-Friday World 22 Jun 2026
उत्तर प्रदेश की सियासत में नारे और ज़मीनी अमल के बीच की खाई अक्सर जनता की नज़र में आ जाती है। कुछ महीने पहले ही उत्तर प्रदेश AIMIM के सदर शौकत अली साहब ने एक बड़ा ऐलान किया था। मंच से पूरे फख्र के साथ उन्होंने कहा था कि, “हम उत्तर प्रदेश में एक हिजाब वाली बेटी को मुख्यमंत्री बनाएंगे।” यह बयान सिर्फ एक सियासी जुमला नहीं था। यह एक विज़न था, एक वादा था, और सबसे बढ़कर मुस्लिम खवातीन की सियासी नुमाइंदगी का बुलंद नारा था।
इस नारे ने कई तबकों में उम्मीद जगाई। हिजाब को पहचान, अस्मिता और सियासी हक़ के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया। लगा कि AIMIM उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि लीडरशिप में हिस्सेदार बनाने की बात कर रही है।
मटेरा विधानसभा: वही मैदान, बदले हुए किरदार
आज वक़्त का पहिया घूमकर मटेरा विधानसभा पर आकर रुका है। दिलचस्प बात यह है कि यहां पहले से एक हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में मौजूद हैं। वह अपनी पहचान, अपने एजेंडे और अपने समर्थकों के साथ जनता के बीच हैं।
लेकिन सियासी मंज़र अब कुछ और ही कहानी कह रहा है। खबरों और सियासी गलियारों में चर्चा है कि AIMIM उसी मटेरा सीट से खुद अपना उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। यानी जिस हिजाब वाली बेटी को आगे बढ़ाने का नारा दिया गया था, अब उसी जैसी दूसरी हिजाब वाली उम्मीदवार के मुकाबले में पार्टी खड़ी नज़र आ रही है।
सवाल जो अवाम पूछ रही है
यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है। और ये सवाल किसी पार्टी दफ्तर में नहीं, बल्कि नुक्कड़ों, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया पर आम लोग पूछ रहे हैं।
1. नारा बनाम अमल: अगर असल मकसद हिजाब वाली बेटी को सियासी ताकत देना था, तो फिर पहले से मैदान में मौजूद हिजाब वाली उम्मीदवार को मज़बूत क्यों नहीं किया जा रहा?
2. नुमाइंदगी या टकराव: क्या हिजाब वाली नुमाइंदगी का मतलब सिर्फ अपनी पार्टी के बैनर तले नुमाइंदगी है? अगर मकसद कौम की बेटी को आगे लाना है, तो पार्टी की दीवारें बीच में क्यों आ रही हैं?
3. सियासी गणित: क्या यह फैसला विशुद्ध सियासी मजबूरी है? क्या वोटों के बंटवारे का डर या अपनी सियासी ज़मीन तैयार करने की कोशिश, विचारधारा पर भारी पड़ रही है?
दावों और हकीकत का फासला
सियासत में बयान देना आसान है, लेकिन उन बयानों को ज़मीन पर उतारना सबसे मुश्किल काम होता है। जनता अब सियासी शोर से ज्यादा अमल देखना चाहती है। जब कोई नेता “हिजाब वाली बेटी को मुख्यमंत्री” बनाने की बात करता है, तो अवाम उसे सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि एक वादा मानती है।
मटेरा का मौजूदा हाल उसी वादे का इम्तिहान है। यहां सवाल सिर्फ AIMIM से नहीं है। यह सवाल हर उस सियासी जमात से है जो औरतों की नुमाइंदगी की बात करती है, लेकिन मौका आने पर सियासी समीकरणों में उलझ जाती है।
नतीजा क्या होगा?
फिलहाल मटेरा की सियासी तस्वीर साफ नहीं है। आधिकारिक ऐलान का इंतज़ार है। लेकिन एक बात तय है: अवाम अब खामोश नहीं है। वह नारों को याद रखती है और अमल को तौलती है।
“हिजाब वाली बेटी” का नारा भावनात्मक था, ताकतवर था। अब देखना यह है कि क्या यह नारा सिर्फ चुनावी सभाओं की ज़ीनत बनकर रह जाएगा, या फिर वाकई किसी हिजाब वाली बेटी की सियासी तकदीर बदलेगा। फिलहाल तो दावों और हकीकत के बीच का फर्क, मटेरा के मैदान में सबसे ज़्यादा दिखाई दे रहा है। जनता की अदालत में यह मुकदमा पेश हो चुका है, और फैसला आने वाले वक्त में EVM से निकलेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 22 Jun 2026