मौतें दर्ज की गईं — दो बच्चे बम से, और दो प्रदर्शनकारी पुलिस फायरिंग से।

इसके बाद इम्फाल घाटी (इम्फाल वेस्ट, बिष्णुपुर, काकचिंग आदि) में लगातार मशाल जुलूस (torchlight rallies) शुरू हो गए। महिलाओं की बड़ी तादाद में भागीदारी रही — मैरा पाइबी समूह और अन्य स्थानीय संगठनों ने मोर्चा संभाला। **कुकी-मैतेई जातीय हिंसा** की पुरानी यादें ताजा हो गईं, और लोग एक बार फिर सड़कों पर उतर आए।

19 अप्रैल 2026 (रविवार) की रात को तो माहौल और गर्म हो गया। हजारों लोग कई जिलों में सड़कों पर थे। कुछ जगहों पर पत्थरबाजी, पेट्रोल बम और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। सुरक्षा बलों ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और कभी-कभी गोलीबारी का सहारा लिया। इम्फाल वेस्ट के सागोलबंद, कोइरेंगेई, उरीपोक और काकचिंग जैसे इलाकों में तनाव चरम पर रहा।

 वर्तमान हालात: शटडाउन, इंटरनेट बंदी और तनाव

20 अप्रैल 2026 तक की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है:
- इम्फाल घाटी में 5 दिनों का शटडाउन (19 अप्रैल से शुरू) चल रहा है, जिससे स्कूल, बाजार, परिवहन सब ठप हैं।
- मोबाइल इंटरनेट और कुछ जगहों पर ब्रॉडबैंड सेवाएं निलंबित हैं, ताकि अफवाहें न फैलें।
- सुरक्षा बलों ने कई गिरफ्तारियां की हैं। पत्थरबाजी करने वालों और सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने वालों (अराम्बाई टेंग्गोल से जुड़े कुछ लोगों सहित) को हिरासत में लिया गया है।
- मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह (Yumnam Khemchand Singh) ने हाई-लेवल मीटिंग की, सुरक्षा बलों के साथ समन्वय बढ़ाया और इलाकों का दौरा किया। उन्होंने हमले को “बार्बरिक एक्ट” बताया जो राज्य सरकार को अस्थिर करने की साजिश है। मामले को NIA को सौंप दिया गया है।

सरकार ने शांति की अपील की है और चेतावनी दी कि हिंसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।

 गहरी पृष्ठभूमि: 2023 से चला आ रहा चक्रव्यूह

यह ताजा हिंसा 2023 से शुरू हुई मैतेई-कुकी जातीय संघर्ष की निरंतरता है। उस साल मई में आरक्षण, भूमि अधिकार और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर हिंसा भड़की। सैकड़ों लोग मारे गए, 60,000 से ज्यादा विस्थापित हुए, गांव जलाए गए और चर्च-मंदिर दोनों तरफ निशाना बने।

2026 की शुरुआत में नई सरकार (मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह के नेतृत्व में) बनी थी। फरवरी में राष्ट्रपति शासन हटा और शांति प्रयास शुरू हुए — दोनों समुदायों के बीच संवाद, विस्थापितों की वापसी की कोशिशें। मार्च में पहली बार तीन साल बाद सीधा संवाद हुआ। लेकिन ट्रोंगलाओबी का बम विस्फोट इन प्रयासों पर पानी फेर गया।

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें:
- बच्चों के हत्यारों को तुरंत गिरफ्तार कर सजा देना
- राष्ट्रीय जनगणना से पहले **NRC** (National Register of Citizens) लागू करना
- राष्ट्रीय राजमार्गों (खासकर NH-37, NH-202) पर सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना
- नार्को-टेररिज्म और अवैध हथियारों पर सख्त कार्रवाई
- विस्थापित परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास और घायलों को न्याय

क्या कहती है सच्चाई?

यह घटना किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे मणिपुर की त्रासदी है। निर्दोष बच्चे — जो न जाति जानते थे, न राजनीति — सिर्फ सोते हुए मारे गए। उनकी मौत ने दिखाया कि कितना गहरा है अविश्वास का जहर। मैतेई बहुल घाटी में आक्रोश स्वाभाविक है, लेकिन हिंसा का रास्ता कभी समाधान नहीं हो सकता। कुकी पक्ष का इनकार भी जांच का विषय है — NIA की जांच बिना पक्षपात के होनी चाहिए।

मणिपुर की समस्या जटिल है: भूमि, पहचान, संसाधन, सशस्त्र समूह और केंद्र-राज्य समन्वय की कमी। 2023-2026 के बीच 260 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। हर नई घटना पुराने घावों को खोल देती है।

आगे का रास्ता: संवाद या फिर खून-खराबा?

मणिपुर को अब संवाद की जरूरत है, न कि बंदूकों की। मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने शांति की अपील की है — यह अपील सिर्फ शब्दों तक नहीं रहनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी मजबूत कदम उठाने चाहिए: अतिरिक्त सुरक्षा बल, विकास योजनाएं, युवाओं को रोजगार और दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाली।

स्थानीय संगठनों — COCOMI, अराम्बाई टेंग्गोल, मैरा पाइबी आदि — को भी समझना होगा कि हिंसा से सिर्फ विस्थापन और मौतें बढ़ेंगी। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, व्यापार ठप है, पर्यटन खत्म — यह चक्र कब तक चलेगा?

मणिपुर भारत का अभिन्न अंग है। यहां की शांति न सिर्फ उत्तर-पूर्व की, बल्कि पूरे देश की स्थिरता से जुड़ी है। ट्रोंगलाओबी के दो मासूम बच्चों की आत्मा को न्याय तभी मिलेगा, जब राज्य में सच्ची शांति लौटेगी।

मणिपुर फिर खड़ा होगा — लेकिन तभी, जब उसके लोग एक-दूसरे का हाथ थामेंगे, न कि हथियार।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 20,2026