-Friday World Jul 25 2026
वॉशिंगटन/तेहरान।
ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के भीतर ही सियासी जंग छिड़ गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बिना संसद की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई आगे बढ़ाने के फैसले पर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने कड़ा विरोध जता दिया है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक प्रस्ताव भारी बहुमत से पास कर दिया है जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति को ईरान के खिलाफ आगे कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई करने से पहले संसद से औपचारिक अनुमति लेनी होगी।
विपक्षी डेमोक्रेट्स के साथ-साथ सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उनका कहना है कि ट्रंप का फैसला अमेरिका को "तीसरे विश्व युद्ध" की तरफ धकेल रहा है।
वहीं दूसरी तरफ व्हाइट हाउस और पेंटागन अपने फैसले पर अड़े हुए हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि अमेरिकी हितों और खाड़ी में तैनात सैनिकों की सुरक्षा के लिए हवाई हमले जारी रहेंगे। इससे वॉशिंगटन में कार्यपालिका और विधायिका के बीच टकराव अब अपने चरम पर पहुंच गया है।
संसद में क्या हुआ?
शुक्रवार देर रात प्रतिनिधि सभा में 8 घंटे तक बहस चली। बहस का मुद्दा था "War Powers Resolution" यानी युद्ध शक्ति कानून। इस कानून के तहत राष्ट्रपति बिना संसद की मंजूरी के 60 दिन से ज्यादा किसी युद्ध में सेना नहीं रख सकते।
प्रस्ताव के पक्ष में 260 और विरोध में 165 वोट पड़े। हैरानी की बात ये रही कि 25 रिपब्लिकन सांसदों ने भी अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ वोट किया।
प्रस्ताव पेश करने वाले डेमोक्रेट नेता ने कहा, "एक आदमी के फैसले से हम 330 मिलियन अमेरिकियों को युद्ध में नहीं झोंक सकते। ये संविधान का सवाल है, पार्टी का नहीं।"
एक रिपब्लिकन सांसद ने कहा, "हम ट्रंप का समर्थन करते हैं, लेकिन युद्ध का बटन दबाने से पहले देश को भरोसे में लेना जरूरी है।"
ट्रंप और व्हाइट हाउस का जवाब
प्रस्ताव पास होते ही व्हाइट हाउस से तीखी प्रतिक्रिया आई। प्रेस सचिव ने कहा, "राष्ट्रपति कमांडर-इन-चीफ हैं। जब अमेरिकी सैनिकों की जान खतरे में हो तो संसद से पूछने का समय नहीं होता।"
पेंटागन ने भी बयान जारी कर कहा कि होर्मुज में हमले के बाद अमेरिकी बेड़े और ठिकानों पर खतरा बढ़ गया है। इसलिए "रक्षात्मक हवाई हमले" जारी रहेंगे।
सूत्रों के मुताबिक ट्रंप ने अपने करीबी सलाहकारों से कहा है कि "मैं कमजोर नहीं दिखना चाहता। अगर हम रुके तो दुनिया हमें कमजोर समझेगी।"
"तीसरा विश्व युद्ध" का डर
संसद में बहस के दौरान "WW3" शब्द बार-बार गूंजा। कई सांसदों ने कहा कि ईरान के पास मिसाइलें, ड्रोन और क्षेत्र में सहयोगी गुट हैं। अगर अमेरिका ने हमले तेज किए तो इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में भी आग भड़क सकती है।
एक सीनेटर ने कहा, "हमने इराक युद्ध में 20 साल गंवाए। क्या हम फिर वही गलती दोहराएंगे?"
वहीं ट्रंप समर्थक सांसदों का तर्क है कि "शांति ताकत से आती है। अगर हम अभी पीछे हटे तो ईरान और ताकतवर हो जाएगा और आगे और हमले करेगा।"
अमेरिका के अंदर दो फाड़
इस मुद्दे पर अमेरिका दो हिस्सों में बंटता दिख रहा है।
युद्ध विरोधी: कॉलेज कैंपस, न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स में "No War With Iran" के पोस्टर लगे हैं। सोशल मीडिया पर #NoMoreWars ट्रेंड कर रहा है। लोग कह रहे हैं कि महंगाई, स्वास्थ्य और नौकरियों पर पैसा खर्च होना चाहिए।
युद्ध समर्थक: कई सैन्य परिवार और कट्टरपंथी समूह कह रहे हैं कि अमेरिका को कमजोर नहीं दिखना चाहिए। फॉक्स न्यूज पर पैनलिस्ट कह रहे हैं, "अगर हमने जवाब नहीं दिया तो कल चीन और रूस भी हिम्मत करेंगे।"
दुनिया क्या सोच रही है?
इस घरेलू घमासान का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।
- इजराइल: ट्रंप के फैसले का समर्थन कर रहा है।
- यूरोप: फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने संयम बरतने की अपील की है।
- रूस और चीन: कह रहे हैं कि अमेरिका "अंतरराष्ट्रीय कानून" तोड़ रहा है।
- भारत: विदेश मंत्रालय ने कहा है कि हम सभी पक्षों से बातचीत के जरिए तनाव कम करने की अपील करते हैं।
तेल की कीमतें फिर 5% बढ़ गई हैं। शेयर बाजार में गिरावट है।
आगे क्या होगा?
अब गेंद सीनेट के पाले में है। अगर सीनेट भी इसी तरह का प्रस्ताव पास कर देती है तो ट्रंप के लिए मुश्किल बढ़ जाएगी। हालांकि ट्रंप इसे "वीटो" कर सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2026 के चुनाव नजदीक हैं। ट्रंप युद्ध को "मजबूत नेता" वाली छवि के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, जबकि विपक्ष इसे "लापरवाही" बता रहा है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा, "ये सिर्फ ईरान का मुद्दा नहीं है। ये सवाल है कि अमेरिका में युद्ध का फैसला कौन करेगा - व्हाइट हाउस या कैपिटल हिल?"
होर्मुज में धमाके के बाद अमेरिका अब दो मोर्चों पर लड़ रहा है। एक बाहर ईरान के साथ, और दूसरा अंदर अपनी ही संसद के साथ।
व्हाइट हाउस कह रहा है "हम रुकेंगे नहीं" और संसद कह रही है "बिना पूछे एक कदम भी नहीं।"
अगले कुछ दिन तय करेंगे कि अमेरिका युद्ध की तरफ जाएगा या बातचीत की मेज पर लौटेगा। लेकिन इतना तय है कि इस फैसले से आने वाले दशकों की अमेरिकी विदेश नीति लिखी जाएगी।
Sajjadali Nayani ✍
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