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Wednesday, 24 June 2026

मेक इन इंडिया' या 'मेड इन इज़राइल'? सूर्यास्त्र विवाद ने उजागर की रक्षा खरीद की पोल

मेक इन इंडिया' या 'मेड इन इज़राइल'? सूर्यास्त्र विवाद ने उजागर की रक्षा खरीद की पोल
-Friday World | 24 June 2026
नई दिल्ली, 24 जून 2026– भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक नया विवाद गरमा गया है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे के बीच 'सूर्यास्त्र' यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार और कंपनी इसे 300 किलोमीटर रेंज का स्वदेशी हथियार बता रही है, वहीं दूसरी तरफ ट्रायल में हुई कथित असफलता और इजरायली तकनीकी निर्भरता ने 'व्हाइट लेबलिंग' के आरोपों को हवा दी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शिरडी में इस सिस्टम को फ्लैग ऑफ करते हुए इसे भारत की रक्षा क्षमता का गेम चेंजर बताया था। गोदी मीडिया ने इसे पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी बताया। लेकिन ग्राउंड रियलिटी क्या है?

 दावा बनाम हकीकत

सरकार और NIBE लिमिटेड का दावा था कि सूर्यास्त्र 300 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम है। लेकिन कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2026 में ओडिशा के चांदीपुर इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हुए ट्रायल के दौरान एक रॉकेट मात्र 15 किलोमीटर उड़ान भरने के बाद टूटकर गिर गया। यह घटना उन दावों पर सवालिया निशान लगाती है जो इसे स्वदेशी मिसाइल के रूप में पेश कर रहे थे।

NIBE लिमिटेड ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि दोनों 150 किमी और 300 किमी वेरिएंट के ट्रायल सफल रहे। कंपनी का कहना है कि सिस्टम भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा करता है। लेकिन सवाल उठता है — पूरी पारदर्शिता कहां है?

इजरायली टेक्नोलॉजी, भारतीय नाम

सूर्यास्त्र असल में इजरायली डिफेंस कंपनी **एल्बिट सिस्टम्स** के PULS (Precise & Universal Launching System) पर आधारित है। भारत में NIBE लिमिटेड के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और विनिर्माण साझेदारी के तहत इसे 'सूर्यास्त्र' नाम दिया गया। 

- डिजाइन और मूल तकनीक: इजरायल  
- असेंबली और उत्पादन: भारत (NIBE, शिरडी प्लांट)  
- मार्केटिंग: 'मेक इन इंडिया'  

यह मॉडल कई देशों में 'व्हाइट लेबलिंग' के रूप में जाना जाता है — विदेशी डिजाइन पर स्थानीय नाम चिपकाकर बेचना। सवाल यह है कि क्या यह वाकई आत्मनिर्भरता है या सिर्फ असेंबली?

 293 करोड़ का इमरजेंसी ऑर्डर

जनवरी 2026 में भारतीय सेना ने इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत NIBE को लगभग 293 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया। इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का प्रावधान युद्ध या तत्काल खतरे की स्थिति में सामान्य टेंडर प्रक्रिया, लंबी जांच और ऑडिट को बायपास करने के लिए होता है। 

आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि बिना पर्याप्त स्वतंत्र टेक्निकल वेरिफिकेशन के दी गई। जब सिस्टम की परफॉर्मेंस पर सवाल उठे तो जवाबदेही का मुद्दा और गंभीर हो जाता है।

सेना के जवानों के साथ न्याय?

भारतीय जवान सीमा पर दुश्मन का सामना करते हैं। उन्हें ऐसे हथियार चाहिए जो भरोसेमंद हों — जो 300 किमी मार सकें, न कि 15 किमी में टूट जाएं। 

DRDO जैसे संगठन दशकों से अग्नि, ब्रह्मोस, तेजस और अन्य स्वदेशी प्रणालियों पर काम कर रहे हैं। इनकी सफलता असली 'मेक इन इंडिया' की मिसाल है। लेकिन जब इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के नाम पर विदेशी सहयोग वाले सिस्टम्स को प्राथमिकता दी जाती है, तो DRDO वैज्ञानिकों की मेहनत और टैक्सपेयर्स के पैसे का सही उपयोग पर सवाल उठना लाजमी है।

 बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं

1. सूर्यास्त्र पर 293 करोड़ रुपये किस प्रक्रिया से मंजूर किए गए?
2. इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का आधार क्या था?
3. ट्रायल में हुई कथित असफलता की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
4. भविष्य में पूर्ण स्वदेशीकरण का रोडमैप क्या है?
5. ELBIT और NIBE के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कितना गहरा और स्थायी है?

NIBE ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कानूनी कार्रवाई की बात कही है और दावा किया है कि सिस्टम उच्च सटीकता (CEP) के साथ सफल रहा। कंपनी का कहना है कि उत्पादन शिरडी के डिफेंस कॉम्प्लेक्स में हो रहा है और इंडिजनाइजेशन की दिशा में काम जारी है।

 आत्मनिर्भरता की सच्ची राह

भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है तो जरूरत है:

- DRDO को ज्यादा बजट और स्वायत्तता  
- निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, लेकिन सख्त क्वालिटी कंट्रोल  
- विदेशी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ 100% इंडिजनाइजेशन का सख्त टाइमलाइन  
- हर प्रोजेक्ट की स्वतंत्र ऑडिट और पारदर्शी रिपोर्टिंग  

सूर्यास्त्र विवाद एक सबक है। रक्षा खरीद सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

 पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी

'मेक इन इंडिया' एक सराहनीय पहल है, लेकिन इसे सिर्फ नाम और मार्केटिंग तक सीमित नहीं रखना चाहिए। असली स्वदेशी वह है जो डिजाइन से लेकर उत्पादन और परफॉर्मेंस तक भारतीय हो। 

सूर्यास्त्र प्रकरण से सीख लेते हुए रक्षा मंत्रालय को चाहिए कि सभी बड़े प्रोक्योरमेंट की पूरी डिटेल्स, ट्रायल रिपोर्ट्स और स्वदेशीकरण प्रतिशत सार्वजनिक करें। ताकि टैक्सपेयर का पैसा सुरक्षित रहे और हमारे जवान सबसे बेहतर हथियारों से लैस हों।

देश की सुरक्षा से ऊपर कुछ नहीं। विवादों से ऊपर उठकर सच्ची आत्मनिर्भरता हासिल करने का समय आ गया है।


Sajjad Ali Nayani ✍  
Friday World | 24 June 2026

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