-Friday World Oct 28,2026
इस्लामाबाद में हाल ही में एक महत्वपूर्ण गोलमेज परिषद आयोजित हुई, जिसमें पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकारों, मीडिया यूनियनों, राजनीतिक नेताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने भाग लिया। इस बैठक का मकसद प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना था। सेंसरशिप, कानूनी उत्पीड़न, आर्थिक असुरक्षा और डिजिटल संचार पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों ने स्वतंत्र पत्रकारिता को कमजोर कर दिया है। प्रतिभागियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए समन्वित प्रयास करने का संकल्प लिया।
बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार नासिर जैदी ने की, जबकि मुनीजा जहाँगीर ने इसका संचालन किया। इसमें हामिद मीर, मुजीब-उर-रहमान शमी, नजम सेठी, आस्मा शिराजी, अरिफा नूर जैसे जाने-माने पत्रकारों के साथ-साथ बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब, आजाद जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के पत्रकार यूनियन प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का फोकस यह था कि कैसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रक्षकों को मजबूत किया जाए और अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा बढ़ाया जाए।
पीईसीए कानून और कानूनी उत्पीड़न की शिकायतें
हामिद मीर ने प्रिवेंशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स एक्ट (पीईसीए) के तहत दर्ज किए गए मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून का इस्तेमाल पत्रकारों को दबाने के लिए हो रहा है। उन्होंने लगभग 500 मामलों का उल्लेख किया, जिनमें से कई पत्रकारों के खिलाफ हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों का दस्तावेजीकरण करते हुए एक श्वेत-पत्र तैयार किया जाए। इसमें राजनीतिक दलों की भूमिका भी जाँची जानी चाहिए, क्योंकि अक्सर विपक्ष में रहते हुए मीडिया स्वतंत्रता की बात करने वाले दल सत्ता में आने के बाद उसी स्वतंत्रता को सीमित करने वाले कानून पास करते हैं।
मुजीब-उर-रहमान शमी ने कहा कि पाकिस्तान की समस्याएँ सिर्फ कानूनों के होने से नहीं, बल्कि उनके अप्रभावी अमल से पैदा होती हैं। नजम सेठी ने राजनीतिक दलों की आलोचना करते हुए कहा कि वे मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहे हैं। उन्होंने सेल्फ-सेंसरशिप और व्यावसायिक दबावों को प्रेस को कमजोर बनाने का प्रमुख कारण बताया। मीडिया संगठन अब व्यापक पत्रकारिता उद्देश्यों की बजाय सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
महिला पत्रकारों पर ऑनलाइन उत्पीड़न
आस्मा शिराजी ने महिला पत्रकारों के सामने आने वाली ऑनलाइन हैरेसमेंट की समस्या को उजागर किया। उन्होंने कहा कि यह जानबूझकर महिला पत्रकारों को निशाना बनाने का तरीका है, जो उन्हें काम करने से हतोत्साहित करता है। अरिफा नूर ने जोर दिया कि मीडिया कर्मियों के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों और उल्लंघनों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण जरूरी है। बिना सही रिकॉर्ड के संघर्ष कमजोर रहता है।
प्रांतीय स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है। खैबर पख्तूनख्वा के पत्रकार नासिर हुसैन ने बताया कि 9/11 के बाद से प्रांत में 30 से ज्यादा पत्रकारों की हत्याएँ हुई हैं। 2025 में अकेले 22 पत्रकारों को धमकियाँ मिलीं। बलूचिस्तान, सिंध और अन्य क्षेत्रों के पत्रकारों ने सुरक्षा खतरों, आर्थिक दबावों और देर से मिलने वाले वेतन की समस्याएँ बताईं। कई पत्रकारों ने अपनी नौकरियाँ खो दी हैं, क्योंकि मीडिया उद्योग आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
