- Friday World 5 Jul 2026
तेहरान की धरती पर इमामत-ए-मरजा-ए-आलीक़द्र आयतुल्लाह जाफ़र सुब्हानी (द) के साये में अदा हुई वो ऐतिहासिक नमाज़-ए-जनाज़ा, जिसने पूरी दुनिया को इस्लामी क्रांति के अटूट संकल्प और शहादत की मिसाल दिखा दी। इमाम ख़ामेनई (र) और उनके शहीद परिवार की ताबूतें हदीस-ए-किसा की गूंज, नौहों की करुणा और तरानों की जज़्बाती लहरों के बीच लाई गईं। एक करोड़ से ज़्यादा मुसलमानों की उपस्थिति में यह मंज़र न सिर्फ़ ईरान बल्कि पूरे इस्लामी दुनिया के लिए शोक और संघर्ष का प्रतीक बन गया।
5 जुलाई 2026 की सुबह तेहरान की ग्रैंड मूसल्ला की विशाल प्रार्थना भूमि पर एक अनोखा दृश्य उपस्थित था। आसमान से सूरज की किरणें गर्मी बरसा रही थीं, लेकिन लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों में शहीद राहबर के प्रति प्यार और शोक की ठंडक थी। हवा में “या ज़ह्रा”, “लब्बैक या ख़ामेनई” और “मौत बे अमरीका” के नारे गूंज रहे थे। इस ऐतिहासिक जनाज़ा की इमामत मरजा-ए-आलीक़द्र आयतुल्लाह जाफ़र सुब्हानी (द) ने की, जिनकी इमामत में नमाज़ पढ़ते हुए हर सजदा शहादत की याद दिला रहा था।
नमाज़-ए-जनाज़ा की शुरुआत हदीस-ए-किसा की तिलावत से हुई। पैगंबर मुहम्मद (स) की उस पवित्र हदीस ने माहौल को रूहानी बना दिया, जिसमें अहल-ए-बैत (अ) की पवित्रता और उनके साथ अल्लाह की विशेष मेहरबानी का ज़िक्र है। इसके बाद नौहे-ख़्वानी और तराने शुरू हुए। कव्वालों की आवाज़ में जब “ख़ामेनई हमारा राहबर है” और “शहीदों का ख़ून ज़ाया नहीं जाएगा” की पंक्तियाँ गूंजीं, तो लाखों आँखें नम हो गईं। लोग सीने पीट रहे थे, आँसू बहा रहे थे और शहीद राहबर के चेहरे की तस्वीरों को सिरों पर उठाए खड़े थे।
सबसे पहले शहीद इमाम सय्यद अली हुसैनी ख़ामेनई (र) का ताबूत लाया गया। उनके ताबूत पर ईरानी झंडा और कुरान पाक रखा गया था। इसके बाद उनके शहीद अहल-ए-ख़ाना के ताबूत एक-एक करके पेश किए गए। शहीद डॉक्टर मिस्बाहुल हुदा बाक़िरी कनी (दामाद), शहीदा सय्यदा बुशरा ख़ामेनई (बड़ी साहिबज़ादी), शहीदा ज़हरा हद्दाद आदिल (बहू) और सबसे छोटी 14 माह की शहीदा ज़हरा मुहम्मदी गुलपाएगानी (नवासी)। यह मंज़र देखकर हर दिल टूट रहा था। एक परिवार का पूरा हिस्सा, जो इस्लामी क्रांति और मुजाहिदा की मिसाल था, शहादत के मैदान में पहुंच गया।
नमाज़-ए-जनाज़ा को तीन मराहिल में अदा किया गया। पहले शहीद राहबर की, फिर उनकी बेटी, बहू और दामाद की, और अंत में नवासी की अलग नमाज़। यह व्यवस्था शहीद परिवार के प्रति गहरी संवेदना और सम्मान को दर्शाती थी। पहली सफ़ में शहीद इमाम ख़ामेनई (र) के तीनों बेटे मौजूद थे। उनके साथ तमाम रिश्तेदार, आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडर सरदार क़ानी, सरदार वहीदी और सरदार मोहसिन रज़ाई जैसे मुजाहिद मौजूद थे। इन चेहरों पर दृढ़ संकल्प साफ़ दिख रहा था कि शहादत इस परिवार और इस क्रांति को कमज़ोर नहीं कर सकती, बल्कि और मज़बूत बनाएगी।
इमाम ख़ामेनई (र): एक युग का प्रतीक
इमाम सय्यद अली ख़ामेनई (र) 1989 से 2026 तक ईरानी इस्लामी गणराज्य के सुप्रीम लीडर रहे। इमाम ख़ुमैनी (र) के बाद उन्होंने इस क्रांति को न सिर्फ़ बचाया बल्कि उसे क्षेत्रीय और वैश्विक ताकत बनाया। उनका जीवन सादगी, ज़ाहिदाना मिज़ाज और अटूट इरादे का नाम था। उन्होंने अमेरिका और इज़राइल के दबावों का डटकर मुकाबला किया, फिलिस्तीन, लेबनान, यमन और पूरे मुस्लिम उम्माह के लिए आवाज़ बने। उनके शासनकाल में ईरान ने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल तकनीक और क्षेत्रीय प्रतिरोध की शक्ति हासिल की।
