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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 20 September 2026

लाल सागर में हूतियों का कहर, सऊदी की गुहार पर एक्शन में आया चीन - बीजिंग ने तेहरान को दी चेतावनी, मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट!

लाल सागर में हूतियों का कहर, सऊदी की गुहार पर एक्शन में आया चीन - बीजिंग ने तेहरान को दी चेतावनी, मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट!
- Friday World September 20,2026 
नई दिल्ली - मिडिल ईस्ट का समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में जिस तरह से अपनी पकड़ मजबूत की है, उसने सऊदी अरब समेत पूरी दुनिया की टेंशन बढ़ा दी है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि सऊदी अरब को हूतियों से निपटने के लिए अब अमेरिका नहीं, बल्कि चीन का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।

खबरों के मुताबिक, रियाद ने बीजिंग से निजी तौर पर अनुरोध किया है कि वह हूतियों को कंट्रोल करने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे। सऊदी का डर साफ है - एक तरफ हूती लाल सागर में उसके तेल टैंकरों और ग्लोबल शिपिंग को निशाना बना रहे हैं, दूसरी तरफ होर्मुज स्ट्रेट में ईरान पहले से ही शिपिंग रूट में अड़ंगा डाल रहा है।

सऊदी ने चीन को क्यों चुना?

यह सवाल सबसे बड़ा है। दरअसल, सऊदी अरब अच्छी तरह जानता है कि हूतियों की डोर सीधे तेहरान से जुड़ी है। ईरान ही हूतियों का सबसे बड़ा समर्थक है। और ईरान को अगर कोई समझा सकता है, तो वो है चीन।

चीन ईरान का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है। बीते कुछ सालों में बीजिंग ने मिडिल ईस्ट में अपना असर बनाने के लिए खरबों डॉलर का निवेश किया है। सऊदी और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता करवाकर चीन ने पहले ही दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी थी। अब सऊदी उसी ताकत को टेस्ट करना चाहता है।

सऊदी की सोच सीधी है - अमेरिका इस वक्त अपने आंतरिक मुद्दों और यूक्रेन-इजरायल युद्ध में उलझा है, जबकि चीन ही एक ऐसा देश है जिसकी तेहरान में सबसे ज्यादा सुनी जाती है।

बीजिंग का तेहरान को गुप्त संदेश

सूत्रों के अनुसार, सऊदी के अनुरोध के बाद बीजिंग ने तुरंत तेहरान से संपर्क किया। चीन ने निजी तौर पर ईरान से कहा है कि वह यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास हूतियों के तेजी से बढ़ते हमलों को रोके।

चीन के लिए यह चिंता बहुत निजी और आर्थिक है। चीन अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों के 50% से ज्यादा के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भर है। अगर लाल सागर और होर्मुज दोनों जगह शिपिंग बाधित हुई, तो चीन की फैक्ट्रियां ठप पड़ सकती हैं और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। चीन का 90% से ज्यादा व्यापार समुद्री रास्ते से होता है, जिसका बड़ा हिस्सा इसी लाल सागर से गुजरता है।

इसलिए चीन नहीं चाहता कि यह संघर्ष और बढ़े।

ईरान का टेढ़ा जवाब

लेकिन ईरान ने चीन की इस अपील पर जो जवाब दिया है, उसने सबको चौंका दिया है। ईरान का कथित तौर पर कहना है कि - "इलाके की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल का युद्ध खत्म हो।"

मतलब साफ है, तेहरान ने गेंद वापस अमेरिका और इजरायल के पाले में डाल दी है। ईरान का इशारा है कि जब तक गाजा और लेबनान में युद्ध नहीं रुकेगा, तब तक हूतियों को भी नहीं रोका जा सकता।

बिना धमकी की डिप्लोमेसी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब तक चीन ने इस रिक्वेस्ट के साथ कोई आर्थिक धमकी नहीं दी है। बीजिंग ने ईरान को तेल खरीदना बंद करने या व्यापार रोकने की चेतावनी नहीं दी है। यह सिर्फ एक दोस्ताना लेकिन गंभीर अनुरोध है।

विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वह ईरान को नाराज नहीं करना चाहता, लेकिन साथ ही सऊदी को भी दिखाना चाहता है कि वह एक जिम्मेदार ग्लोबल पावर है।

बीजिंग ने मिडिल ईस्ट में अपना असर बनाने में सालों लगाए हैं, अरबों डॉलर लगाए हैं। अब पहली बार उससे असल में उस असर का इस्तेमाल करने के लिए कहा जा रहा है। यह चीन के लिए एक अग्निपरीक्षा है।

क्या चीन अपने सबसे करीबी दोस्त ईरान को समझा कर लाल सागर में शांति ला पाएगा? या फिर ईरान के टेढ़े रवैये के बाद चीन को भी सख्त कदम उठाने पड़ेंगे? आने वाले कुछ हफ्ते इसका जवाब देंगे, लेकिन इतना तय है कि लाल सागर की यह लड़ाई अब सिर्फ यमन की नहीं, बल्कि बीजिंग, तेहरान और रियाद के बीच पावर बैलेंस की लड़ाई बन गई है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 20,2026 

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