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Wednesday, 24 June 2026

"करबला की रेत से उठी इन्सानियत की आवाज़: हुसैन — जो सिर्फ़ एक मज़हब के नहीं, पूरी इंसानियत के हैं"

करबला की रेत से उठी इन्सानियत की आवाज़: हुसैन — जो सिर्फ़ एक मज़हब के नहीं, पूरी इंसानियत के हैं"
- Friday World 24 Jun 2026
नदी जब बहती है तो रास्ते की हर ज़मीन को सींचती चलती है। कहीं बंजर धरती हरी हो जाती है, कहीं प्यासे कंठों को जीवन मिलता है। इमाम हुसैन की शहादत भी वैसी ही एक नदी है। 680 ईस्वी में करबला की तपती रेत पर जो खून बहा, उसने सिर्फ़ एक क़ौम को नहीं, पूरी इंसानियत के ज़मीर को हरा-भरा कर दिया। 10 मोहर्रम हिजरी 1448, 26 जून 2026 को जब हम उनकी याद मनाते हैं, तो यह याद किसी एक समुदाय की विरासत नहीं है। यह उस हर इंसान की धरोहर है जो अन्याय के सामने सिर झुकाने से इनकार करता है।

1. सत्याग्रह जो 7वीं सदी में ही बराबरी सिखा गया

मुंशी प्रेमचंद ने कहा था, "दुनिया जिस समानता और बंधुत्व की गुत्थी आज तक सुलझा नहीं पाई, उसे इमाम हुसैन ने सातवीं सदी में ही अपने सत्याग्रह से सुलझा दिया था।" सोचिए, आज हम 'लिबर्टी, इक्वालिटी, फ्रेटरनिटी' की बात 18वीं सदी की फ्रांसीसी क्रांति से जोड़ते हैं। मगर करबला के मैदान में हुसैन ने 72 भूखे-प्यासे साथियों के साथ खड़े होकर तानाशाह यजीद को बता दिया था कि सत्ता का मतलब गुलामी नहीं, जिम्मेदारी है। उन्होंने तलवार के ज़ोर पर बैयत यानी वफादारी से इनकार किया। क्योंकि हुसैन के लिए ख़लीफ़ा का तख्त उसूलों से बड़ा नहीं था। उनका सत्याग्रह किसी ताज के लिए नहीं था। वह जनकल्याण के लिए था — ऐसी हुकूमत के लिए जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर टिकी हो।

यही वजह है कि करबला की घटना को दुनिया की सबसे महान ऐतिहासिक घटनाओं में गिना जाता है। यह लड़ाई फ़ौजों की नहीं थी, ज़मीर की थी। 30 हज़ार की यजीदी सेना के सामने 72 लोग। फिर भी इतिहास ने सलाम 72 को किया, 30 हज़ार को नहीं।

2. 'हुसैन' एक नाम नहीं, एक विचार है

रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा: "In the world of humanity 'Husain' belongs to all"। हुसैन को शिया, सुन्नी, हिंदू, ईसाई के खांचों में नहीं बांटा जा सकता। वे 'सार्वकालिक और सार्वभौमिक' हैं। हर उस दौर में हुसैन दिखते हैं जहां कोई कमज़ोर, किसी ताकतवर की ज़्यादती के खिलाफ खड़ा होता है। डॉ. क्रिस हडसन अपनी किताब _Husain and Struggle for Justice_ में लिखते हैं कि सदियों से हुसैन ने लोगों को सच्चाई, न्याय, निर्भयता और सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया है।

10 मोहर्रम 61 हिजरी को जो हुआ, वह सिर्फ़ एक जंग नहीं थी। वह 'नज़ीर' थी — एक मिसाल। यजीद ने हुकूमत को अपनी जागीर समझा। शरीयत के नाम पर शराब, जुआ, ज़ुल्म सब जायज़ कर दिया। हुसैन ने कहा, "मुझ जैसा, तुझ जैसे की बैयत नहीं कर सकता"। यह इनकार सिर्फ़ यजीद से नहीं था। यह हर उस निज़ाम से इनकार था जो इंसान को इंसान न समझे। इसलिए टैगोर ने फिर कहा: "Imam Husain was the Symbol of Truth - Freedom and Sacrifice for all Mankind"।

3. करबला: जहां भूख ने इतिहास को सींचा

करबला का सच रोंगटे खड़े कर देता है। हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ मक्का से कूफ़ा जा रहे थे। रास्ते में यजीद की फौज ने उन्हें फुरात नदी के किनारे घेर लिया। पानी बंद कर दिया गया। 7 मोहर्रम से 10 मोहर्रम तक — तीन दिन — छोटे-छोटे बच्चे 'अल-अतश, अल-अतश' यानी 'प्यास-प्यास' पुकारते रहे। 6 महीने के अली असग़र को भी प्यासा शहीद कर दिए। हुसैन ने अपने भाई अब्बास, बेटे अली अकबर, भतीजे क़ासिम सबको एक-एक कर कुर्बान होते देखा। 

10 मोहर्रम की दोपहर हुसैन अकेले बचे। उन्होंने फिर भी झुकना मंज़ूर नहीं किया। यजीदी सेना ने उन पर तीर, भाले, तलवार से हमला किया। वे सजदे में शहीद हुए। उनके जिस्म पर अनगिनत भालों और तलवारों के ज़ख्म थे। यह कुर्बानी किसी सल्तनत के लिए नहीं थी। यह उस आवाज़ के लिए थी जो कहती है कि ज़ुल्म के आगे नही सिर सिर्फ़ अल्लाह के सामने झुकता है।

इसीलिए कहा जाता है कि इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद। हुसैन ने अपना सब कुछ देकर दीन को बचाया, और इंसानियत को रास्ता दिखाया।

