-Friday World Jul 25 2026
वॉशिंगटन/मैड्रिड.
जहां देखो ट्रंप "दो-दो हाथ" करने में लगे हैं। कभी ईरान, कभी चीन, और अब अपने सबसे पुराने सहयोगी स्पेन से ही भिड़ गए। वजह बना ईरान के खिलाफ चल रहा अमेरिकी सैन्य अभियान और स्पेन में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका चाहता है कि स्पेन में स्थित संयुक्त सैन्य बेस से ईरान पर हो रही कार्रवाई के लिए लॉजिस्टिक और फ्यूलिंग सपोर्ट लिया जाए। लेकिन स्पेन ने साफ मना कर दिया।
मामला क्या है?
अमेरिका और स्पेन के बीच दशकों पुराना रक्षा समझौता है। इसके तहत स्पेन में रोता और मोरोन जैसे बड़े अमेरिकी एयरबेस हैं। यहां करीब 3,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।
अब जब ईरान के खिलाफ ऑपरेशन तेज हुए, तो पेंटागन ने स्पेन से इन अड्डों का ज्यादा इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी। स्पेन की सरकार ने कहा - "नहीं"।
स्पेन का तर्क है कि वो इस संघर्ष में सीधे शामिल नहीं होना चाहता और यूरोप में शांति-डिप्लोमेसी का रास्ता चाहता है।
ट्रंप की कड़ी चेतावनी
इस इनकार से बौखलाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीधी धमकी दे दी।
उन्होंने कहा, _"अगर स्पेन हमें अपने बेस इस्तेमाल नहीं करने देगा, तो हम व्यापार समझौतों पर फिर से सोचेंगे। और वहां तैनात 3000 अमेरिकी सैनिकों को भी वापस बुला लेंगे। स्पेन को इसका अंदाजा नहीं है कि वो क्या खो रहा है।"_
ट्रंप का इशारा साफ था - सैन्य सहयोग के बदले व्यापार और सुरक्षा की गारंटी।
स्पेन का पलटवार
ट्रंप के बयान के कुछ घंटे बाद ही स्पेन के प्रधानमंत्री ने जवाब दिया। और जवाब भी कम तीखा नहीं था।
उन्होंने कहा, _"स्पेन अपनी विदेश नीति और सुरक्षा नीति किसी के दबाव में तय नहीं करता। हम धमकियों से डरने वाले नहीं हैं और न ही अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता करेंगे। अगर अमेरिका अपने सैनिक वापस बुलाना चाहता है, तो बुला ले। इससे स्पेन की सुरक्षा पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।"*
स्पेन का ये स्टैंड यूरोप में चर्चा का विषय बन गया है।
ये सिर्फ अड्डों की लड़ाई नहीं है
विश्लेषकों का मानना है कि ये टकराव सिर्फ 2 एयरबेस तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 3 बड़ी वजहें हैं:
1. ईरान नीति पर मतभेद: अमेरिका ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहता है। जबकि स्पेन समेत कई यूरोपीय देश कूटनीति और बातचीत के पक्ष में हैं।
2. NATO के अंदर दरार: ट्रंप पहले भी NATO देशों पर "रक्षा खर्च कम करने" का आरोप लगा चुके हैं। स्पेन का ये कदम NATO एकता को कमजोर दिखाता है।
3. यूरोप-अमेरिका का रणनीतिक अंतर: यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप चाहता है कि वो अमेरिका पर कम निर्भर हो। स्पेन का ये रुख उसी "स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी" का हिस्सा माना जा रहा है।
आगे क्या होगा?
अभी दोनों देश पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे।
अगर अमेरिका वाकई 3000 सैनिक वापस बुलाता है तो स्पेन की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा, क्योंकि इन बेस से जुड़े हजारों स्पेनिश नागरिकों को रोजगार मिलता है।
वहीं अगर अमेरिका व्यापार समझौते रोकता है तो स्पेन के कृषि और ऑटो सेक्टर को झटका लग सकता है।
दूसरी तरफ NATO के अन्य देश भी चुपचाप देख रहे हैं। अगर स्पेन इस दबाव में नहीं झुका, तो जर्मनी, फ्रांस जैसे देश भी अमेरिका के सामने ज्यादा सख्त रुख अपना सकते हैं।
एक तरफ ईरान के खिलाफ मोर्चा, दूसरी तरफ अपने सहयोगी से ही जंग। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति अब NATO के अंदर भी दरार डाल रही है।
स्पेन ने साफ कर दिया है कि वो किसी की धमकी में नहीं आएगा। और ट्रंप ने भी कह दिया है कि वो झुकेंगे नहीं।
अब देखना ये है कि ये "दो-दो हाथ" की लड़ाई कूटनीति से सुलझती है या ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में एक नई खाई बना देती है।
फिलहाल इतना तय है - अमेरिका-स्पेन संबंधों में पिछले 40 साल का सबसे बड़ा तनाव चल रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
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