-Friday World – 4 जुलाई 2026
दुनिया के इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं – न सिर्फ अपनी क्रूरता के लिए, बल्कि अपनी भयानक गलती के लिए भी। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल द्वारा आयतुल्लाह अली खामेनेई को टारगेट किलिंग के जरिए शहीद करना ठीक वैसी ही एक भूल साबित हो रहा है। जिस हमले को दोनों देश अपनी “सफल सर्जिकल स्ट्राइक” बताते थे, वही आज उनके लिए कूटनीतिक और नैतिक हार बन गया है।
चार महीने बाद, जब ईरान अपने शहीद सुप्रीम लीडर की भव्य अंतिम विदाई मना रहा है, तो दुनिया भर के सरकारी प्रतिनिधि तेहरान, क़ोम, नजफ, करबला और मशहद पहुंच रहे हैं। अमेरिका-इजरायल की सख्ती, धमकियां और दबाव के बावजूद देश-दर-देश के नेता इस ऐतिहासिक मातम में शामिल हो रहे हैं। यह न सिर्फ ईरान की मजबूती का प्रतीक है, बल्कि विश्व व्यवस्था में बदलते समीकरणों का भी स्पष्ट संकेत है।
शहादत का वो काला दिन: 28 फरवरी 2026
अमेरिका-इजरायल युद्ध के पहले दिन ही ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को उनके आवास पर लक्षित हमले में शहीद कर दिया गया। उनके साथ परिवार के चार अन्य सदस्य भी शहीद हुए। यह हमला न सिर्फ एक नेता की हत्या था, बल्कि एक पूरे राष्ट्र और उसके प्रतिरोधी चरित्र पर हमला था।
अमेरिका और इजरायल ने इसे “डिकैपिटेशन स्ट्राइक” बताया – सोचा कि नेता के चले जाने से ईरानी व्यवस्था ढह जाएगी। लेकिन वास्तविकता ठीक उलट निकली। ईरान न सिर्फ टिका रहा, बल्कि आज खामेनेई की शहादत को “शहीद-ए-इनकिलाब” का दर्जा देकर एकजुटता का नया अध्याय लिख रहा है।
दबाव की नाकाम कोशिश: अमेरिका-इजरायल की कूटनीतिक हार
अंतिम रसुमात शुरू होने से पहले अमेरिका और इजरायल ने खुलेआम दबाव बनाया। कई देशों को चेतावनी दी गई कि अगर उन्होंने खामेनेई की अंतिम विदाई में हिस्सा लिया तो “परिणाम भुगतने” पड़ सकते हैं। आर्थिक प्रतिबंधों, कूटनीतिक अलगाव और यहां तक कि सुरक्षा खतरे का हवाला दिया गया।
लेकिन नतीजा? अमेरिका-इजरायल की यह कोशिश बुरी तरह नाकाम हो गई।
रूस, चीन, पाकिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, अल्जीरिया, दक्षिण अफ्रीका, वेनेजुएला, क्यूबा और दर्जनों अन्य देशों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधि तेहरान पहुंच चुके हैं। 100 से अधिक देशों के डेलिगेशन का आना ईरान के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत है। यहां तक कि कुछ पश्चिमी और एशियाई देशों ने भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान जताया है।
यह दबाव की नाकामी साफ दिखाती है कि आज की दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कोई भी देश दूसरे पर अपनी इच्छा नहीं थोप सकता। खामेनेई की शहादत ने यही सबक दिया है।
भव्य अंतिम यात्रा: तेहरान से मशहद तक जन-सैलाब
13 जुलाई 1405 (3 जुलाई 2026) से शुरू हुई यह छह-सात दिन की अंतिम विदाई ईरान के इतिहास की सबसे बड़ी मातमी घटनाओं में से एक है।
