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Friday, 17 April 2026

राहुल गांधी के खिलाफ दोहरी नागरिकता मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: लखनऊ बेंच ने FIR दर्ज करने का निर्देश दिया

राहुल गांधी के खिलाफ दोहरी नागरिकता मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: लखनऊ बेंच ने FIR दर्ज करने का निर्देश दिया
-Friday World-April 17,2026
17 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश की राजनीतिक और कानूनी गलियारों में एक बड़ा भूचाल आया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ कथित दोहरी नागरिकता (dual citizenship) के मामले में FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने इस ऐतिहासिक फैसले में निचली अदालत के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें जनवरी 2026 में FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था।

यह फैसला न केवल राहुल गांधी के राजनीतिक करियर पर सवाल उठाता है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में नागरिकता, निष्ठा और कानूनी जवाबदेही के मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला खड़ा करता है।

मामला क्या है?

मामला काफी पुराना है, लेकिन 2026 में यह नया रूप ले चुका था। कर्नाटक के भाजपा कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे ब्रिटिश नागरिकता रखते हैं और भारत की संसद में सांसद के रूप में बैठकर संवैधानिक पद की शपथ ले रहे हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि राहुल गांधी ने ब्रिटेन में कंपनी रजिस्ट्रेशन और अन्य दस्तावेजों में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया है।

इसके आधार पर उन्होंने रायबरेली के कोतवाली थाने में FIR दर्ज करने की मांग की थी। आरोपों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराएं, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम, विदेशी अधिनियम आदि शामिल थे।

जनवरी 2026 में लखनऊ की विशेष सांसद/विधायक अदालत (ACJM) ने याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि नागरिकता का मुद्दा तय करना उसकी अधिकारिता में नहीं आता। याचिकाकर्ता ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चुनौती दी।

 अदालत का फैसला: क्या कहा जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने?

17 अप्रैल 2026 को जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने विस्तृत सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए कि राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज की जाए।

अदालत ने प्रथम दृष्टया (prima facie) मामले में पर्याप्त आधार पाया। साथ ही राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि जांच को केंद्रीय एजेंसी या CBI को सौंपा जा सकता है, क्योंकि मामला संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व का है।

यह आदेश राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और 2024 के बाद कांग्रेस की प्रमुख चेहरा बने हुए हैं।

दोहरी नागरिकता का विवाद: तथ्य और आरोप

भारतीय संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति जो विदेशी नागरिकता रखता है, वह भारत की संसद या विधानसभा का सदस्य नहीं बन सकता। प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 5 और 9 के तहत विदेशी नागरिकता रखने वाला व्यक्ति अयोग्य माना जाता है।

राहुल गांधी पर आरोपों की जड़ 2019-2020 के कुछ दस्तावेजों में बताई जाती है, जिसमें ब्रिटेन में उनकी कंपनी से जुड़े रिकॉर्ड में ब्रिटिश एड्रेस और नागरिकता का जिक्र था। विग्नेश शिशिर ने दावा किया कि राहुल गांधी ने ब्रिटिश पासपोर्ट रखा हुआ है और भारत में रहकर राजनीति कर रहे हैं।

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने इन आरोपों को लगातार **राजनीतिक साजिश** बताया है। उन्होंने कहा है कि वे केवल भारतीय नागरिक हैं और सभी आरोप बेबुनियाद हैं। कांग्रेस का तर्क है कि यह मुद्दा पुराना है और बार-बार उठाया जाता है ताकि विपक्ष को बदनाम किया जा सके।

 कानूनी प्रक्रिया अब क्या होगी?

FIR दर्ज होने के बाद पुलिस को प्रारंभिक जांच करनी होगी। अगर प्रथम दृष्टया सबूत मिलते हैं तो आगे की जांच होगी। अदालत ने केंद्र सरकार या CBI को जांच सौंपने की अनुमति दी है, इसलिए यह मामला जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच सकता है।

राहुल गांधी की ओर से इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की संभावना है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिकता जैसे जटिल मुद्दे में उच्चतम न्यायालय अंतिम फैसला करेगा।

 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

- भाजपा ने इस फैसले का स्वागत किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कानून सबके लिए बराबर है और अगर आरोप सही साबित होते हैं तो जवाबदेही तय होनी चाहिए।
- कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है। पार्टी प्रवक्ताओं ने कहा कि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में अदालत का इस्तेमाल करके विपक्ष को परेशान किया जा रहा है।
- अन्य विपक्षी दलों ने भी चिंता जताई है कि ऐसे मामलों से लोकतंत्र की संस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है।

 क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?

कई वकीलों का मत है कि उच्च न्यायालय का यह आदेश प्रक्रियात्मक रूप से सही है। अगर निचली अदालत ने अधिकारिता से इनकार किया तो हाईकोर्ट उसे सही ठहरा या गलत साबित कर सकता है। लेकिन अंतिम फैसला सबूतों पर निर्भर करेगा।

नागरिकता विवाद में विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे। अगर राहुल गांधी ने कभी ब्रिटिश नागरिकता ली थी और उसे त्यागा नहीं है, तो यह गंभीर मामला बन सकता है। वहीं अगर दस्तावेज गलत तरीके से पेश किए गए हैं, तो याचिकाकर्ता पर भी उल्टा मुकदमा हो सकता है।

 बड़ा सवाल: लोकतंत्र में जवाबदेही

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है। यह सवाल उठाता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में सांसदों और नेताओं की नागरिकता की जांच कैसे हो? क्या चुनाव आयोग को नामांकन के समय अधिक सख्त दस्तावेजी जांच करनी चाहिए? क्या विदेशी संपत्ति और नागरिकता से जुड़े मामलों में स्वतः जांच होनी चाहिए?

राहुल गांधी पहले भी कई कानूनी मामलों (जैसे मानहानि केस) से गुजर चुके हैं। इस फैसले से उनकी छवि पर असर पड़ सकता है, लेकिन साथ ही यह उन्हें सहानुभूति भी दिला सकता है।

 आगे की राह

अब उत्तर प्रदेश पुलिस को जल्द FIR दर्ज करनी होगी। जांच शुरू होने के बाद राहुल गांधी को समन मिल सकता है। अगर मामला CBI को जाता है तो जांच लंबी चलेगी।

देश इस फैसले को बड़े ध्यान से देख रहा है। यह सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता, संवैधानिक निष्ठा और न्यायिक स्वतंत्रता की परीक्षा भी है।

17 अप्रैल 2026 का यह फैसला भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। चाहे आरोप सही हों या राजनीतिक प्रेरित, कानून की प्रक्रिया अपने रास्ते पर चलेगी। लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है – यह सिद्धांत आज फिर से परीक्षित होगा।

देशवासी अब इंतजार कर रहे हैं कि आगे क्या होता है – FIR के बाद जांच, सबूत, अदालती सुनवाई और अंतिम फैसला। क्या राहुल गांधी इस विवाद से उबर पाएंगे या यह उनके राजनीतिक सफर में नया मोड़ साबित होगा?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 17,2026