मध्य पूर्व के जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर तनाव की नई लहर दौड़ गई है। हिज्बुल्लाह की लीडरशिप के एक विश्वसनीय सूत्र ने अल-अरबिया टीवी को दिए इंटरव्यू में सनसनीखेज खुलासा किया है कि ईरान ने उन्हें पूर्ण आश्वासन दिया है – **जब तक इजरायल लेबनान की ज़मीन से पूरी तरह वापस नहीं लौटता, तब तक कोई भी समझौता या परमाणु डील हस्ताक्षरित नहीं होगी।** यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच Memorandum of Understanding (MoU) पर हस्ताक्षर की तैयारियां चल रही हैं और क्षेत्र में शांति की उम्मीदें एक बार फिर से टेस्ट हो रही हैं।
: सालों का संघर्ष और हालिया घटनाक्रम
2026 का वर्ष मध्य पूर्व के लिए बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। इजरायल-हिज्बुल्लाह संघर्ष, जो 2024 के अंत में शुरू हुए बड़े पैमाने के ऑपरेशंस से जुड़ा था, अब भी पूरी तरह थमा नहीं है। इजरायली सेनाएं दक्षिणी लेबनान में बफर ज़ोन बनाए हुए हैं, जबकि हिज्बुल्लाह लगातार इजरायली घुसपैठ और कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध की बात कर रहा है।
अल-अरबिया के अनुसार, हिज्बुल्लाह सूत्र ने स्पष्ट किया कि ईरान इस मुद्दे को अमेरिका के साथ अपनी आगामी बातचीत में प्रमुख एजेंडा बनाएगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी संकेत दिया कि इजरायली सैनिकों की मौजूदगी को “युद्ध का अंत” नहीं माना जा सकता।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका-ईरान डील न केवल परमाणु कार्यक्रम बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ी हुई है। ट्रंप प्रशासन शांति की कोशिश कर रहा है, लेकिन इजरायल की “इंडेफिनिट सिक्योरिटी ज़ोन” नीति और हिज्बुल्लाह की “पूर्ण वापसी” की मांग के बीच गहरी खाई दिख रही है।
हिज्बुल्लाह की रणनीति: प्रतिरोध से समझौते तक
हिज्बुल्लाह, जिसे ईरान का सबसे मजबूत प्रॉक्सी माना जाता है, लेबनान की राजनीति और सुरक्षा में गहराई से घुला हुआ है। 2006 के युद्ध से लेकर 2024-26 के हालिया संघर्ष तक, हिज्बुल्लाह ने खुद को “प्रतिरोध की धुरी” के रूप में स्थापित किया है।
नैम कासेम जैसे लीडर्स बार-बार कह चुके हैं कि दक्षिण लेबनान से हिज्बुल्लाह फाइटरों की वापसी “समर्पण” के समान होगी। सूत्र के अनुसार, ईरान ने आश्वासन दिया है कि लेबनान फ्रंट को अलग नहीं रखा जाएगा। कोई भी डील, जिसमें लेबनान शामिल न हो, स्वीकार्य नहीं होगी।
यह रुख हिज्बुल्लाह को मजबूती देता है। लेबनान की अर्थव्यवस्था युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुई है – लाखों लोग विस्थापित, हजारों मारे गए, और इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह। फिर भी, हिज्बुल्लाह का समर्थन बेस, खासकर शिया समुदाय में, काफी मजबूत है।
ईरान की भूमिका: क्षेत्रीय शक्ति का दांव
ईरान के लिए यह सिर्फ हिज्बुल्लाह का मुद्दा नहीं, बल्कि अपनी क्षेत्रीय प्रभाव-क्षेत्र (Axis of Resistance) को बचाने का सवाल है। हमास, हूती, और हिज्बुल्लाह के साथ ईरान का नेटवर्क इजरायल को घेरने का रणनीतिक हथियार रहा है।
अगर ईरान अमेरिका के साथ डील करता है तो उसे इजरायल की लेबनान से वापसी सुनिश्चित करनी होगी, वरना घरेलू और क्षेत्रीय स्तर पर उसकी विश्वसनीयता को झटका लग सकता है। ईरानी अधिकारी कह रहे हैं कि इजरायली कब्जा डील का उल्लंघन होगा।
दूसरी ओर, इजरायल दक्षिण लेबनान में अपनी मौजूदगी को “सुरक्षा जरूरत” बता रहा है। इजरायली सूत्रों के मुताबिक, हिज्बुल्लाह के डिसआर्मामेंट और लिटानी नदी के दक्षिण में कोई खतरा न रहने तक वे वापस नहीं लौटेंगे।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और चुनौतियां
- अमेरिका: ट्रंप प्रशासन डील को आगे बढ़ाना चाहता है। कुछ अधिकारी कह रहे हैं कि लेबनान वापसी डील की शर्त नहीं है, लेकिन इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार रहेगा।
- इजरायल: “हम लेबनान में अनिश्चितकाल तक रहेंगे” – यह रुख डील को जटिल बना रहा है।
- लेबनान सरकार: कमजोर स्थिति में फंसी है। सेना को दक्षिण में तैनात करने की बात हो रही है, लेकिन हिज्बुल्लाह के बिना यह असंभव लगता है।
- अन्य शक्तियां: सऊदी अरब, रूस और चीन घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं।
संभावित परिदृश्य
1. पूर्ण समझौता: अगर ईरान अपनी शर्त मनवा लेता है तो क्षेत्र में व्यापक शांति संभव। लेकिन इजरायल की सहमति मुश्किल।
2. टकराव: अगर बातचीत फेल होती है तो नया दौर शुरू हो सकता है – ड्रोन हमले, मिसाइल एक्सचेंज।
3. फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट: आंशिक ceasefire के साथ स्थिति बनी रहना, जो सबसे संभावित लगता है।
क्षेत्रीय प्रभाव: अर्थव्यवस्था, शरणार्थी और सुरक्षा
युद्ध ने लेबनान की अर्थव्यवस्था को चपेट में लिया है। पर्यटन, कृषि और व्यापार बुरी तरह प्रभावित। लाखों लेबनानी विस्थापित हो चुके हैं। अगर शांति आती है तो पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती होगी।
दुनिया के लिए भी इसका असर है – तेल कीमतें, समुद्री मार्ग (स्ट्रेट ऑफ हरमुज) और परमाणु प्रसार की चिंता।
शांति की राह कठिन लेकिन जरूरी
हिज्बुल्लाह सूत्र का यह बयान एक साफ संदेश है – प्रतिरोध की धुरी टूटने वाली नहीं है। ईरान और हिज्बुल्लाह इजरायल की वापसी को किसी भी डील का अटूट अंग बनाना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, इजरायल सुरक्षा की गारंटी के बिना पीछे हटने को तैयार नहीं। अमेरिका के लिए यह डिप्लोमेसी का बड़ा टेस्ट है।
मध्य पूर्व शांति की राह पर है या फिर नया अध्याय शुरू होने वाला है – यह अगले कुछ हफ्तों में तय होगा। फिलहाल, सभी की निगाहें अमेरिका-ईरान टॉक्स और लेबनान बॉर्डर पर टिकी हुई हैं।
शांति की उम्मीद तब तक अधूरी रहेगी, जब तक सभी पक्ष एक-दूसरे की चिंताओं का सम्मान नहीं करेंगे। लेबनान की संप्रभुता, इजरायल की सुरक्षा और ईरान की क्षेत्रीय भूमिका – इन तीनों को संतुलित किए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 17 Jun 2026