- Friday World 19 Aug 2026
बाबा रामदेव पिछले कुछ दिनों से एकदम अलग मूड में दिख रहे हैं। योग गुरु और पतंजलि साम्राज्य के मुखिया सामान्य रूप से संयमित और आध्यात्मिक छवि रखते हैं, लेकिन इन दिनों उनके बयान युद्ध स्तर की लड़ाई जैसे लग रहे हैं। सरकार, मंत्रियों, विधायकों और अब भाजपा सांसद कंगना रनौत तक पर वे खुलकर निशाना साध रहे हैं। सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह व्यापारिक नुकसान का गुस्सा है या कोई गहरी नाराजगी?
कंगना रनौत पर तीखा प्रहार
सबसे ताजा विवाद कंगना रनौत के ‘Generation Gutter’ बयान को लेकर सामने आया। बाबा रामदेव ने एक कार्यक्रम में साफ कहा, “कंगना की क्वॉलिफिकेशन क्या है? उनका बचपन कैसा रहा है? उनकी जवानी कैसी रही है? उनके पहले के कारनामे कैसे रहे हैं? देश के Gen Z को गटर कहना उनके बिगड़े दिमाग की निशानी है।”
यह बयान सिर्फ असहमति नहीं था। इसमें व्यक्तिगत टिप्पणी का पुट साफ झलक रहा था। कंगना ने इसका जवाब देते हुए कहा कि बाबा जी उनकी जवानी या बेडरूम के सपने न देखें और चरित्र का पाठ न पढ़ाएं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों पर हुई फटकार का भी जिक्र किया। दोनों के बीच यह जुबानी जंग सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है।
सरकार पर भी बरसे बाबा
सिर्फ कंगना ही नहीं, बाबा रामदेव पिछले कुछ दिनों से केंद्र सरकार पर भी सख्त रुख अपनाए हुए हैं। परीक्षा लीक, भर्ती घोटालों और सरकारी नौकरियों में कथित भ्रष्टाचार को लेकर उन्होंने चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर ये समस्याएं नहीं सुधरीं तो उन्हें दोबारा आंदोलन करना पड़ सकता है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और रिश्वतखोरी जैसे मुद्दों को उन्होंने खुलकर उठाया। यह स्वर सामान्य समर्थन वाले बाबा रामदेव से काफी अलग है।
क्या व्यापारिक दबाव है वजह?
बाबा रामदेव की आक्रामकता के पीछे कई लोग व्यापारिक कारण तलाश रहे हैं। पतंजलि समूह पर पिछले कुछ समय से कानूनी और नियामकीय दबाव बना हुआ है। भ्रामक विज्ञापनों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही, जीएसटी से जुड़े मामले, कुछ उत्पादों पर कार्रवाई और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव जैसी खबरें आती रही हैं। पतंजलि फूड्स के शेयरों में भी समय-समय पर गिरावट देखी गई है।
जब कोई बड़ा बिजनेस हाउस दबाव में होता है तो उसके प्रमुख की भाषा में तीखापन आना असामान्य नहीं। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि बाबा रामदेव अपनी नाराजगी को सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के जरिए व्यक्त कर रहे हैं। वहीं कुछ का कहना है कि यह महज संयोग है और वे लंबे समय से शिक्षा व रोजगार व्यवस्था की खामियों पर बोलते रहे हैं।
वैचारिक रुख या रणनीति?
बाबा रामदेव लंबे समय से भाजपा और वर्तमान सरकार के करीबी माने जाते रहे हैं। योग और आयुर्वेद को बढ़ावा देने में सरकार का सहयोग भी रहा है। ऐसे में अचानक उनकी आलोचनात्मक भाषा कई लोगों को चौंका रही है। कुछ पर्यवेक्षक इसे “अंदर की नाराजगी” बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे जनभावनाओं को भांपकर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश मानते हैं।
कंगना जैसे सांसद पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना और युवाओं के बचाव में खड़े होना दोनों ही उनकी नई छवि को आकार दे रहे हैं। एक तरफ वे सरकार को चेतावनी दे रहे हैं, दूसरी तरफ पार्टी के सांसद को आड़े हाथों ले रहे हैं। यह दोहरी भूमिका उनके इरादों को लेकर अटकलें बढ़ा रही है।
क्या कहते हैं जानकार?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बाबा रामदेव जैसे प्रभावशाली चेहरे जब तीखे बयान देते हैं तो उसके पीछे आमतौर पर एक से अधिक कारण होते हैं। व्यापारिक हित, वैचारिक असहमति, जनसमर्थन बनाए रखने की चाह और व्यक्तिगत नाराजगी—इन सबका मिश्रण संभव है। पतंजलि का साम्राज्य विशाल है और किसी भी बड़े बिजनेस को नियामकीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वहीं सामाजिक मुद्दों पर बोलना उनकी पुरानी आदत भी है।
आगे क्या हो सकता है?
बाबा रामदेव की यह आक्रामकता अगर जारी रही तो यह सिर्फ सुर्खियां नहीं बनाएगी, बल्कि सत्ताधारी दल के अंदर भी चर्चा का विषय बन सकती है। कंगना रनौत ने जवाब देकर विवाद को और हवा दी है। अब देखना होगा कि बाबा रामदेव आगे और कितने सख्त रुख पर जाते हैं या फिर अपनी भाषा को नरम करते हैं।
फिलहाल एक बात साफ है—बाबा रामदेव इन दिनों सामान्य मूड में नहीं हैं। चाहे वजह व्यापारिक नुकसान हो, असली नाराजगी हो या दोनों का मिश्रण, उनकी युद्ध-स्तर की लड़ाई सुर्खियों में बनी हुई है। योग गुरु की यह नई आक्रामक छवि आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बनेगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 19 Aug 2026
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