- Friday World Jul 11 2026
लेबनान, मध्य पूर्व का यह छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश, दशकों से राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक विभाजन और क्षेत्रीय तनावों की चपेट में रहा है। ऐसे में जब अल-अखबार की रिपोर्ट के अनुसार लेबनानी सेना के कमांडर जनरल रुडोल्फ हेकाल (रोडोल्फ हायकल) ने राष्ट्रपति जोसेफ औन को स्पष्ट संदेश दिया कि सेना को राजनीतिक विवादों में हेरफेर या खींचा नहीं जा सकता, तो यह खबर न केवल लेबनान बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। जनरल हेकाल का यह स्टैंड सेना की संस्थागत अखंडता, राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
यह घटना लेबनान की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों के बीच आई है, जहां विभिन्न गुट, सांप्रदायिक दलों और विदेशी प्रभावों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। सेना, जो देश की सबसे विश्वसनीय और एकजुट संस्था मानी जाती है, को राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार अपनी ओर खींचने की कोशिशें की जाती रही हैं। जनरल हेकाल का यह चेतावनी भरा संदेश स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि सेना को ऐसे विवादों में शामिल किया गया तो इसकी कीमत केवल सेना का विभाजन ही नहीं, बल्कि पूरी राज्य व्यवस्था का पतन भी हो सकती है।
लेबनान की सेना: राष्ट्रीय एकता का प्रतीक
लेबनानी आर्म्ड फोर्सेज (LAF) देश के इतिहास में हमेशा से एक तटस्थ और पेशेवर संस्था के रूप में उभरी है। 1975-1990 के गृहयुद्ध के दौरान भी, जब देश विभिन्न मिलिशिया गुटों में बंटा हुआ था, सेना ने अपनी एकता बनाए रखने की कोशिश की। हालांकि, युद्ध के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में भी सेना को राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ा।
जनरल जोसेफ औन खुद पूर्व में सेना प्रमुख रह चुके हैं और 2025 में राष्ट्रपति पद संभाला है। उनके कार्यकाल में सेना की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है, खासकर इजराइल-हेजबुल्लाह तनाव, सीरियाई शरणार्थियों की समस्या, आर्थिक संकट और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों के बीच। ऐसे में नए सेना प्रमुख जनरल रुडोल्फ हेकाल, जिनकी नियुक्ति मार्च 2025 में हुई, का यह रुख सेना की परंपरागत तटस्थता को मजबूत करने वाला है।
अल-अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, जनरल हेकाल ने राष्ट्रपति को बताया कि सेना को किसी भी राजनीतिक गुट की ओर झुकाव या हेरफेर से बचाना जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सेना को राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया गया तो यह न केवल सैनिकों के बीच विभाजन पैदा करेगा, बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देगा। यह संदेश उन हालात में आया है जब लेबनान में सरकार गठन, सुधारों के मुद्दे और क्षेत्रीय गठबंधनों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: सेना पर दबाव की लंबी कहानी
लेबनान की राजनीति सांप्रदायिक आधार पर टिकी हुई है। ताऊफ संधि (1943) के तहत राष्ट्रपति पद मरोनाइट ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और स्पीकर शिया मुस्लिम के लिए आरक्षित है। यह व्यवस्था एक संतुलन बनाए रखती है, लेकिन अक्सर लचर और भ्रष्टाचार को जन्म देती है। 2005 के बाद से, जब पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरिरी की हत्या के बाद सीरियाई सेना की वापसी हुई, राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ा। हेजबुल्लाह जैसे समूहों का उदय, इजराइल के साथ संघर्ष और ईरान-सऊदी प्रभाव की प्रतिस्पर्धा ने स्थिति को जटिल बना दिया।
2019 के आर्थिक संकट और 2020 के बेरूत बंदरगाह विस्फोट के बाद जनता में राज्य संस्थाओं के प्रति आक्रोश बढ़ा। इस दौरान सेना ने शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा उसे अपनी ओर खींचने की कोशिशें जारी रहीं। 2022-2025 के राष्ट्रपति चुनाव संकट में भी सेना की भूमिका चर्चा में रही। जोसेफ औन के राष्ट्रपति बनने के बाद उम्मीद थी कि सैन्य पृष्ठभूमि वाला नेता सुधार लाएगा, लेकिन वास्तविकता में पुराने घाव और नए विवाद उभर रहे हैं।
जनरल हेकाल का संदेश इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेना का प्राथमिक कर्तव्य राष्ट्र की रक्षा, सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता बनाए रखना है, न कि राजनीतिक दलों के एजेंडे को लागू करना। यदि सेना विभाजित हुई तो लेबनान जैसे छोटे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।
