नई दिल्ली/दुबई, 28 जून 2026: विश्व के सबसे अस्थिर क्षेत्र मिडल ईस्ट में एक बार फिर युद्ध की चिंगारियां भड़क उठी हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में मालवाहक जहाज पर हुए हमले के बाद अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए एयरस्ट्राइक के जवाब में ईरान ने बहरीन पर सामूहिक ड्रोन हमले कर दिए। ईरान का दावा है कि उसने बहरीन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि बहरीन ने इस हमले की कड़ी निंदा की है। रातभर चले इन सैन्य कार्रवाइयों ने अस्थायी सीजफायर और शांति समझौते को गंभीर खतरे में डाल दिया है। दुनिया भर के तेल बाजार, समुद्री व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन पर इसका दूरगामी असर पड़ सकता है।
घटनाक्रम: एक के बाद एक बढ़ती तनाव की लहर
सबसे पहले गुरुवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक सिंगापुर फ्लैग वाले मालवाहक जहाज (M/V Ever Lovely) पर ईरानी ड्रोन हमला हुआ। यह जहाज होर्मुज से बाहर निकल रहा था। हमले में जहाज को नुकसान पहुंचा, हालांकि चालक दल सुरक्षित रहा। अमेरिका ने इसे अपनी संपत्ति और समुद्री सुरक्षा पर हमला मानते हुए शुक्रवार को ईरान के होर्मुज क्षेत्र और क़ेश्म द्वीप के आसपास मिसाइल-ड्रोन स्टोरेज साइट्स तथा रडार सुविधाओं पर एयरस्ट्राइक कर दी।
इसके प्रत्युत्तर में शनिवार को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बहरीन की ओर आत्मघाती ड्रोन भेजे। ईरानी सरकारी मीडिया IRNA के अनुसार, इन हमलों में बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों, खासकर US Navy के Fifth Fleet के मुख्यालय को लक्षित किया गया। ईरान ने इन्हें “रक्षात्मक कार्रवाई” बताया है।
UK Maritime Trade Operations (UKMTO) ने शनिवार को होर्मुज में एक और ऑयल टैंकर पर हमले की सूचना दी। हालांकि, इस हमले में कोई हताहत नहीं हुआ। इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है।
बहरीन पर हमला: रणनीतिक महत्व और प्रतिक्रिया
बहरीन ईरान का लंबे समय से कट्टर विरोधी रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बहरीन में अमेरिकी नौसेना का Fifth Fleet मुख्यालय स्थित है, जो पूरे मिडल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक अभियानों का केंद्र है। हाल ही में बहरीन ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मेजबानी की थी, जहां GCC (Gulf Cooperation Council) की बैठक में ईरान के हमलों को रोकने और होर्मुज को मुक्त रखने पर जोर दिया गया था।
बहरीन के विदेश मंत्रालय ने ईरानी ड्रोन हमले को “संप्रभुता का खुला उल्लंघन” बताते हुए कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया। कुछ रिपोर्ट्स में ड्रोन के मलबे से घरों और वाहनों को नुकसान पहुंचने तथा एक बच्चे के घायल होने की खबर भी आई है।
होर्मुज स्ट्रेट: विश्व तेल व्यापार का गला
दुनिया का लगभग 20% तेल और प्राकृतिक गैस होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। यह जलमार्ग खाड़ी देशों के लिए जीवन रेखा है। ईरान ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर उसके हितों को नुकसान पहुंचाया गया तो वह इस मार्ग को बंद कर सकता है या गुजरने वाले जहाजों से “टोल टैक्स” वसूल सकता है। अमेरिका और खाड़ी देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानते हुए ईरान की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है।
Joint Maritime Information Centre ने अब इस क्षेत्र में “गंभीर खतरा” की चेतावनी जारी की है और ओमान तट के पास वैकल्पिक समुद्री मार्गों का सुझाव दिया है। इससे जहाजों की लागत बढ़ेगी और वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होगी।
पृष्ठभूमि: सीजफायर से युद्ध तक?
कुछ समय पहले अमेरिका और ईरान के बीच एक अस्थायी समझौता हुआ था, जिसके तहत होर्मुज खुला रखने और आगे के संघर्ष को टालने पर सहमति बनी थी। लेकिन हाल की घटनाओं ने इस समझौते को लगभग समाप्त कर दिया है। ईरान का आरोप है कि अमेरिका समझौते का उल्लंघन कर रहा है, जबकि अमेरिका ईरान को जहाजों पर हमले का जिम्मेदार ठहरा रहा है।
यह तनाव केवल द्विपक्षीय नहीं है। इसमें इजराइल, लेबनान (हिजबुल्लाह), सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी शामिल हो सकते हैं। क्षेत्र में पहले से ही जटिल गठबंधन और विरोधाभास मौजूद हैं।
संभावित परिणाम और वैश्विक प्रभाव
1. तेल की कीमतें: होर्मुज में अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। पहले ही वैश्विक अर्थव्यवस्था महंगाई से जूझ रही है।
2. समुद्री व्यापार: बीमा लागत बढ़ेगी, जहाज कंपनियां मार्ग बदलेंगी, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित होगी।
3. क्षेत्रीय सुरक्षा: बहरीन, कुवैत, जॉर्डन जैसे देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले से बड़े संघर्ष की आशंका।
4. परमाणु मुद्दा: ईरान का परमाणु कार्यक्रम फिर चर्चा में आ सकता है।
5. भारत पर असर: भारत ईरान से तेल आयात करता है और होर्मुज उसके ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय नौसेना को क्षेत्र में सतर्क रहना होगा।
विशेषज्ञों की राय
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष अभी पूर्ण युद्ध नहीं चाहते, लेकिन गलतफहमी या छोटी घटना बड़े युद्ध को जन्म दे सकती है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य मध्यस्थ देश शांति वार्ता शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरान की IRGC बहुत आक्रामक रुख अपनाए हुए है, जबकि अमेरिका “प्रोपोर्शनेट रिस्पॉन्स” की नीति पर चल रहा है। लेकिन यह संतुलन कब तक टिकेगा, यह चिंता का विषय है।
: शांति की अपील
मिडल ईस्ट में शांति स्थापना न केवल क्षेत्रीय देशों बल्कि पूरी दुनिया के हित में है। तेल, व्यापार और मानवीय संकट से बचने के लिए तुरंत डायलॉग की जरूरत है। भारत जैसे देशों को भी कूटनीतिक स्तर पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
अभी स्थिति बेहद नाजुक है। हर नई खबर के साथ युद्ध की आशंका बढ़ रही है। क्या दोनों पक्ष पीछे हटेंगे या स्थिति और बिगड़ेगी? समय ही बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 28 Jun 2026