- Friday World Nov 4,2026
तेहरान / ब्रुसेल्स। राजनीति में कहा जाता है कि जो बोओगे, वही काटोगे। ईरान के वरिष्ठ नेता मोहसिन रेज़ाई ने अब यूरोप को यही कहावत याद दिला दी है।
रेज़ाई का कहना है कि कल तक यूरोप ज़ायोनी सत्ता के घिनौने कारनामों पर गर्व कर रहा था। आज वही यूरोप ईरान के साथ युद्ध पर खर्च हो रहे अरबों डॉलर की शिकायत कर रहा है।
उनका सीधा सवाल है - जब आप युद्ध अपराधों का समर्थन कर रहे थे, तब क्या आपको ये ख्याल नहीं आया कि इसके परिणाम अंततः आप पर भी पड़ेंगे? युद्ध और आतंकवाद की एक कीमत होती है, और अब इसे चुकाने की बारी आपकी है।
यह बयान सिर्फ एक बयान नहीं है। यह मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीति का सबसे बड़ा संकेत है। यूरोप जो कभी खुद को शांति का मसीहा कहता था, आज खुद युद्ध की कीमत चुका रहा है।
#रेज़ाई कौन हैं? क्यों उनका बयान मायने रखता है?
मोहसिन रेज़ाई ईरान के कोई साधारण नेता नहीं हैं। वो ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के पूर्व कमांडर रह चुके हैं, एक्सपेडिएंसी काउंसिल के सदस्य हैं, और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के सबसे करीबी लोगों में गिने जाते हैं।
जब रेज़ाई बोलते हैं, तो वह सिर्फ अपनी राय नहीं होती, वह तेहरान की आधिकारिक सोच होती है। इसलिए उनके इस बयान को दुनिया भर की राजधानियों में गंभीरता से लिया जा रहा है।
रेज़ाई ने कहा कि यूरोप ने पिछले 2 साल में इजरायल के हर हमले को आत्मरक्षा का नाम दिया। गाजा में अस्पतालों पर बम गिरे, तो यूरोप ने कहा - इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है। लेबनान में आम नागरिक मारे गए, तो यूरोप चुप रहा। सीरिया में हमले हुए, तो यूरोप ने आंखें बंद कर लीं। ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला हुआ, तो यूरोप ने ताली बजाई।
लेकिन अब जब उसी युद्ध की वजह से यूरोप में तेल महंगा हो गया, गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, महंगाई बढ़ गई है, शरणार्थियों की संख्या बढ़ गई है, तो यूरोप को दर्द होने लगा है। रेज़ाई पूछते हैं - यह दर्द तब कहां था, जब गाजा के बच्चे मर रहे थे?
#यूरोप का दोहरा चेहरा
यूरोप की राजनीति को समझना हो तो एक शब्द याद रखिए - दोहरापन।
जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो यूरोप ने कहा - यह युद्ध अपराध है, इस पर प्रतिबंध लगाओ, रूस को सजा दो। लेकिन जब इजरायल ने गाजा पर हमला किया, तो वही यूरोप बोला - यह आत्मरक्षा है, इजरायल का अधिकार है।
जब ईरान ने इजरायल पर मिसाइल दागी, तो यूरोप ने कहा - यह आतंकवाद है। लेकिन जब इजरायल ने ईरान के वैज्ञानिकों की हत्या की, ईरान के शहरों पर बम गिराए, तो यूरोप ने कहा - यह सटीक कार्रवाई है।
यही दोहरापन अब यूरोप को भारी पड़ रहा है। यूरोप के लोग अब अपने नेताओं से पूछ रहे हैं - हमारे टैक्स का पैसा युद्ध में क्यों जा रहा है? हमारे बच्चों की शिक्षा, हमारे अस्पताल, हमारी पेंशन का पैसा इजरायल को हथियार देने में क्यों खर्च हो रहा है?
#जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली - हर जगह यही बहस चल रही है। जर्मनी में लोगों ने कहा कि हम अपनी अर्थव्यवस्था को बचा नहीं पा रहे, और सरकार इजरायल को अरबों यूरो के हथियार दे रही है। फ्रांस में किसान सड़क पर उतर आए, कहा कि हमें सब्सिडी नहीं मिल रही, लेकिन युद्ध के लिए पैसा है। ब्रिटेन में महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है।
#युद्ध की असली कीमत कितनी है?
रेज़ाई के बयान के पीछे सिर्फ राजनीति नहीं, अर्थशास्त्र भी है। आइए आंकड़ों से समझते हैं।
मिडिल ईस्ट में पिछले 2 साल में हुए युद्ध पर सीधे तौर पर 500 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो चुका है। इसमें इजरायल का सैन्य खर्च, अमेरिका की मदद, ईरान का नुकसान, और यूरोप का अप्रत्यक्ष खर्च शामिल है।
केवल एयर डिफेंस पर ही इजरायल हर दिन 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर रहा है। एक आयरन डोम मिसाइल की कीमत 50 हजार डॉलर है, और एक दिन में सैकड़ों मिसाइलें दागी जाती हैं।
#यूरोप को सबसे बड़ा झटका तेल और गैस से लगा है। जब ईरान-इजरायल युद्ध शुरू हुआ, तो कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यूरोप जो अपनी 60% ऊर्जा आयात करता है, उसकी हालत खराब हो गई। जर्मनी की फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, फ्रांस में बिजली के दाम दोगुने हो गए।
दूसरा झटका है शरणार्थी संकट। मिडिल ईस्ट में युद्ध बढ़ा तो लाखों लोग यूरोप की ओर भागे। ग्रीस, इटली, स्पेन के तटों पर नावें पहुंचने लगीं। यूरोप के देशों को इन शरणार्थियों पर अरबों यूरो खर्च करने पड़े।
#तीसरा झटका है व्यापार। लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद यूरोप-एशिया का व्यापार रूट बंद हो गया। जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगाकर आना पड़ रहा है। इससे हर कंटेनर का किराया 4 गुना बढ़ गया। इसका सीधा असर यूरोप के आम आदमी की जेब पर पड़ा।
#रेज़ाई यही कह रहे हैं - तुमने सोचा था कि युद्ध सिर्फ गाजा और तेहरान में होगा, तुम्हारे घर तक नहीं पहुंचेगा। लेकिन युद्ध की आग हवा की तरह होती है, वह फैलती है। आज वह तुम्हारे घर तक पहुंच गई है।
#यूरोप अब क्यों शिकायत कर रहा है?
यूरोप की शिकायत के 3 बड़े कारण हैं।
#पहला - चुनाव का डर। यूरोप के कई देशों में अगले साल चुनाव हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन में सत्ताधारी पार्टियों की लोकप्रियता गिर रही है। लोग पूछ रहे हैं - तुमने हमारे पैसे युद्ध में क्यों झोंक दिए? नेताओं को डर है कि अगर युद्ध जारी रहा, तो वे चुनाव हार जाएंगे। इसलिए अब वे शांति की बात करने लगे हैं।
#दूसरा - अमेरिका का दबाव। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप भी अब यूरोप से कह रहे हैं - तुम अपने हिस्से का खर्च खुद उठाओ। अमेरिका अब अकेले इजरायल का खर्च नहीं उठाएगा। ट्रंप ने यूरोप से साफ कहा है - अगर तुम्हें इजरायल की इतनी चिंता है, तो पैसा तुम दो। इस बयान ने यूरोप को हिला दिया है।
#तीसरा - जनता का गुस्सा। यूरोप की सड़कों पर अब हर हफ्ते प्रदर्शन हो रहे हैं। लंदन, पेरिस, बर्लिन, मैड्रिड में लाखों लोग फिलिस्तीन के समर्थन में उतर रहे हैं। वे कह रहे हैं - हमारी सरकार युद्ध अपराधों में भागीदार क्यों बन रही है? यह जन दबाव अब नेताओं को अपनी भाषा बदलने पर मजबूर कर रहा है।
#ईरान की रणनीति क्या है?