शहीद राहबर का परिवार भी इसी जज़्बे का हिस्सा था। उनकी बेटियाँ और बहू मुजाहिदा की मिसाल थीं। शहीद डॉक्टर मिस्बाहुल हुदा बाक़िरी कनी जैसे दामाद ने चिकित्सा क्षेत्र में सेवा के साथ-साथ क्रांतिकारी विचारों को बढ़ावा दिया। 14 माह की छोटी ज़हरा की शहादत पूरे विश्व को दिखाती है कि इस्लामी क्रांति के दुश्मन कितने क्रूर हैं। वे बच्ची भी नहीं बख्शते।
जनाज़ा में करोड़ों की शिरकत: ईमान का प्रदर्शन
इब्तिदाई आंकड़ों के मुताबिक़ इस नमाज़-ए-जनाज़ा में एक करोड़ से ज़्यादा लोगों ने शिरकत की। तेहरान की सड़कें, गलियाँ और मूसल्ला की विशाल जगह लोगों से भरी हुई थी। महिलाएँ काली चादरों में, बच्चे माता-पिता के कंधों पर, बुजुर्ग लाठियों के सहारे – सब एक जज़्बे के साथ आए थे। कुछ लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आए। पानी की बोतलें, खाना और दवाइयाँ बांटी जा रही थीं। स्वयंसेवक गर्मी से बचाने के लिए छाया और पानी के स्प्रे का इंतजाम कर रहे थे।
विदेशी मेहमानों की भी बड़ी तादाद थी। विभिन्न इस्लामी देशों के प्रतिनिधि, मुजाहिदीन गुट, और क्रांतिकारी संगठनों के नेता मौजूद थे। भारत सहित कई देशों से डेलिगेशन पहुंचे। यह जनाज़ा सिर्फ़ शोक सभा नहीं, बल्कि इस्लामी एकता और प्रतिरोध की रैली थी।
ऐतिहासिक संदर्भ और विरासत
यह जनाज़ा इमाम ख़ुमैनी (र) के जनाज़े की याद दिलाता है, जब करोड़ों लोग सड़कों पर उमड़े थे। ख़ामेनई (र) ने ख़ुमैनी (र) की विरासत को आगे बढ़ाया। उन्होंने “मुक्ति का रास्ता शहादत है” का नारा ज़िंदा रखा। आज उनका परिवार शहीद हो गया है, लेकिन उनका संदेश ज़िंदा है।
ईरान के नए सुप्रीम लीडर और पूरे सिस्टम ने एकजुटता दिखाई। सरदारों और कमांडरों की मौजूदगी से साफ़ है कि ईरान की डिफेंस और प्रतिरोध की नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा। “शहीदों का ख़ून ज़ाया नहीं जाएगा” – यह नारा आज हर जुबान पर है।
भावनात्मक आयाम
जब छोटी ज़हरा का ताबूत आया, तो कई लोग बेकाबू हो गए। 14 माह की मासूम बच्ची, जो अभी दुनिया देखना शुरू भी नहीं कर पाई थी, दुश्मन की बर्बरता का शिकार बन गई। सय्यदा बुशरा ख़ामेनई की शहादत बेटियों की बहादुरी की मिसाल है। वे न सिर्फ़ पिता की बेटी बल्कि क्रांति की सिपाही थीं।
नौहों में जब “बच्ची को गोद में लेकर आई थीं माँ, आज ताबूत में सुला रही हैं” जैसी पंक्तियाँ सुनाई दीं, तो माहौल सन्नाटे में डूब गया। फिर नारे गूंजे और संकल्प मज़बूत हुआ।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं
दुनिया भर में इस जनाज़े पर प्रतिक्रियाएं आईं। मुस्लिम देशों में शोक व्यक्त किया गया। कुछ पश्चिमी मीडिया ने इसे “क्रूर हमले” का नतीजा बताया, जबकि प्रतिरोधी गुटों ने इसे नया जज़्बा बताया। फिलिस्तीन, लेबनान, इराक और यमन में भी श्रद्धांजलि सभाएं हुईं।
शहीद अमर है
यह जनाज़ा सिर्फ़ अलविदा नहीं, बल्कि नया इरादा था। इमाम ख़ामेनई (र) और उनके परिवार ने दिखा दिया कि सच्चे मुसलमान दुश्मन के हमलों से नहीं डरते। उनका ख़ून नई पीढ़ी को प्रेरित करेगा। ईरान आज भी खड़ा है। क्रांति ज़िंदा है। राहबर की विरासत ज़िंदा है।
“हर शहीद के ख़ून से नई क्रांति पैदा होती है।”
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 5 Jul 2026