समिति का गठन और आगे की रणनीति
बैठक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक समिति बनाने का फैसला लिया गया। नासिर जैदी की अध्यक्षता में यह समिति संबंधित पक्षों से परामर्श करेगी, प्रतिबंधों का दस्तावेजीकरण करेगी और माँगों का एक चार्टर तैयार करेगी। पूर्व सीनेटर फरहतुल्लाह बाबर ने समिति से अपील की कि वह राजनीतिक दलों से सीधा संपर्क साधे। पत्रकारों की जासूसी रोकने, उनके व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने और बदनामी कानूनों में बदलाव के लिए आंदोलन चलाने की जरूरत है। देर से मिलने वाले वेतन का मुद्दा भी हल किया जाना चाहिए, क्योंकि आर्थिक कमजोरी प्रेस स्वतंत्रता को और कमजोर करती है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी शरीफ सरकार पर प्रेस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की कड़ी आलोचना की है। पत्रकार यूनियनें लंबे समय से सुरक्षा कानूनों और संरक्षण तंत्र की माँग कर रही हैं, लेकिन प्रगति सीमित रही है। पीईसीए में संशोधन, डिफेमेशन कानून और अन्य कानूनी उपायों ने दबाव बढ़ाया है।
प्रेस स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रेस स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। जब पत्रकार स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते, तो जनता को सही जानकारी नहीं मिलती। सेंसरशिप, धमकियाँ और कानूनी उत्पीड़न न सिर्फ व्यक्तिगत पत्रकारों को प्रभावित करते हैं, बल्कि पूरे समाज की सूचना तक पहुँच को सीमित करते हैं। पाकिस्तान में पत्रकारों की हत्याओं के अनसुलझे मामले, ऑनलाइन हमले और आर्थिक दबाव ने माहौल को और कठिन बना दिया है।
यह गोलमेज परिषद एक सकारात्मक कदम है। यह दिखाता है कि पत्रकार समुदाय अब बँटा हुआ नहीं रहना चाहता। एकजुट होकर वे राजनीतिक दलों, सरकार और समाज से संवाद कर सकते हैं। श्वेत-पत्र तैयार करना, उल्लंघनों का रिकॉर्ड रखना और माँगों का चार्टर बनाना लंबे संघर्ष की शुरुआत हो सकती है।
हालाँकि चुनौतियाँ बड़ी हैं। मीडिया घरानों पर व्यावसायिक दबाव, मालिकों की तरफ से खबरों को दबाने की प्रवृत्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप जारी है। महिला पत्रकारों की सुरक्षा, प्रांतीय स्तर पर खतरों और वेतन संबंधी मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। समिति को सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे जमीनी स्तर पर पत्रकारों की मदद करनी होगी, कानूनी सहायता उपलब्ध करानी होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठानी होगी।
पाकिस्तान में प्रेस स्वतंत्रता का संघर्ष नया नहीं है। लेकिन इस बार विभिन्न क्षेत्रों, यूनियनों और नागरिक समाज का एक साथ आना उम्मीद जगाता है। अगर यह एकता बनी रही और राजनीतिक दल भी मौलिक अधिकारों के प्रति गंभीर हुए, तो स्थिति सुधर सकती है। अन्यथा सेंसरशिप और उत्पीड़न का यह सिलसिला स्वतंत्र पत्रकारिता को और कमजोर करता रहेगा।
आज की दुनिया में सूचना की स्वतंत्रता लोकतंत्र की पहली शर्त है। पाकिस्तान के पत्रकार इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं। दुनिया भर के मीडिया संगठन और मानवाधिकार समूह उनकी आवाज को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन असली बदलाव देश के अंदर से ही आएगा—जब पत्रकार एकजुट रहेंगे, यूनियनें मजबूत होंगी और समाज प्रेस की आजादी को अपना अधिकार समझेगा।
यह बैठक याद दिलाती है कि प्रेस फ्रीडम कोई उपहार नहीं, बल्कि निरंतर संघर्ष से हासिल की जाने वाली चीज है। पाकिस्तान के पत्रकारों ने मोर्चा खोल दिया है। अब देखना यह है कि यह संघर्ष कितना प्रभावी साबित होता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026
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