दुनिया एक बार फिर से बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। ईरान पर हमला करके कुछ ताकतें सोच रही थीं कि बगदाद और त्रिपोली की तरह तेहरान भी आसानी से "हलवा" बन जाएगा। पिट्ठू शासक बिठा दिए जाएंगे, तेल की बंदरबांट हो जाएगी और पश्चिमी हितों की रक्षा का नया अध्याय शुरू हो जाएगा। लेकिन 2025-26 का यह संघर्ष उस सोच को चूर-चूर कर रहा है। यह युद्ध न सिर्फ ईरान की संप्रभुता की लड़ाई है, बल्कि एक पुरानी विश्व व्यवस्था के अंत और नई शक्तियों के उदय का प्रतीक बन गया है।
साम्राज्यवादी भ्रम का अंत
इराक और लीबिया में जो हुआ, उसे ईरान पर दोहराने की कोशिश की गई। सद्दाम और गद्दाफी के बाद ईरान को भी कमजोर समझा गया। लेकिन ईरानी समाज, उसकी प्राचीन सभ्यता, मिसाइल तकनीक और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क ने दिखा दिया कि हर देश एक समान नहीं होता। ईरान ने न सिर्फ हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की भू-राजनीति को हिला दिया।
इस युद्ध के सबसे बड़े फायदों में से एक अमेरिकी वर्चस्व (US hegemony) का तेजी से क्षरण है। दशकों तक मध्य पूर्व में अमेरिका के सैन्य अड्डे, उसके ठेकेदार और उसके सहयोगी अरब राजशाही अमेरिकी हितों की रक्षा करते रहे। लेकिन गाजा नरसंहार के बाद और अब ईरान संकट में अरब जनता का विश्वास पूरी तरह टूट चुका है। सड़कों पर नारे लग रहे हैं, सोशल मीडिया पर गुस्सा उबल रहा है। अब अमेरिका के लिए इन अड्डों को बनाए रखना बोझ बनता जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका को मजबूरन अपने कई ठिकानों से पीछे हटना पड़ेगा। इससे मध्य पूर्व में एक स्वाभाविक शक्ति संतुलन उभरेगा और विदेशी हस्तक्षेप कम होगा, जिससे क्षेत्रीय शांति की संभावना बढ़ेगी।
चीन का बिना गोली चलाए साम्राज्यवादी जीत
जबकि अमेरिका युद्धों में फंसकर अपनी ऊर्जा और प्रतिष्ठा गंवा रहा है, चीन ने बिना एक भी गोली चलाए दुनिया की सबसे बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है। ब्रिक्स विस्तार, युआन में तेल व्यापार की बढ़ती प्रवृत्ति और पेट्रो-डॉलर व्यवस्था पर बढ़ता सवाल—ये सब चीन की शांतिपूर्ण उदय की कहानी बयां करते हैं।
ईरान संकट ने एक बार फिर साबित किया कि अमेरिकी डॉलर की ताकत अब पहले जैसी नहीं रही। सऊदी अरब, ईरान, रूस और कई अन्य देश युआन या अन्य मुद्राओं में लेन-देन बढ़ा रहे हैं। चीन ने दिखाया कि सच्ची महाशक्ति वह होती है जो युद्ध से बचते हुए आर्थिक और तकनीकी श्रेष्ठता हासिल कर ले। बीआरआई परियोजनाएं, हाई-स्पीड रेल, 5G और अब AI में बढ़त—ये सब "युद्ध के बिना विजय" का नमूना हैं।
अब्राहम समझौते का खोखलापन और अरब दुनिया में जागृति
अब्राहम समझौतों (Abraham Accords) को "ऐतिहासिक शांति" बताया गया था। लेकिन गाजा और ईरान संकट ने इसका असली चेहरा उजागर कर दिया। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के प्रमुख हस्तियों, खासकर जिनके नाम अब्राहम प्रक्रिया से जुड़े, का शैतानी चेहरा जनता के सामने आ गया। इजरायल के साथ खुला गठजोड़ अब अरब जनमानस के लिए स्वीकार्य नहीं रहा।
खुशी की बात यह है कि संयुक्त अरब अमीरात के भीतर भी आवाजें उठ रही हैं। शारजाह जैसे इमीरात में कुछ नेतृत्व ने गैरत दिखाई है और अलग रास्ता अपनाने के संकेत दिए हैं। यह संकेत है कि अरब दुनिया में भी राष्ट्रवाद और इस्लामी एकजुटता की भावना अभी मरी नहीं है। अब्राहम समझौते अब "शांति" नहीं, बल्कि "समर्पण" के प्रतीक बनते जा रहे हैं।
NATO का विघटन और यूरोप-अमेरिका की दरार
