-Friday World Jul 10 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अफगानिस्तान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बगराम एयरबेस (Bagram Air Base) पर कब्जा करने का सपना देख रहे हैं, लेकिन तालिबान ने इसे साफ-साफ सपनों तक ही सीमित कर दिया है। तालिबान सरकार के सूचना एवं संस्कृति मंत्री मुहाजिर फराही ने ट्रम्प पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा है कि यह एयरबेस अब अमेरिका के हाथ कभी नहीं आएगा। उनका बयान न केवल ट्रम्प की नीति पर व्यंग्य है बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों के लिए भी एक मजबूत संदेश है।
मुहाजिर फराही ने कहा, **“ट्रम्प बगराम एयरबेस वापस पाने का सपना केवल नींद में ही देख सकते हैं।”** उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी सेना का यह पुराना ठिकाना अब कभी उनके कब्जे में नहीं आएगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ट्रम्प बार-बार अफगानिस्तान में वापसी और बगराम जैसे ठिकानों पर नियंत्रण की बात कर रहे हैं।
बगराम एयरबेस: इतिहास और सामरिक महत्व
बगराम एयरबेस काबुल से उत्तर में स्थित एक विशाल सैन्य अड्डा है, जिसकी रणनीतिक अहमियत दुनिया भर में जानी जाती है। इसकी शुरुआत सोवियत संघ ने की थी। 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण के दौरान यह उनके लिए प्रमुख आधार बना। 1989 में सोवियत सेना के वापस जाने के बाद यह एयरबेस विभिन्न गुटों के नियंत्रण में रहा।
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने जब अफगानिस्तान में अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ अभियान शुरू किया, तब बगराम को अपना मुख्य सैन्य अड्डा बनाया। यहां से अमेरिकी और नाटो बलों ने पूरे क्षेत्र में ऑपरेशन चलाए। इस एयरबेस पर हजारों सैनिक तैनात रहते थे और यह लॉजिस्टिक्स, खुफिया जानकारी तथा हवाई हमलों का केंद्र था।
अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना के अचानक निकासी के बाद तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया और बगराम एयरबेस भी उनके नियंत्रण में आ गया। अमेरिका के इस अचानक फैसले की दुनिया भर में आलोचना हुई थी, क्योंकि लाखों डॉलर की संपत्ति और अत्याधुनिक उपकरण तालिबान के हाथ लग गए।
ट्रम्प का तर्क है कि बगराम चीन की सीमा के करीब होने के कारण अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के लिए बेहद जरूरी है। चीन के बढ़ते प्रभाव, पाकिस्तान-तालिबान संबंधों और क्षेत्रीय आतंकवाद को देखते हुए वे इसे वापस हासिल करना चाहते हैं। ट्रम्प इसे “सबसे अच्छा सौदा” बताते रहे हैं, लेकिन तालिबान इसे बिल्कुल स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
तालिबान का कड़ा रुख और पाकिस्तान को चेतावनी
मंत्री मुहाजिर फराही का बयान सिर्फ ट्रम्प तक सीमित नहीं रहा। तालिबान ने पाकिस्तान को भी आड़े हाथों लिया है। हाल के दिनों में पाकिस्तान पर तालिबान समर्थित या पाकिस्तान स्थित तत्वों द्वारा हमलों के आरोप लग रहे हैं। तालिबान ने साफ संदेश दिया है कि कोई भी विदेशी ताकत या पड़ोसी देश अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दे सकता।
फराही ने कहा कि अफगानिस्तान अब किसी की कठपुतली नहीं बनेगा। पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि अगर इस्लामाबाद तालिबान विरोधी ताकतों का समर्थन करता रहा तो उसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ा हुआ है और दोनों देशों के बीच टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) जैसे मुद्दे उलझे हुए हैं।
भू-राजनीतिक परिदृश्य: अमेरिका, चीन, रूस और भारत
बगराम एयरबेस पर नियंत्रण केवल एक सैन्य ठिकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मध्य एशिया की भू-राजनीति से जुड़ा है।
- चीन के लिए अफगानिस्तान खनिज संसाधनों और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का हिस्सा है। चीन तालिबान सरकार को मान्यता देने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने में लगा हुआ है।
- रूस पहले से ही अफगानिस्तान में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
- भारत के लिए स्थिर अफगानिस्तान सुरक्षा की दृष्टि से जरूरी है, लेकिन तालिबान शासन के बाद संबंध जटिल हो गए हैं।
ट्रम्प की वापसी की इच्छा अमेरिका की “इंडो-पैसिफिक” रणनीति और चीन को घेरने की नीति से भी जुड़ी है। लेकिन 20 साल की लंबी जंग के बाद अमेरिकी जनता अफगानिस्तान में फिर फंसने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस और पेंटागन के अंदर भी इस पर विभाजित राय है।
तालिबान की मजबूत स्थिति और चुनौतियां
तालिबान 2021 के बाद से अपने नियंत्रण को मजबूत कर चुका है। हालांकि, आर्थिक संकट, मानवाधिकार मुद्दे (महिलाओं की शिक्षा पर पाबंदी) और अंतरराष्ट्रीय मान्यता की कमी उनके लिए बड़ी चुनौती है। फिर भी, बगराम जैसे प्रतीकात्मक ठिकानों पर कब्जा उन्हें घरेलू स्तर पर मजबूती देता है।
तालिबान का कहना है कि अफगानिस्तान अब किसी विदेशी सेना का अड्डा नहीं बनेगा। वे इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मानते हैं। मुहाजिर फराही जैसे नेता इस तरह के बयानों से अपनी कठोर छवि को और मजबूत करते हैं।
भविष्य क्या होगा?
ट्रम्प प्रशासन अगर बगराम पर दबाव बढ़ाता है तो कूटनीतिक, आर्थिक या यहां तक कि सैन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है, लेकिन पूरा अभियान फिर से शुरू करना आसान नहीं होगा। तालिबान की सेना और स्थानीय समर्थन को देखते हुए कोई भी विदेशी हस्तक्षेप महंगा साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, क्षेत्रीय सहयोग की गुंजाइश भी है। अगर अफगानिस्तान स्थिर होता है और आतंकवाद पर अंकुश लगता है, तो अमेरिका-तालिबान के बीच कुछ समझौते संभव हो सकते हैं। लेकिन फिलहाल तालिबान का रुख सख्त है।
बगराम एयरबेस की कहानी केवल एक हवाई अड्डे की नहीं, बल्कि महाशक्तियों की महत्वाकांक्षा, क्षेत्रीय संतुलन और अफगान लोगों की संप्रभुता की कहानी है। ट्रम्प का सपना अभी सपना ही रहेगा, जैसा तालिबान कह रहा है। पाकिस्तान सहित पड़ोसी देशों को भी सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि अफगानिस्तान अब 2001 या 2021 वाला अफगानिस्तान नहीं रहा।
यह घटनाक्रम दर्शाता है कि विश्व व्यवस्था में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अमेरिका को अब पुरानी शैली की हस्तक्षेप नीति पर पुनर्विचार करना होगा, जबकि तालिबान को भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में विश्वसनीय साझेदार बनने के लिए सुधार करने होंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Jul 10 2026