वर्तमान चुनौतियां: आर्थिक संकट, सीमा तनाव और विदेशी हस्तक्षेप
लेबनान आज गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। मुद्रा का अवमूल्यन, मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और बुनियादी सेवाओं का अभाव आम बात है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य संस्थाओं से सहायता लेने के लिए सुधारों की मांग की जा रही है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बाधा बन रही है।
दक्षिणी लेबनान में इजराइल के साथ तनाव, UNIFIL शांति बल की भूमिका और हेजबुल्लाह की सैन्य क्षमता एक बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से सेना को मजबूत करने और हेजबुल्लाह को नियंत्रित करने की अपील की जाती रही है। ऐसे में सेना को राजनीतिक दबाव में फंसाने से उसकी व्यावसायिकता प्रभावित हो सकती है।
जनरल हेकाल ने संभवतः यही महसूस किया कि यदि राष्ट्रपति या अन्य नेता सेना को किसी एक पक्ष के विरुद्ध उपयोग करने की कोशिश करेंगे तो सैनिकों के बीच सांप्रदायिक या राजनीतिक विभाजन उभर सकता है। लेबनानी सेना में विभिन्न समुदायों के सैनिक शामिल हैं, और उसकी ताकत इसी विविधता और एकता में है।
संस्थागत अखंडता का महत्व
किसी भी लोकतंत्र में सेना की तटस्थता लोकतंत्र की रक्षा करती है। पाकिस्तान, मिस्र या अन्य देशों के उदाहरण दिखाते हैं कि जब सेना राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल होती है तो लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं। लेबनान के संदर्भ में, जहां राज्य की संस्थाएं पहले से ही कमजोर हैं, सेना की अखंडता अंतिम सहारा है।
जनरल हेकाल का यह कदम सेना के भीतर एक मजबूत संदेश भी है। यह युवा अधिकारियों और सैनिकों को बताता है कि उनका कर्तव्य राष्ट्र के प्रति है, किसी व्यक्ति या गुट के प्रति नहीं। इससे सेना की नैतिकता और व्यावसायिकता बढ़ेगी।
राष्ट्रपति जोसेफ औन, जो खुद लंबे समय तक सेना के प्रमुख रहे, इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे, ऐसा उम्मीद की जा रही है। उनके कार्यकाल में सेना को मजबूत बनाने, भर्ती बढ़ाने और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन राजनीतिक दबाव से बचना ही सबसे बड़ा सुधार होगा।
क्षेत्रीय प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय नजरिया
लेबनान की स्थिरता पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित करती है। सीरिया, इजराइल, ईरान और सऊदी अरब सभी यहां के विकास पर नजर रखे हुए हैं। यदि लेबनानी सेना विभाजित हुई तो क्षेत्रीय शक्तियां और हस्तक्षेप बढ़ा सकती हैं, जिससेproxy wars की स्थिति बन सकती है।
अमेरिका, फ्रांस और यूरोपीय संघ लेबनानी सेना को सहायता देते रहे हैं, क्योंकि उन्हें इसे एक तटस्थ बल के रूप में देखा जाता है। जनरल हेकाल का स्टैंड इस सहायता को जारी रखने में मददगार साबित हो सकता है।
भविष्य की राह: सुधार और एकता
इस घटना के बाद लेबनान के लिए क्या रास्ता है? सबसे पहले, राजनीतिक दलों को सेना को तटस्थ रखने का सम्मान करना चाहिए। राष्ट्रपति और सरकार को सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए – भ्रष्टाचार पर अंकुश, आर्थिक पुनरुद्धार, शरणार्थी समस्या का समाधान और ऊर्जा व बुनियादी ढांचे का विकास।
सेना को भी अपनी क्षमता बढ़ानी चाहिए, साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी और सांप्रदायिक सद्भाव पर काम करना चाहिए। नागरिक समाज, मीडिया और युवा पीढ़ी को भी संस्थागत अखंडता की रक्षा के लिए आवाज उठानी चाहिए।
जनरल रुडोल्फ हेकाल का यह संदेश लेबनान के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह याद दिलाता है कि मजबूत संस्थाएं ही राष्ट्र को बचाती हैं, न कि व्यक्तिगत या गुटबाजी के एजेंडे। यदि लेबनान इस चेतावनी को सही मायने में समझा और लागू किया तो देश न केवल संकट से उबर सकता है बल्कि एक मजबूत, समृद्ध और एकजुट राष्ट्र के रूप में उभर सकता है।
यह समय परीक्षा का है। राजनीतिक नेतृत्व को दिखाना होगा कि वे सेना की चेतावनी को राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र हित में स्वीकार करते हैं। लेबनान के लोग, जो दशकों से अस्थिरता झेल रहे हैं, शांति और समृद्धि के हकदार हैं। सेना की अखंडता इस सपने को साकार करने की कुंजी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Jul 11 2026