रेज़ाई का बयान ईरान की नई रणनीति का हिस्सा है। ईरान अब सिर्फ मिसाइलों से नहीं, बयानों से भी लड़ रहा है।
ईरान की रणनीति साफ है - यूरोप को बताओ कि तुम इजरायल के साथ खड़े होकर अपना ही नुकसान कर रहे हो। यूरोप को इजरायल से अलग करो। अगर यूरोप इजरायल को हथियार देना बंद कर दे, तो इजरायल अकेला पड़ जाएगा।
#ईरान यह भी कह रहा है कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर युद्ध थोपा गया, तो वह चुप नहीं बैठेगा। ईरान के अखबारों में पहले ही लिखा जा चुका है कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो ईरान ग्रीस, जर्मनी, फ्रांस में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाएगा। रेज़ाई का बयान उसी चेतावनी की अगली कड़ी है।
ईरान चाहता है कि यूरोप मध्यस्थता करे। यूरोप ईरान से बात करे, प्रतिबंध हटाने पर विचार करे, और इजरायल पर सीजफायर के लिए दबाव डाले। ईरान को पता है कि यूरोप को भी शांति चाहिए, क्योंकि यूरोप की अर्थव्यवस्था युद्ध का बोझ नहीं उठा सकती।
#इजरायल की बेचैनी
रेज़ाई के बयान से सबसे ज्यादा बेचैनी इजरायल में है। इजरायल को डर है कि अगर यूरोप ने हाथ खींच लिया, तो वह अकेला पड़ जाएगा। इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू बार-बार यूरोप जा रहे हैं, यूरोप के नेताओं को मना रहे हैं कि हमारा साथ मत छोड़ो।
लेकिन यूरोप अब पहले जैसा नहीं रहा। यूरोप के लोग अब पूछ रहे हैं - इजरायल की सुरक्षा के लिए हम अपनी सुरक्षा क्यों दांव पर लगाएं?
भारत पर क्या असर?
इस पूरे घटनाक्रम का भारत पर भी सीधा असर है। भारत यूरोप और मिडिल ईस्ट दोनों से तेल खरीदता है। अगर यूरोप युद्ध की कीमत से परेशान होकर शांति की तरफ बढ़ता है, तो भारत के लिए भी अच्छा होगा। तेल सस्ता होगा, महंगाई घटेगी।
#भारत हमेशा से कहता आया है - युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। बातचीत से ही शांति आएगी। रेज़ाई का बयान, चाहे वह कितना भी कड़ा हो, एक बात तो साबित करता है कि अब दुनिया युद्ध से थक चुकी है।
#कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी
रेज़ाई ने एक कड़वी सच्चाई कही है - जब आप आग को हवा देते हैं, तो एक दिन वह आग आपके घर तक भी पहुंचती है।
यूरोप ने सोचा था कि वह दूर बैठकर युद्ध का तमाशा देखेगा, इजरायल की तारीफ करेगा, और खुद सुरक्षित रहेगा। लेकिन अब उसे समझ आ रहा है कि इस दुनिया में कोई भी देश अकेला सुरक्षित नहीं है।
अब यूरोप के पास दो रास्ते हैं। पहला - वही पुराना रास्ता, इजरायल का समर्थन करते रहो, युद्ध की कीमत चुकाते रहो। दूसरा - नया रास्ता, शांति के लिए दबाव बनाओ, सीजफायर कराओ, बातचीत की मेज पर बैठो।
दुनिया को उम्मीद है कि यूरोप दूसरा रास्ता चुनेगा। क्योंकि अगर यूरोप ने भी शिकायत करना बंद नहीं किया और काम करना शुरू नहीं किया, तो यह कीमत और भी बड़ी होती जाएगी।
रेज़ाई का संदेश साफ है - अब शिकायत का समय खत्म हुआ, अब हिसाब चुकाने का समय है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Nov 4,2026
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