ग्रैंड मसल्ला में लाखों लोग पहुंच रहे हैं। महिलाएं काली चादर ओढ़े, युवा मुट्ठी बंद कर “बरखास्त शवद” (उठ खड़ा हो) का नारा लगा रहे हैं। तेहरान की सड़कें काले झंडों और बैनरों से सजी हैं। 10 किलोमीटर लंबा जुलूस निकल रहा है। तेहरान के मेयर का अनुमान है कि राजधानी में ही 1.5 से 2 करोड़ लोग शामिल होंगे।
फिर कार्यक्रम क़ोम, इराक (नजफ-करबला) होते हुए मशहद में इमाम रजा (अ) की हरम में दफन पर समाप्त होगा। यह यात्रा सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक भी है। करबला की याद दिलाती हुई यह यात्रा शहादत की परंपरा को जीवंत कर रही है।
खामेनेई की विरासत: प्रतिरोध का प्रतीक
आयतुल्लाह खामेनेई 36 वर्ष तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे। उन्होंने देश को आर्थिक प्रतिबंधों, साइबर हमलों, क्षेत्रीय साजिशों और अब प्रत्यक्ष युद्ध के दौर से गुजारा।
- परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
- क्षेत्रीय अक्ष (हिजबुल्लाह, हमास, हूती) को मजबूत किया।
- सादगी और इस्लामी मूल्यों पर जोर दिया।
उनके समर्थक उन्हें “रहबर-ए-मुजाहिद” कहते हैं। आलोचक उनकी कड़ी नीतियों की आलोचना करते हैं। लेकिन शहादत के बाद आलोचना भी पीछे छूट गई है। आज पूरा ईरान और बड़ी संख्या में मुस्लिम दुनिया उन्हें श्रद्धांजलि दे रही है।
1989 की याद और 2026 की नई ताकत
1989 में आयतुल्लाह खुमैनी की अंतिम यात्रा के समय भी ईरान युद्ध की छाया में था। आज खामेनेई की विदाई उससे भी बड़े पैमाने पर हो रही है। यह दिखाता है कि ईरानी क्रांति की जड़ें कितनी गहरी हैं।
दुनिया देख रही है कि एक नेता की शहादत व्यवस्था को कमजोर नहीं कर रही, बल्कि और मजबूत बना रही है।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं: बदलते समीकरण
चीन और रूस जैसे देशों ने खुलकर समर्थन जताया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की भागीदारी ने क्षेत्रीय एकजुटता का संदेश दिया। यहां तक कि कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश भी मौजूद हैं।
पश्चिमी मीडिया इसे “ईरान की चुनौती” बता रहा है, लेकिन वास्तव में यह अमेरिका-इजरायल की एकाकीपन की कहानी है। उनकी दबाव नीति उल्टी पड़ गई है।
भविष्य की चुनौतियां और संदेश
अमेरिका-इजरायल को अब समझना होगा कि टारगेट किलिंग कोई समाधान नहीं है। यह नफरत बढ़ाती है, प्रतिरोध को जन्म देती है। खामेनेई की शहादत ने साबित कर दिया कि विचारों को मारना असंभव है।
ईरान के नए नेतृत्व पर नजरें हैं। मुजतबा खामेनेई समेत पूरा सिस्टम इस मातम के बाद और एकजुट नजर आ रहा है।
दुनिया को यह संदेश गया है – दमन और हत्या से क्रांतियां नहीं रुकतीं, वे और मजबूत होती हैं।
तेहरान की गलियों में आज जो लाखों लोग सड़कों पर हैं, वे सिर्फ एक शहीद के लिए नहीं रो रहे। वे एक विचार, एक संघर्ष और एक पूरे भविष्य के लिए खड़े हैं।
“शहीद खामेनेई, तेरा मिशन जारी रहेगा” – यह नारा अब सिर्फ ईरान का नहीं, बल्कि पूरी आजाद ख्वाहिश रखने वाली दुनिया का नारा बन चुका है।
सज्जाद अली नयानी ✍
Friday World – 4 जुलाई 2026