- Friday World 21 Aug 2026
दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था एक बार फिर बदलते हुए नजर आ रही है। शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव लगातार बना हुआ है। इसी बीच ढाका पाकिस्तान और चीन के साथ अपने संबंधों को और मजबूत कर रहा है। अब बांग्लादेश की ओर से ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल होने के संकेत दिए गए हैं, जो भारतीय कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चिंता का विषय बन सकता है।
अगस्त 2026 की शुरुआत में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का में ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने पर उसे तीनों पर हुआ हमला माना जाएगा। यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल 5 की याद दिलाता है, जिसके कारण कई विश्लेषक इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कह रहे हैं। हालांकि तीनों देशों के आधिकारिक बयानों में इसे रक्षात्मक प्रकृति का बताया गया है और कहा गया है कि यह किसी देश के खिलाफ नहीं है तथा अन्य भाईचारे वाले देशों के लिए खुला है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने हाल ही में स्पष्ट संकेत दिए हैं कि बांग्लादेश सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच बने इस नए ढांचे में शामिल होने के विकल्प खुले रख रहा है। उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य और अपनी जरूरतों के आधार पर बांग्लादेश इस गठबंधन के प्रति सकारात्मक रवैया रखता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब शेख हसीना के प्रत्यर्पण के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है।
जुलाई-अगस्त 2024 में ढाका में हुए हिंसक छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को पद और देश दोनों छोड़ने पड़े थे। उन्होंने भारत में शरण ली। बांग्लादेश लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है, जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि वह उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत इस मामले पर विचार कर रहा है। भारत के इस जवाब से बांग्लादेश संतुष्ट नहीं है। इन कड़वाहट भरे मुद्दों के कारण प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत दौरे पर भी अनिश्चितता बनी हुई है। हुमायूं कबीर ने साफ कहा है कि जब तक दोनों देशों के बीच उचित माहौल नहीं बनेगा, तब तक यात्रा मुश्किल लग रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच बांग्लादेश चीन और पाकिस्तान के करीब आ रहा है। तारिक रहमान जून 2026 में चीन की आधिकारिक यात्रा पर गए थे, जहां दोनों देशों ने अपने संबंधों को नई ऊंचाई दी। अब पाकिस्तान के साथ ‘इस्लामिक नाटो’ जैसे ढांचे में शामिल होने का इशारा करके ढाका भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा रहा है।
यह गठबंधन सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता है, तुर्की के पास मजबूत रक्षा उद्योग और नाटो अनुभव है, जबकि सऊदी अरब के पास वित्तीय संसाधन और रणनीतिक महत्व है। अगर बांग्लादेश इसमें शामिल होता है तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों को नया आयाम दे सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसे अभी नाटो कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि इसमें समान लक्ष्य और मजबूत संस्थागत ढांचा अभी विकसित नहीं हुआ है। फिर भी, सामूहिक रक्षा का प्रावधान और विस्तार की संभावना इसे महत्वपूर्ण बनाती है। बांग्लादेश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत विकल्प तलाश रहा है, लेकिन पड़ोसी देश के रूप में भारत को इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखनी होगी।
क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत रखने के लिए दोनों देशों को संवाद जारी रखना चाहिए। प्रत्यर्पण जैसे संवेदनशील मुद्दों का समाधान कानूनी और कूटनीतिक तरीके से निकालना दोनों के हित में है। दक्षिण एशिया की सुरक्षा किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की साझा जिम्मेदारी है। बांग्लादेश का यह संभावित कदम भारत के लिए सतर्क रहने का संकेत है, ताकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के हितों के अनुकूल बना रहे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 21 Aug 2026
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