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Friday, 24 July 2026

"आजाद थे, आजाद हैं, आजाद ही रहेंगे": अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की 120वीं जयंती पर शत-शत नमन

"आजाद थे, आजाद हैं, आजाद ही रहेंगे": अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की 120वीं जयंती पर शत-शत नमन
-Friday World Jul 24 2026 
23 जुलाई 2026। आज वो दिन है जब भारत माँ के सबसे निर्भीक सपूत ने इस धरती पर कदम रखा था। 120 साल पहले इसी दिन एक ऐसी लौ जली थी जिसने गुलामी की अंधेरी रात को चुनौती दी। 

पुज्य क्रांतिकारी, अमर शहीद, कमांडर इन चीफ - एच.एस.आर.ए. हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के चंदू पंडित जी, चंद्रशेखर आजाद को आज पुष्प अर्पित कर नमन।

जन्म: 23 जुलाई 1906 - एक क्रांति का आगमन

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गांव, जो अब अलीराजपुर जिले में है, में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव का रहने वाला था।

बचपन का नाम था चंद्रशेखर तिवारी। लोग प्यार से उन्हें "चंदू" भी बुलाते थे। पिता संस्कृत के विद्वान थे और आजीविका के लिए भाबरा रियासत में नौकरी करते थे। इसी कारण चंद्रशेखर का बचपन जंगलों और पहाड़ों के बीच बीता। यहीं से उनमें स्वाभिमान और निडरता के बीज पड़े।

बाद में परिवार वापस बदरका लौट आया। वहां से वे संस्कृत पढ़ने के लिए काशी चले गए। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड और असहयोग आंदोलन ने 15 साल के चंद्रशेखर की सोच बदल दी।

"आजाद" नाम कैसे पड़ा?

1921 में पहली बार अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया। मजिस्ट्रेट ने नाम पूछा तो उन्होंने कहा "नाम: आजाद"। पिता का नाम पूछा तो बोले "पिता: स्वतंत्रता"। घर का पता पूछा तो जवाब मिला "जेल"। 

उस दिन से चंद्रशेखर तिवारी, चंद्रशेखर "आजाद" बन गए। और ये नाम उन्होंने आखिरी सांस तक सच कर दिखाया।

क्रांति की राह: एच.एस.आर.ए. के कमांडर इन चीफ

आजाद पहले क्रांतिकारी दल में शामिल हुए, फिर 1928 में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और अन्य साथियों के साथ मिलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन - एच.एस.आर.ए. का गठन किया। 

लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्या, असेम्बली में बम फेंकने की घटना और काकोरी कांड के बाद एच.एस.आर.ए. ब्रिटिश सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया।

1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के गिरफ्तार होने के बाद आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी चंद्रशेखर आजाद के कंधों पर आ गई। वो एच.एस.आर.ए. के कमांडर इन चीफ बने। 

आजाद का मानना था कि सिर्फ बम और गोली से नहीं, बल्कि विचार से क्रांति आएगी। इसलिए उन्होंने युवाओं को संगठित किया, हथियार जुटाए और गुप्त रूप से पूरे देश में नेटवर्क बनाया। पुलिस उन्हें "कुख्यात अपराधी नं. 1" कहती थी, लेकिन जनता उन्हें "आज़ाद" कहती थी।

उनकी सबसे बड़ी ताकत थी: वो कभी एक जगह 24 घंटे से ज्यादा नहीं रुकते थे। वेश बदलना, कोड भाषा बोलना, रातों-रात शहर बदल देना - ये उनकी दिनचर्या थी।

शहादत: 27 फरवरी 1931 - इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क

ब्रिटिश सरकार आजाद को जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहती थी। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आजाद अपने एक साथी सुखदेव राज से मिले थे। मुखबिरी के कारण पुलिस ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया।

सी.आई.डी. के एसपी नॉट बाबर और सैकड़ों पुलिसकर्मी थे। आजाद के पास सिर्फ एक माउजर पिस्तौल और कुछ गोलियां थीं। 

कई घंटे तक चली मुठभेड़ में आजाद ने अकेले ही पुलिस को रोके रखा ताकि उनका साथी भाग सके। जब गोलियां खत्म होने लगीं तो उन्होंने आखिरी गोली खुद को मार ली। 

मरने से पहले उन्होंने कसम खाई थी: "मैं कभी गिरफ्तार नहीं होऊंगा और हमेशा आजाद रहूंगा।" उन्होंने ये कसम निभाई। 

उस दिन पार्क का नाम ही "चंद्रशेखर आजाद पार्क" पड़ गया।

आजाद शहीद हुए तब उनकी उम्र सिर्फ 24 साल, 7 महीने और 4 दिन थी।

आजाद का विचार और विरासत

1. स्वतंत्रता सर्वोपरि: उनके लिए देश की आजादी से बड़ा कुछ नहीं था। "दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे" - ये सिर्फ नारा नहीं था।
2. समाजवाद: एच.एस.आर.ए. के घोषणा पत्र में उन्होंने लिखा कि आजादी के बाद भारत में शोषण मुक्त समाज बनेगा। किसान, मजदूर और आम जनता का राज होगा।
3. युवा शक्ति: आजाद मानते थे कि देश का भविष्य युवाओं के हाथ में है। उन्होंने हजारों युवाओं को देशभक्ति की प्रेरणा दी।

आज 120 साल बाद भी जब कोई अन्याय देखता है तो "आजाद" नाम जुबान पर आ जाता है।

आज के दिन हम क्या करें?

120वीं जयंती पर सिर्फ माल्यार्पण काफी नहीं है। आजाद ने जो सपना देखा था उसे पूरा करना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

- पढ़ें: उनकी जीवनी और एच.एस.आर.ए. के पत्र पढ़ें
- सिखें: स्वाभिमान से जीना और अन्याय के खिलाफ खड़े होना 
- करें: समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाएं

चंद्रशेखर आजाद अमर हैं क्योंकि वो विचार हैं। विचार कभी मरते नहीं।

तारीखें एक बार फिर:
- जन्म: 23 जुलाई 1906, भाबरा, मध्य प्रदेश
- शहादत: 27 फरवरी 1931, अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद
- संगठन: हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी, कमांडर इन चीफ

आज 23 जुलाई 2026 को, उनकी 120वीं जयंती पर हम सब मिलकर कहें: 

"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा"

कोटि-कोटि नमन, चंदू पंडित जी। जय हिन्द।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Jul 24 2026 


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