4. करबला से निकली क्रांतियों की मशाल

करबला एक दिन में खत्म नहीं हुआ। वह एक शुरुआत थी। हुसैन की शहादत ने ऐसी चिंगारी लगाई कि सदियों तक बुझी नहीं। इतिहासकार मानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति, अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम, भारत का स्वाधीनता आंदोलन — सब पर कहीं न कहीं करबला की छाप है। महात्मा गांधी ने कहा था, "मैंने हुसैन से सीखा कि कैसे जीत हासिल की जाती है, जबकि मैं मज़लूम हूं"। नेल्सन मंडेला ने जेल में करबला की दास्तान पढ़ी और रंगभेद के खिलाफ 27 साल की कैद काट ली, पर झुके नहीं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का कथन इसीलिए बहुत अहम है: "The sacrifice of Imam Husain is not limited to one country, or nation, but it is the hereditary state of the brotherhood of all mankind"। हुसैन की विरासत सरहदों में नहीं बंधती। वह हर उस दिल में है जो इंसाफ़ चाहता है।

5. आज के दौर में हुसैन का पैग़ाम क्या है?

आज 2026 में जब हम 10 मोहर्रम मना रहे हैं, तो दुनिया फिर उसी दोराहे पर खड़ी है। कहीं युद्ध, कहीं नफ़रत, कहीं ताकत का नशा। ऐसे में हुसैन हमें तीन सबक देते हैं।

पहला: सिद्धांत पर समझौता नहीं
 हुसैन के पास विकल्प था। यजीद की बैयत कर लेते, जान बच जाती, परिवार सलामत रहता। मगर उन्होंने कहा कि अगर मैं आज झुक गया, तो कल हर सच्चा इंसान झुकने को मजबूर होगा। इसलिए उन्होंने मौत चुनी, ज़िल्लत नहीं।

दूसरा: कमज़ोर के साथ खड़े होना
 करबला में हुसैन के साथ औरतें, बच्चे, बीमार, बुज़ुर्ग थे। उन्होंने सबको बचाने की कोशिश की। अपने 6 महीने के बेटे को भी मैदान में ले गए ताकि दुनिया देखे कि ज़ुल्म की कोई हद नहीं होती। यह हमें सिखाता है कि नेतृत्व का मतलब ताकत नहीं, ज़िम्मेदारी है।

तीसरा: नतीजे से बड़ी होती है नीयत
। ज़ाहिरी तौर पर करबला में हुसैन हार गए। उनका पूरा कुनबा शहीद हो गया। मगर असल में जीत हुसैन की हुई। यजीद का नाम मिट गया, हुसैन का पैग़ाम अमर हो गया। डॉ. राधाकृष्णन ने ठीक कहा: "Though Imam Husain gave his life almost 1300 years ago, but his indestructible soul rules the hearts of people even today"।

6. मोहर्रम: न्याय ओर इन्सानियत का मिशन का नाम

हम अक्सर मोहर्रम को सिर्फ़ मातम से जोड़ देते हैं। काले कपड़े, ताज़िए, ज़ंजीर का मातम। मगर मोहर्रम का असल पैग़ाम मातम से बहुत बड़ा है। यह 'मिशन' है। यह पूछता है कि आज का यजीद कौन है? आज का हुसैन कौन बनेगा? यजीद सिर्फ़ एक शख्स नहीं था। वह एक सोच थी — ताकत के नशे की, झूठ को सच बनाने की, अवाम की आवाज़ दबाने की। हुसैन भी सिर्फ़ एक शख्स नहीं थे। वह उस सोच का नाम हैं जो कहती है, "मर जाऊंगा, पर बेईमान नहीं बनूंगा"।

इसलिए जब आप किसी ताज़िए को देखें, तो उसे सिर्फ़ लकड़ी और कागज़ का ढांचा न समझें। वह उस काफिले की याद है जो हक़ के लिए चला था। जब 'या हुसैन' की सदाएं सुनें, तो समझें कि यह सदियां पुराना नारा आज भी ज़िंदा है क्योंकि ज़ुल्म आज भी ज़िंदा है।

 हर दिल में एक करबला

हुसैन ने हमें सिखाया कि जिंदगी की कीमत सांसों से नहीं, उसूलों से तय होती है। करबला की रेत पर लिखा गया खून का वह खत, हर दौर के इंसान के नाम है। वह कहता है कि अगर तुम्हारे सामने कोई यजीद खड़ा हो — चाहे वह नफ़रत के रूप में हो, भ्रष्टाचार के रूप में हो, या बेईमानी के रूप में — तो तुम्हें हुसैन बनना होगा। 

72 के मुकाबले 30 हज़ार का अनुपात आज भी नहीं बदला। सच्चाई के साथ हमेशा मुट्ठी भर लोग होते हैं। मगर इतिहास गवाह है, जीत हमेशा हुसैन की होती है। क्योंकि तलवारें थक जाती हैं, पर विचार नहीं मरते।

तो इस मोहर्रम, आइए आंसू बहाने के साथ एक अहद भी लें। अहद कि हम अपने भीतर के यजीद को मारेंगे। अहद कि हम अपने घर, दफ्तर, समाज में जहां भी नाइंसाफी देखेंगे, आवाज़ उठाएंगे। क्योंकि हुसैन का पैग़ाम यही है: ज़िंदा कौमें मातम नहीं मनातीं, वे मिशन को आगे बढ़ाती हैं।

और हां, हुसैन सिर्फ़ 'उनके' नहीं हैं। हुसैन 'सबके' हैं। शहीदे इंसानियत सबकी साझी विरासत है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 Jun 2026