इस युद्ध ने NATO को भी करीब-करीब तोड़ दिया है। तुर्की, फ्रांस, जर्मनी और कई अन्य यूरोपीय देश अब खुलकर अमेरिकी नीतियों की मुखालफत कर रहे हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद पहले ही NATO की एकजुटता कमजोर हुई थी, ईरान संकट ने उसे और उजागर कर दिया। फ्रांस जैसे देश स्वतंत्र विदेश नीति की बात कर रहे हैं। अमेरिका अब अकेला पड़ता जा रहा है। उसका "नाटो सहयोगी" शब्द अब सिर्फ कागजी बनकर रह गया है।
इजरायल की असली सूरत का पर्दाफाश
इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा नैतिक और राजनीतिक फायदा यह हुआ है कि इजरायल की असलियत पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो गई है। गाजा में जो कुछ हुआ—बच्चों, महिलाओं और अस्पतालों पर हमले—और अब ईरान पर आक्रामकता, ने दुनिया भर में एक नई जागृति पैदा की है। सोशल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार और युवा पीढ़ी अब इजरायल को "पीड़ित" नहीं बल्कि आक्रांता के रूप में देख रही है।
पूर्व में जहां इजरायल की छवि "मजबूत लोकतंत्र" की थी, आज वह "घटिया अत्याचारी" के रूप में उभरा है। यह बदलाव स्थायी है। आने वाली पीढ़ियां इस दौर को "इजरायल की नैतिक हार" के रूप में याद रखेंगी।
लेकिन हम कहां खड़े हैं?
यह सबसे महत्वपूर्ण और अनसुलझा सवाल है।
भारत की बात करें तो हमारी स्थिति जटिल है। एक तरफ हम इजरायल से रक्षा तकनीक और खुफिया सहयोग ले रहे हैं, दूसरी तरफ ईरान के साथ सांस्कृतिक, ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह जैसे रणनीतिक संबंध हैं। हम अमेरिका के साथ QUAD में हैं लेकिन रूस से S-400 खरीद रहे हैं और चीन के साथ BRICS में बैठते हैं।
यह "सभी के साथ, किसी के साथ नहीं" वाली नीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है। ईरान संकट ने साफ कर दिया है कि नई दुनिया में तटस्थता का विकल्प सीमित हो रहा है। भारत को अपनी स्वतंत्र, बहुआयामी और सभ्यतागत विदेश नीति को और मजबूत करना होगा। हम न तो अमेरिकी पिट्ठू बन सकते हैं और न ही किसी एक ब्लॉक में कैद हो सकते हैं।
मुस्लिम दुनिया के लिए भी यह वक्त आत्मचिंतन का है। सिर्फ नारे और प्रदर्शन पर्याप्त नहीं। आर्थिक स्वावलंबन, तकनीकी प्रगति, शिक्षा और एकजुट कूटनीति की जरूरत है। ईरान ने दिखाया कि प्रतिरोध संभव है, लेकिन प्रतिरोध के साथ निर्माण भी जरूरी है।
नई विश्व व्यवस्था की ओर
यह युद्ध अंत नहीं, शुरुआत है। पुरानी एकध्रुवीय दुनिया (unipolar world) अब इतिहास बन रही है। बहुध्रुवीय दुनिया (multipolar world) उभर रही है जिसमें चीन, रूस, भारत, ईरान, ब्राजील जैसे देश अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
तेल की बंदरबांट, पिट्ठू शासकों की नियुक्ति और "शॉक एंड ऑ" की नीति अब काम नहीं करेगी। दुनिया जाग चुकी है। युवा पीढ़ी सूचना युग में जी रही है। प्रचार नहीं, सच्चाई अब ज्यादा ताकतवर है।
ईरान का यह संघर्ष इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि इसने साबित किया कि कोई भी देश, चाहे वह कितना भी छोटा या घिरा हुआ हो, अगर उसमें इच्छाशक्ति और रणनीति हो तो साम्राज्यवाद को चुनौती दे सकता है।
अब सवाल यह नहीं है कि अमेरिका, इजरायल या NATO कितने मजबूत हैं। सवाल यह है कि नई शक्तियां कितनी जिम्मेदारी से इस खालीपन को भर पाती हैं। शांति, न्याय और सम्मानजनक सह-अस्तित्व की नई व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी अब हम सब पर है।
ईरान का युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास हमेशा आक्रांताओं के पक्ष में नहीं होता। जो लोग दूसरों को "हलवा" समझते हैं, उन्हें एक दिन खुद चखना पड़ता है। नई दुनिया उभर रही है—जिसमें ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि नैतिकता, अर्थव्यवस्था और सभ्यतागत गौरव में भी होती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-May 3,2026