-Friday World Oct 19,2026
यमन के लंबे संघर्ष में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। ईरान समर्थित अंसारुल्लाह बलों की हालिया बढ़त ने खाड़ी के दो प्रमुख देशों—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)—को फिर से एक मंच पर ला दिया है। यमन के सूत्रों के अनुसार दोनों देशों के बीच सहमति बन गई है। इसके तहत यूएई दक्षिणी यमन की मिलिशिया को फिर से आर्थिक सहायता (फंडिंग) देगा, जबकि सऊदी अरब इन अंसारुल्लाह-विरोधी बलों को हवाई कवर प्रदान करने के लिए तैयार हो गया है। द गॉर्डियन की रिपोर्ट में इस घटनाक्रम की पुष्टि की गई है।
यह सहयोग दोनों देशों के बीच पिछले कई महीनों से चली आ रही गहरी दूरियों को कम करने की कोशिश है। इसकी सबसे बड़ी वजह अंसारुल्लाह बलों की तेज अग्रगति है, जिसने रियाद और अबू धाबी दोनों को गंभीर चिंता में डाल दिया है।
#अंसारुल्लाह की बढ़त से बढ़ी खाड़ी की चिंता
हाल के समय में अंसारुल्लाह बलों ने यमन के पश्चिमी तट समेत कई क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। उन्होंने बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य के आसपास के इलाकों में भी आगे बढ़ने की कोशिश की, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और शिपिंग के लिए बेहद संवेदनशील है। सऊदी अरब को रोजाना अंसारुल्लाह के ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ रहा है। इन हमलों ने सऊदी के हवाई अड्डों और ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया है, जिससे देश में सामान्य स्थिति बनाए रखना मुश्किल हो गया है।
सऊदी अरब पहले से ही यमन में हवाई अभियान चला रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रभावी और संगठित बलों की कमी महसूस की जा रही थी। दक्षिणी यमन की मिलिशिया, खासकर जायंट्स ब्रिगेड (Giants Brigades), को अंसारुल्लाह के खिलाफ सबसे प्रभावी बल माना जाता है। ये बल पहले यूएई द्वारा प्रशिक्षित और वित्त पोषित थे।
#यूएई की वापसी और पुरानी दरार की कहानी
यूएई ने जनवरी 2026 में यमन से अपने सैन्य अभियान रोक दिए थे और दक्षिणी बलों के लिए फंडिंग भी बंद कर दी थी। इसकी पृष्ठभूमि दिसंबर 2025 की घटनाओं में छिपी है। तब दक्षिणी मिलिशिया ने अदन और दक्षिणी इलाकों पर नियंत्रण स्थापित करने का अभियान शुरू किया था। सऊदी अरब ने इसे अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ माना और भारी हवाई हमले किए। सऊदी ने यूएई पर इन मिलिशिया को हथियार देने का आरोप लगाया। तनाव बढ़ने के बाद यूएई ने यमन से खुद को बाहर निकाल लिया।
अब अंसारुल्लाह की बढ़त ने दोनों देशों को फिर से सहयोग के लिए मजबूर कर दिया है। समझौते के तहत यूएई जायंट्स ब्रिगेड जैसे दक्षिणी बलों को फिर से आर्थिक सहायता देगा। बदले में सऊदी अरब इन बलों को हवाई सुरक्षा और समर्थन मुहैया कराएगा। हालांकि यह समझौता काफी कमजोर माना जा रहा है, क्योंकि अंसारुल्लाह-विरोधी खेमे के अंदर पुरानी दरारें अभी भी मौजूद हैं। दक्षिणी बल अक्सर स्वतंत्र दक्षिण यमन की मांग करते रहे हैं, जबकि सऊदी अरब यमन की एकता बनाए रखना चाहता है।
#समझौते के संभावित प्रभाव
यह नया सहयोग खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंसारुल्लाह की गतिविधियां न केवल यमन बल्कि सऊदी अरब और पूरे रेड सी क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। बाब अल-मंदब जैसे रणनीतिक जलमार्ग पर नियंत्रण की लड़ाई वैश्विक व्यापार को भी प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता मुख्य रूप से सैन्य जरूरत से प्रेरित है। राजनीतिक मतभेद अभी भी बने हुए हैं। दक्षिणी अलगाववादियों ने हाल ही में स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह की मांग की है, लेकिन न सऊदी और न यूएई ने इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है।
यमन का संघर्ष 2014-15 से चल रहा है, जब अंसारुल्लाह बलों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2015 में हस्तक्षेप किया था। वर्षों के युद्ध, मानवीय संकट और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बाद अब सऊदी और यूएई फिर से एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। यह समझौता अंसारुल्लाह की बढ़त को रोकने में कितना सफल होता है, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा। फिलहाल दोनों देश अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को प्राथमिकता दे रहे हैं।
यह घटनाक्रम मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति को फिर से रेखांकित करता है, जहां पुराने सहयोगी जरूरत पड़ने पर फिर से एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 19,2026
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