तेहरान की धरती पर 5 जुलाई 2026 को अदा हुई वो ऐतिहासिक नमाज़-ए-जनाज़ा, जिसमें 100 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधिमंडल और 30 से ज़्यादा देशों के हाई-लेवल डेलिगेशन्स ने शिरकत की। इमाम ख़ामेनई (र) और उनके शहीद अहल-ए-ख़ाना की ताबूतें हदीस-ए-किसा की रौशनी, नौहों की करुणा और करोड़ों मुसलमानों के आँसुओं के बीच पेश हुईं। यह समारोह शोक का नहीं, बल्कि शहादत की अमरता, इस्लामी क्रांति की अटूट शक्ति और वैश्विक मुस्लिम एकता का अनुपम प्रतीक बन गया।**
ईरान की राजधानी तेहरान के विशाल ग्रैंड मूसल्ला में उस दिन इतिहास रचा गया। आसमान से सूरज की तपिश बरस रही थी, लेकिन लाखों-करोड़ों दिलों में शहीद राहबर के प्रति प्यार और शोक की ठंडक थी। हवा में “या ज़ह्रा”, “लब्बैक या ख़ामेनई” और “मौत बे अमरीका” के नारे गूंज रहे थे। मरजा-ए-आलीक़द्र आयतुल्लाह जाफ़र सुब्हानी (द) की इमामत में अदा हुई इस नमाज़-ए-जनाज़ा ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि शहादत दुश्मन को कभी कामयाब नहीं होने देती।
भावुक क्षण और रूहानी माहौल
समारोह की शुरुआत हदीस-ए-किसा की तिलावत से हुई। पैगंबर (स) की इस पवित्र हदीस ने माहौल को रूहानी बना दिया, जिसमें अहल-ए-बैत (अ) की महानता का ज़िक्र है। इसके बाद नौहे-ख़्वानी और तराने शुरू हुए। जब कव्वालों ने “ख़ामेनई हमारा राहबर है, शहीदों का ख़ून ज़ाया नहीं जाएगा” गाया, तो लाखों आँखें नम हो गईं। लोग सीने पीट रहे थे, आँसू बहा रहे थे और शहीद राहबर की तस्वीरें सिरों पर उठाए खड़े थे।
सबसे पहले शहीद इमाम सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनई (र) का ताबूत लाया गया। इसके बाद उनके शहीद परिवार के ताबूत – शहीद डॉक्टर मिस्बाहुल हुदा बाक़िरी कनी (दामाद), शहीदा सय्यदा बुशरा ख़ामेनई (बड़ी साहिबज़ादी), शहीदा ज़हरा हद्दाद आदिल (बहू) और 14 माह की मासूम नवासी शहीदा ज़हरा मुहम्मदी गुलपाएगानी। यह मंज़र देखकर हर कोई भावुक हो गया। एक पूरा परिवार क्रांति की खातिर शहीद हो गया, लेकिन उनकी कुर्बानी नई ऊर्जा लेकर आई।
नमाज़ तीन मराहिल में अदा की गई। पहली सफ़ में शहीद राहबर के तीनों बेटे, रिश्तेदार और आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडर मौजूद थे। इन चेहरों पर दृढ़ संकल्प साफ़ दिख रहा था।
इमाम ख़ामेनई (र): युग पुरुष की विरासत
इमाम ख़ामेनई (र) ने 37 साल तक ईरान को नेतृत्व दिया। उन्होंने क्रांति को मजबूत किया, अमेरिका-इज़राइल के दबावों का मुकाबला किया, क्षेत्रीय प्रतिरोध को बढ़ावा दिया और उम्माह की आवाज़ बने। उनका जीवन सादगी का प्रतीक था। उनका परिवार भी इसी जज़्बे का हिस्सा था। शहीद परिवार की कुर्बानी दुश्मन की क्रूरता और क्रांति की मजबूती दोनों को उजागर करती है।
100+ देशों के प्रतिनिधिमंडल और 30+ हाई-लेवल डेलिगेशन्स: वैश्विक समर्थन का प्रमाण
यह जनाज़ा सिर्फ़ ईरानी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटना थी। 100 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधिमंडल मौजूद थे। 30 से ज़्यादा देशों ने हाई-लेवल डेलिगेशन्स भेजे। इसमें 8 से ज़्यादा हेड्स ऑफ़ स्टेट/गवर्नमेंट और 12 देशों के संसद अध्यक्ष शामिल थे।
प्रमुख प्रतिनिधि:
- पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ हाई-लेवल डेलिगेशन के साथ।
- तजाकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमान।
- आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान।
- जॉर्जिया के राष्ट्रपति।
- इराक के राष्ट्रपति और उच्च स्तरीय टीम।
- रूस से दिमित्री मेदवेदेव (पुतिन के स्पेशल एनवॉय)।
- चीन से सीनियर लॉ मेकर।
- अफगानिस्तान (तालिबान), ओमान, कतर, उज़्बेकिस्तान, तुर्की और कई अन्य देशों के अधिकारी।
90 से ज़्यादा देशों के धार्मिक विद्वान और शिया समुदायों के प्रतिनिधि भी पहुंचे। भारत, बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड सहित एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से प्रतिनिधि आए। पश्चिमी देशों की अनुपस्थिति के बावजूद यह भागीदारी इस्लामी दुनिया की एकता को दर्शाती है।
करोड़ों की उपस्थिति और भावुक माहौल
एक करोड़ से ज़्यादा लोगों ने शिरकत की। तेहरान की सड़कें लोगों से भरी थीं। स्वयंसेवकों ने पानी, छाया और मदद का इंतजाम किया। विदेशी मेहमानों का स्वागत गर्मजोशी से हुआ। यह समारोह शोक सभा के साथ-साथ प्रतिरोध की रैली भी था।
मीडिया कवरेज: विश्व पटल पर छाया मंज़र
दुनिया भर के दर्जनों देशों के न्यूज़ चैनल्स ने लाइव कवरेज किया। Al Jazeera, BBC, CNN, TRT आदि ने घंटों रिपोर्टिंग की। मीडिया ने इसे मिलियन्स की शोक सभा और जियो-पॉलिटिकल इवेंट बताया।
### विरासत जो कभी खत्म नहीं होगी
इमाम ख़ामेनई (र) की शहादत ईरान को कमज़ोर नहीं करेगी। उनका संदेश नई पीढ़ी को प्रेरित करेगा। “शहीदों का ख़ून ज़ाया नहीं जाएगा” – यह नारा आज हर जुबान पर है। ईरान की क्रांति ज़िंदा है। राहबर अमर हैं।
शहादत अमर है। एकता अटूट है। क्रांति जारी रहेगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 5 jul 2026