-Friday World 10 Aug 2026
मध्य पूर्व इन दिनों एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ईरान लगभग हर दिन उन जहाजों पर हमला कर रहा है जो चुपके से होर्मुज जलडमरूमध्य पार करने की कोशिश करते हैं। आज भी एक यूएई जहाज पर हमले की खबर आई है। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले स्पष्ट चेतावनी दी थी कि हर हमलावर जहाज के बदले ईरान के किसी पावर स्टेशन, पुल या तेल-गैस क्षेत्र पर जवाबी हमला किया जाएगा। फिर वह कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
अमेरिकी सैन्य विश्लेषक स्कॉट रिटर का आकलन साफ है। उनका कहना है कि हर बीतते दिन के साथ ईरान और अधिक मजबूत होता जा रहा है। लीक हुई पेंटागन रिपोर्ट ने हालात और अधिक गंभीर बना दिए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका के लगभग 50 प्रतिशत टॉमहॉक मिसाइल, 80 प्रतिशत THAAD इंटरसेप्टर और 65 प्रतिशत पैट्रियट मिसाइल समाप्त हो चुके हैं। सीएनएन, बीबीसी समेत बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान इस रिपोर्ट को प्रमुखता से प्रसारित कर रहे हैं।
इस लीक रिपोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को काफी नाराज कर रखा है। ब्रिटिश मीडिया स्काई न्यूज ने विस्तार से कवरेज दी। भू-राजनीति विशेषज्ञ प्रोफेसर माइकल क्लार्क के अनुसार ट्रंप युद्ध सचिव हेगसेथ को दोष दे रहे हैं, हेगसेथ जनरल केन को और जनरल केन सेंटकॉम को। अमेरिकी सैन्य विश्लेषक कर्नल डैनियल डेविस ने टिप्पणी की कि महत्वपूर्ण पदों पर अयोग्य लोगों की नियुक्ति का नतीजा यही निकलता है।
वास्तव में पूंजीवादी ट्रंप और साम्राज्यवादी अमेरिका के पास अब ईरान में हासिल करने लायक बहुत कम बचा है। सिर्फ नुकसान उठाने की स्थिति बनी हुई है। दुनिया भर के अधिकांश भू-राजनीति विशेषज्ञ इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। अल जजीरा की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ईरानी विदेश मंत्री अरागची ने कहा है कि होर्मुज को फिर से सामान्य बनाने के लिए अमेरिका को समझौता ज्ञापन के उल्लंघन का मुआवजा देना होगा। इसका सीधा मतलब है कि ट्रंप प्रशासन को और अधिक रियायतें देनी पड़ सकती हैं। ईरान की मांगें बढ़ रही हैं और इसी वजह से नई सहमति अभी तक नहीं बन पाई है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल अरब देशों की सुरक्षा का है। उनकी सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? इसी चिंता के चलते सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को (इजराइल) समझौता कहा जा रहा है। इसके अनुसार तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने को तीनों पर हमला माना जाएगा।
बेल्जियम के प्रसिद्ध पत्रकार और भू-राजनीति विश्लेषक एलिजा मैग्नियर का कहना है कि इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और पेट्रोडॉलर व्यवस्था की जरूरत अब समाप्त होती दिख रही है। उन्होंने तर्क दिया कि होर्मुज पर ईरान का प्रभावी नियंत्रण अरब देशों तक अमेरिकी हथियारों की सप्लाई को मुश्किल बना देगा। बड़े तेल टैंकर स्वेज नहर से नहीं गुजर सकते और हवाई मार्ग से इतनी बड़ी मात्रा में सामान ले जाना व्यावहारिक नहीं। होर्मुज की जगह पूरी तरह ले पाना असंभव के करीब है। इसी सोच के साथ सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए तुर्की और पाकिस्तान के साथ गठबंधन मजबूत किया है। अमेरिका से हथियार खरीदना जारी रह सकता है, लेकिन मात्रा धीरे-धीरे घटेगी। चीन के साथ पहले से हुए समझौतों के कारण पेट्रोडॉलर पर निर्भरता भी लंबे समय में कम हो सकती है।
इतिहास का सबक याद दिलाते हुए 2014 का उदाहरण महत्वपूर्ण है। अमेरिकी समर्थन प्राप्त इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल-मालिकी ने हथियारों का ऑर्डर दिया और भुगतान भी किया, लेकिन हथियार नहीं पहुंचे। उसी दौरान आईएसआईएस ने मोसुल समेत कई इलाके अपने कब्जे में ले लिए। अरब देश इस घटना को भूल नहीं सकते। अगर वे सिर्फ अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर रहेंगे तो जोखिम बहुत बड़ा है।
क्या यह (इजराइल) समझौता ईरान के खिलाफ है? सिद्धांत रूप से अगर एक देश पर हमला होता है तो बाकी उसे अपना हमला मानेंगे। लेकिन अमेरिकी प्रोफेसर जेफरी सैक्स याद दिलाते हैं कि जब रूस ने तुर्की के विमान पर हमला किया था तो नाटो सदस्य होने के बावजूद तुर्की को अपेक्षित मदद नहीं मिली। नाटो युद्ध में उलझना नहीं चाहता था। ठीक वैसा ही ईरान के मामले में हो सकता है। पाकिस्तान और तुर्की आसानी से ईरान के खिलाफ युद्ध में नहीं उतरेंगे।
फिर यह गठबंधन क्यों बना? मुख्य वजह समय और अवसर की है। सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र से कुछ दूरी बनाना चाहता था। अब मौका मिलने पर उन्होंने यह कदम उठाया। वे आसानी से कह सकते हैं कि अमेरिका इजरायल को सुरक्षा दे पाया लेकिन उन्हें देने में नाकाम रहा। तुर्की नाटो सदस्य होने के बावजूद शामिल हुआ क्योंकि इजरायली नेताओं की तुर्की के खिलाफ बयानबाजी और संभावित खतरे की आशंका है। पाकिस्तान परमाणु शक्ति होने के कारण इस गठबंधन को अतिरिक्त निवारक क्षमता प्रदान करता है।
तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मरंदी का सुझाव दिलचस्प है। उनका कहना है कि अगर यह गठबंधन वास्तव में इजरायल और साम्राज्यवादी अमेरिका के दबदबे के खिलाफ है तो ईरान को भी इसमें शामिल होने पर विचार करना चाहिए। हालांकि उन्होंने नीयत को पहले परखने की सलाह दी।
कुल मिलाकर ईरान युद्ध मध्य पूर्व को तेजी से बदल रहा है। एलिजा मैग्नियर के शब्दों में ईरान एक नया मध्य पूर्व रच रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रभाव कमजोर पड़ रहा है। ईरान न केवल सैन्य रूप से टिके रहने में सफल दिख रहा है बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को नया रूप दे रहा है। जिसमें पुरानी वर्चस्व वाली व्यवस्था टूट रही है। (इजराइल) समझौता इसी बदलते परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहा है। होर्मुज का संकट वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रहा है और आने वाले महीने बताएंगे कि यह नया समीकरण कितना टिकाऊ साबित होता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 10 Aug 2026
#HormuzAttacks
#IranStrength
#USMissileShortage
#IsraelAgreement
#MiddleEastRealignment
#SaudiTurkeyPakistan
#TrumpDilemma
#NewGeopolitics
#StraitOfHormuz
#IranWar2026