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Tuesday, 26 May 2026

ईरान की स्पष्ट और साफ नीति: प्रतिरोध की धुरी को मजबूत बनाए रखना ईरान का अटूट समर्थन — हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह के साथ”

ईरान की स्पष्ट और साफ नीति: प्रतिरोध की धुरी को मजबूत बनाए रखना ईरान का अटूट समर्थन — हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह के साथ”
-Friday World-26 May 2026
वॉशिंगटन के साथ कूटनीतिक वार्ता के बावजूद तेहरान ने एक बार फिर साफ संदेश दिया है — फिलिस्तीन, लेबनान और यमन के प्रतिरोधी शक्तियों के साथ उसका समर्थन कभी कमजोर नहीं पड़ेगा।

ईरान की विदेश नीति को अक्सर “दोहरी” कहकर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के हालिया पत्र ने दुनिया को एक बार फिर याद दिला दिया कि तेहरान की नीति पूरी तरह स्पष्ट, सुसंगत और सिद्धांत-आधारित है। 

अराघची ने हिज्बुल्लाह के महासचिव नईम कासिम और लेबनानी संसद अध्यक्ष नबीह बेरी को लिखे पत्र में कहा:

> “हम लेबनान की स्वतंत्रता, संप्रभुता और एकता का समर्थन जारी रखेंगे, और ज़ायोनी कब्जे के खिलाफ लेबनानी जनता के प्रतिरोध का भी समर्थन करते रहेंगे।”

यह कोई नया मोड़ नहीं, बल्कि ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से चली आ रही “प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance) की निरंतरता है। हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह (हूती) — इन तीनों को ईरान खुलेआम और बिना किसी हिचकिचाहट के समर्थन देता रहा है और भविष्य में भी देता रहेगा।

 ईरान की साफ और सुसंगत नीति

ईरान कभी भी अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को छोड़ने या कमजोर करने की बात नहीं करता। जबकि अमेरिका के साथ परमाणु मुद्दे, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय स्थिरता पर वार्ता चल रही है, तेहरान ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रतिरोधी शक्तियों के समर्थन पर कोई समझौता नहीं होगा।

यह नीति व्यावहारिक और रणनीतिक दोनों है:

- सिद्धांतिक आधार: फिलिस्तीन मुद्दे को ईरान अपनी विदेश नीति का नैतिक केंद्र मानता है। “ज़ायोनी शासन” को वह अवैध कब्जा मानता है और इसका विरोध उसकी क्रांतिकारी पहचान का हिस्सा है।

- रणनीतिक गहराई: हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह ईरान को इजरायल के खिलाफ बहु-मोर्ची रणनीति देते हैं। इन समूहों के बिना ईरान की क्षेत्रीय प्रभाव-क्षमता काफी सीमित हो जाएगी।

 हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह — ईरान के तीन मजबूत स्तंभ

1. हिज्बुल्लाह (लेबनान)
1982 में स्थापित हिज्बुल्लाह ईरान का सबसे पुराना और सबसे प्रभावशाली सहयोगी है। ईरान इसे प्रशिक्षण, हथियार, तकनीकी सहयोग और वित्तीय सहायता प्रदान करता है। 2000 में इजरायल को दक्षिण लेबनान से पीछे हटने पर मजबूर करने में हिज्बुल्लाह की भूमिका ऐतिहासिक रही। अराघची का पत्र इसी प्रतिबद्धता को दोहराता है।

2. हमास (फिलिस्तीन)
ईरान हमास को राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक समर्थन देता रहा है। अक्टूबर 2023 के बाद से हमास के साथ ईरान का समन्वय और मजबूत हुआ है। तेहरान इसे “फिलिस्तीनी प्रतिरोध” का वैध हिस्सा मानता है।

3. अंसारुल्लाह (यमन — हूती)
लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों पर हमले और सऊदी गठबंधन के खिलाफ संघर्ष में अंसारुल्लाह ने अपनी क्षमता साबित की है। ईरान इसे भी रणनीतिक समर्थन दे रहा है, जिससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो रहा है।

ये तीनों समूह ईरान के लिए “रक्षा की पहली पंक्ति” की भूमिका निभाते हैं।

 वॉशिंगटन के साथ वार्ता और प्रतिरोध की नीति

ईरान अमेरिका के साथ बातचीत को “रणनीतिक आवश्यकता” मानता है। वह आर्थिक राहत, तेल निर्यात और परमाणु कार्यक्रम पर कुछ छूट चाहता है। लेकिन तेहरान ने बार-बार कहा है कि:

- क्षेत्रीय प्रतिरोधी समूहों को कमजोर करने की कोई शर्त स्वीकार नहीं की जाएगी।

- “प्रतिरोध की धुरी” ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति का अटूट अंग है।

अब्बास अराघची का पत्र इसी स्पष्ट संदेश का हिस्सा है। जब कूटनीतिक चैनल खुले हैं, उसी समय प्रतिरोधी सहयोगियों को आश्वासन देना ईरान की परिपक्व और आत्मविश्वासपूर्ण नीति को दर्शाता है।

 ऐतिहासिक और वैचारिक आधार

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद इमाम खुमैनी ने “मजलूमों का समर्थन” को ईरान की विदेश नीति का मूलमंत्र बनाया। आयतुल्लाह खामenei ने इसे और मजबूत किया। ईरान के अनुसार:

- फिलिस्तीन, लेबनान, यमन और इराक में चल रहा संघर्ष “अमेरिकी-ज़ायोनी साम्राज्यवाद” के खिलाफ है।

- इन आंदोलनों को समर्थन देना ईरान का नैतिक कर्तव्य है।

यह नीति पिछले 45 वर्षों से लगातार बनी हुई है। चाहे JCPOA समझौता हो या ट्रंप प्रशासन के साथ तनाव, ईरान ने कभी भी अपने सहयोगियों को पीछे नहीं छोड़ा।

 क्षेत्रीय प्रभाव और भविष्य

ईरान की इस स्पष्ट नीति के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं:

- लेबनान: हिज्बुल्लाह मजबूत रहने से लेबनान की राजनीति में शिया प्रभाव बरकरार रहेगा।

- यमन: अंसारुल्लाह के कारण लाल सागर में नौवहन पर दबाव बना रहेगा।

- फिलिस्तीन: हमास को समर्थन जारी रहने से इजरायल पर सैन्य और राजनीतिक दबाव बरकरार रहेगा।

- ईरान की सुरक्षा: ये समूह ईरान को प्रत्यक्ष टकराव से बचाते हुए इजरायल को व्यस्त रखते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ देश इसे “डेस्टेबलाइजिंग” मानते हैं, लेकिन ईरान के समर्थक इसे “न्यायपूर्ण प्रतिरोध” कहते हैं।


ईरान की नीति दोहरी नहीं, बल्कि **स्पष्ट, सुसंगत और सिद्धांत-आधारित** है। अब्बास अराघची का पत्र इस सच्चाई को एक बार फिर रेखांकित करता है कि वॉशिंगटन के साथ जितनी भी वार्ताएं हों, हमास, हिज्बुल्लाह और अंसारुल्लाह के साथ ईरान का समर्थन अटूट रहेगा।

यह नीति तेहरान को क्षेत्रीय महाशक्ति बनाती है और उसे अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में मदद करती है। भविष्य में भी ईरान “प्रतिरोध की धुरी” को और मजबूत बनाने की दिशा में काम करता रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-26 May 2026