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Thursday, 3 September 2026

वार्ड से राष्ट्रपति भवन तक: 280 चुनाव लड़ने वाले लोकतंत्र के सिपाही 'धरतीपकड़' को अंतिम सलाम

वार्ड से राष्ट्रपति भवन तक: 280 चुनाव लड़ने वाले लोकतंत्र के सिपाही 'धरतीपकड़' को अंतिम सलाम
- Friday World 4 Sep 2026
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ लोग जीत के लिए याद रखे जाते हैं, तो कुछ अपनी जिद, जुनून और लोकतंत्र में अटूट आस्था के लिए। बिहार के भागलपुर के नागरमल बाजोरिया उर्फ 'धरतीपकड़' ऐसे ही एक नाम थे। वार्ड मेंबर से लेकर देश के राष्ट्रपति पद तक कुल 280 चुनाव लड़ने वाले इस अनोखे योद्धा ने 97 साल की उम्र में पटना के PMCH अस्पताल में अंतिम सांस ली। गुरुवार देर रात भागलपुर के पवित्र बरारी घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।

उनके निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया - एक ऐसा युग जहाँ चुनाव हार-जीत का खेल नहीं, बल्कि लोकतंत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का उत्सव था।

दिग्गजों के सामने ठोकी ताल

नागरमल बाजोरिया का नाम आते ही बड़े-बड़े राजनेताओं के नाम सामने आ जाते हैं। उन्होंने चुनाव लड़ने में कभी किसी बड़े नाम से परहेज नहीं किया।

उन्होंने रायबरेली से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ पर्चा भरा, अमेठी से राजीव गांधी के सामने ताल ठोकी। इतना ही नहीं, संजय गांधी, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावर नेताओं के गढ़ में भी उन्होंने अपनी किस्मत आजमाई।

उनकी सबसे बड़ी पहचान थी राष्ट्रपति चुनाव लड़ना। साल 1969 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति उम्मीदवार वी.वी. गिरी के खिलाफ राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन किया था। फिर 2012 में उन्होंने प्रणब मुखर्जी के खिलाफ भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए फॉर्म भरा, हालांकि तकनीकी कारणों से उनका फॉर्म रद्द हो गया था। आखिरी बार उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई थी।

280 चुनाव लड़े, एक भी नहीं जीते, लेकिन फिर भी वे हर बार मैदान में डटे रहे। यही उन्हें 'धरतीपकड़' बनाता है - जो धरती को पकड़ कर रखे, कभी न छोड़े।

लाहौर से भागलपुर तक का सफर

नागरमल बाजोरिया का जीवन किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं। उनका जन्म 1930 में अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। देश के विभाजन से पहले ही उनका परिवार बिहार के भागलपुर आकर बस गया था।

भागलपुर में उन्होंने मणिहारी यानी कांच की चूड़ियों और श्रृंगार के सामान का छोटा सा व्यापार शुरू किया। जीवन भर वे उसी व्यापार से अपने परिवार का भरण-पोषण करते रहे। लेकिन व्यापार के साथ-साथ उनका मन समाज सेवा में भी खूब लगता था।

गरीब कन्याओं का विवाह करवाना, जरूरतमंद महिलाओं की मदद करना और बच्चों की शिक्षा के लिए काम करना - ये उनके रोजमर्रा के काम थे। भागलपुर के लोग उन्हें एक व्यापारी से ज्यादा एक समाजसेवी के रूप में जानते थे।

गधों के साथ निकाली थी अनोखी रैली

'धरतीपकड़' अपने अनोखे प्रचार के लिए पूरे देश में मशहूर थे। उनका मानना था कि चुनाव प्रचार में शोर नहीं, संदेश होना चाहिए।

2005 के बिहार विधानसभा चुनाव की बात आज भी लोग याद करते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए उन्होंने गधों के गले में तख्तियां लटकाकर अपनी नामांकन रैली निकाली थी। उन तख्तियों पर भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग्य लिखे थे। यह तस्वीर अगले दिन देश के सभी अखबारों की सुर्खियां बनी थी।

उनके लिए चुनाव कभी सत्ता पाने का जरिया नहीं रहा। वे अक्सर कहते थे, "चुनाव लोकतंत्र का पर्व है, इसमें हर किसी को अपनी आहुति देनी चाहिए। जीतना-हारना जनता के हाथ में है, लड़ना हमारा धर्म है।"

एक प्रेरणा का अंत

उनके परिवार में 4 बेटे और 1 बेटी हैं। एक बेटे का निधन पहले ही हो चुका है। बाकी बेटे भागलपुर, पटना और दिल्ली में व्यापार संभालते हैं।

उनके निधन पर भागलपुर के विधायक रोहित पांडे, भाजपा प्रदेश महामंत्री डॉ. प्रीति शेखर सहित कई बड़े नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है। सभी ने उनके जीवन को भारतीय लोकतंत्र की जीवंत प्रेरणा बताया।

आज जब राजनीति में लोग एक हार के बाद मैदान छोड़ देते हैं, तब नागरमल बाजोरिया जैसे लोग सिखाते हैं कि लोकतंत्र में भागीदारी ही सबसे बड़ी जीत है। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं जीता, लेकिन उन्होंने 280 बार लोकतंत्र पर अपना भरोसा जीता।

भागलपुर का बरारी घाट आज सूना है, लेकिन गंगा की लहरों में 'धरतीपकड़' की वो जिद हमेशा गूंजती रहेगी - लड़ते रहो, लोकतंत्र के लिए।

     🙏विनम्र श्रद्धांजलि!🙏

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 4 Sep 2026

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