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Saturday, 2 May 2026

ममता बनर्जी: साधारण साड़ी में असाधारण संघर्ष की कहानी जादवपुर की बेटी से बंगाल की बादशाहत तक एक अटूट जुझारू यात्रा

ममता बनर्जी: साधारण साड़ी में असाधारण संघर्ष की कहानी जादवपुर की बेटी से बंगाल की बादशाहत तक एक अटूट जुझारू यात्रा 
-Friday World-May 2,2026

1970 के दशक की उथल-पुथल भरी बंगाल की छात्र राजनीति में एक साधारण चेहरे वाली युवती ने जिस साहस और जिद के साथ कदम रखा, वह आज भी राजनीतिक इतिहास का एक यादगार अध्याय है। ममता बनर्जी — वह नाम जो आज पश्चिम बंगाल की राजनीति का पर्याय बन चुका है, अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत बहुत कम उम्र में ही कर चुकी थीं। साधारण परिवार से आने वाली ममता की असाधारण जुझारूपन ने उन्हें जल्द ही भीड़ से अलग पहचान दिला दी।

 जेपी आंदोलन और बोनट पर चढ़ी वह जिद

साल 1975। देश इमरजेंसी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जयप्रकाश नारायण (जेपी) का आंदोलन चरम पर था। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की छात्र इकाई से जुड़ीं ममता बनर्जी ने जेपी के काफिले की कार की बोनट पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज किया। यह घटना मात्र एक प्रदर्शन नहीं थी — यह एक युवा लड़की की साहसिकता का प्रतीक बन गई। पूरे देश में इस घटना की चर्चा हुई। एक तरफ जेपी जैसे दिग्गज नेता, दूसरी तरफ साधारण दिखने वाली ममता — लेकिन उनकी हिम्मत ने सबको चौंका दिया।

इसी घटना ने ममता को छात्र राजनीति में एक अलग मुकाम दिया। उन्होंने कांग्रेस की छात्र इकाई के माध्यम से वामपंथी छात्र संगठनों को सीधी चुनौती दी। उस समय बंगाल में वामपंथी विचारधारा का बोलबाला था, लेकिन ममता ने छात्र परिषद जैसी पहल के जरिए अपनी जमीन तैयार की। वे सड़क से लेकर विश्वविद्यालय तक हर मोर्चे पर सक्रिय रहीं। उनकी बोल्ड छवि और आम छात्रों से सीधा जुड़ाव उन्हें तेजी से आगे ले गया।

जादवपुर का ऐतिहासिक जीत — सोमनाथ चटर्जी को हराया

1980 के दशक के अंत में ममता बनर्जी ने राजनीतिक उलटफेर का सबसे बड़ा उदाहरण पेश किया। जादवपुर लोकसभा सीट से उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के दिग्गज नेता और संसद के तत्कालीन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबको हैरान कर दिया। यह जीत सिर्फ एक सीट जीतने से कहीं ज्यादा थी। यह बंगाल की वामपंथी दीवार में दरार डालने वाला पहला बड़ा झटका था।

ममता की इस जीत ने साबित कर दिया कि साधारण पृष्ठभूमि और साहस की ताकत से बड़े-बड़े किले को भी तोड़ा जा सकता है। इसके बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया। 1990 के दशक में वे कांग्रेस में युवा चेहरा बन चुकी थीं और बाद में 1998 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना कर उन्होंने अपना अलग रास्ता चुना।

 सादगी की मिसाल: सफेद साड़ी और हवाई चप्पल

ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी असाधारण सादगी है। आज भी जब वे सफेद साड़ी, हवाई चप्पल और कंधे पर बैग लेकर आम लोगों के बीच पहुंचती हैं, तो लगता है जैसे कोई पड़ोस की दीदी आ गई हो। उनकी इस छवि ने उन्हें बंगाल की मिट्टी से जोड़ रखा है। महंगी कारों, बुलेटप्रूफ वाहनों और दिखावे की राजनीति से दूर रहने वाली ममता ने साबित किया कि सत्ता में रहते हुए भी सादगी को नहीं छोड़ा जा सकता।

यह सादगी सिर्फ बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि उनकी राजनीति का मूल मंत्र है। चाहे वो सड़क पर आंदोलन हो या विधानसभा में बहस — ममता हमेशा आम आदमी की आवाज बनकर सामने आई हैं।

 नई पीढ़ी की उड़ान: सयानी घोष का उदय

ममता की राजनीतिक शैली अब नई पीढ़ी में भी दिख रही है। जादवपुर से ही आगे बढ़कर TMC की सयानी घोष पार्टी की स्टार प्रचारक बन चुकी हैं। ममता की तरह सयानी भी युवा, बोल्ड और जन-जुड़ाव वाली छवि रखती हैं। जादवपुर — वह सीट जहां से ममता का सफर शुरू हुआ था — आज सयानी जैसे नए चेहरों को मौका दे रही है। 

यह सिर्फ संयोग नहीं है। ममता बनर्जी ने हमेशा युवा नेताओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। सयानी घोष का तेजी से उभरना इसी रणनीति का नतीजा है। वे सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक हर मोर्चे पर सक्रिय हैं और पार्टी की नई ब्रांड एंबेसडर बनकर उभर रही हैं।

 एक युग की राजनीति

ममता बनर्जी की कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है। यह 1970 के दशक से लेकर आज तक की बंगाल की राजनीति की पूरी यात्रा है — वामपंथी वर्चस्व से लेकर तृणमूल के युग तक। उनकी जिद, साहस, सादगी और जन-समर्थन ने उन्हें बंगाल की सबसे ताकतवर महिला नेता बना दिया। 

आज जब वे सफेद साड़ी में जनता के बीच खड़ी होती हैं, तो न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे देश को याद आता है कि सच्ची राजनीति सादगी और संघर्ष से शुरू होती है।

जादवपुर की उस बेटी ने साबित कर दिया — साधारण चेहरा, लेकिन असाधारण इरादे, इतिहास बदल सकते हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-May 2,2026