-Friday World Oct 13,2026
दुनिया के अलग-अलग कोनों में अक्टूबर 2026 के पहले पखवाड़े में एक अजीबोगरीब समानता देखने को मिली। भारत से लेकर यूरोप और दक्षिण अमेरिका तक लोग सड़कों पर उतर आए। कारण अलग-अलग थे—मतदाता सूची के सुधार, शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, महंगे मकान, फिलिस्तीन समर्थन और सरकारी नीतियों का विरोध—लेकिन भावना एक जैसी थी। आम नागरिकों का धैर्य जवाब दे रहा था। सरकारों के फैसलों और जनसेवाओं की स्थिति से नाराजगी इतनी गहरी हो गई कि विरोध प्रदर्शन कई देशों में एक साथ छिड़ गए।
भारत में विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। 12 अक्टूबर को दिल्ली में विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला। उनका आरोप था कि योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से कट रहे हैं। वे पारदर्शिता और जांच की मांग कर रहे थे ताकि लोकतंत्र की बुनियाद पर कोई सवाल न उठे। सड़कों पर नारे गूंजे और राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
फ्रांस में छात्र सड़कों पर थे। स्कूलों की जर्जर हालत, शिक्षकों की भारी कमी, कक्षाओं में भीड़ और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर पेरिस समेत कई शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए। अक्टूबर के पहले सप्ताह में हजारों छात्र सड़कों पर उतरे। कुछ जगहों पर पुलिस से झड़प भी हुई। युवा पीढ़ी साफ कह रही थी कि शिक्षा व्यवस्था अब और नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
स्पेन में आवास संकट मुख्य मुद्दा बना। किराए में भारी बढ़ोतरी, घरों की कमी और बेदखली की घटनाओं ने लोगों का गुस्सा भड़काया। 3 अक्टूबर को मैड्रिड समेत करीब 50 शहरों में प्रदर्शन हुए। संसद में आवास संकट से निपटने वाले उपायों पर सहमति न बन पाने से लोगों का रोष और बढ़ा। सड़कों पर नारे गूंज रहे थे—घर हर किसी का हक है।
ब्रिटेन में लंदन की सड़कें 10 अक्टूबर को फिलिस्तीन समर्थक रैली से गूंज उठीं। हजारों लोग इजरायल-गाजा संघर्ष और ब्रिटेन की विदेश नीति के खिलाफ सड़क पर थे। पुलिस ने नियंत्रण के लिए कड़े इंतजाम किए थे, फिर भी प्रदर्शन बड़े पैमाने पर रहा। वैश्विक मुद्दे स्थानीय स्तर पर भी गूंज रहे थे।
चिली में छात्र फिर से सक्रिय हुए। 1 अक्टूबर को सार्वजनिक शिक्षा बजट में संभावित कटौती के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन हुए। सैंटियागो में बड़ी संख्या में लोग जुटे। उनकी मांग साफ थी—सार्वजनिक शिक्षा का बजट बरकरार रखा जाए और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ न हो।
इजरायल में भी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों और सुरक्षा संबंधी मुद्दों को लेकर विरोध की खबरें आती रहीं। हालांकि अक्टूबर 2026 में वहां के प्रदर्शनों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित रही, फिर भी सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाजें उठती रहीं।
इन सभी प्रदर्शनों में एक बात साझा थी। लोग सिर्फ नारेबाजी नहीं कर रहे थे। वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों—मतदान का अधिकार, अच्छी शिक्षा, सस्ता घर, न्यायपूर्ण विदेश नीति और सरकारी जवाबदेही—की बात कर रहे थे। अलग-अलग देश, अलग-अलग भाषाएं, लेकिन नारा एक जैसा—“हमारी आवाज सुनो।”
इस वैश्विक लहर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब आम आदमी का धैर्य खत्म होता है तो सड़कें जीवंत हो उठती हैं। सरकारें चाहे जितनी ताकतवर हों, जनता की नाराजगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं। अक्टूबर 2026 इन प्रदर्शनों की याद में दर्ज हो गया है—एक ऐसा महीना जब दुनिया के कई हिस्से एक साथ जागे।
ये घटनाएं याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं। यह सड़क पर उतरकर अपनी बात रखने का भी हक देता है। चाहे भारत हो, फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन, चिली या इजरायल—नागरिक अब चुप रहने को तैयार नहीं। उनकी मांगें साफ हैं और आवाज तेज। आने वाले दिनों में इन प्रदर्शनों का असर नीतिगत फैसलों पर कितना पड़ता है, यह देखना बाकी है। लेकिन एक बात तय है—जनता की नाराजगी अब आसानी से दबने वाली नहीं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 13,2026
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