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Monday, 24 February 2025

दिल्ली दंगों के पाँच साल: बरी होते लोग, पुलिस की जाँच पर उठते सवाल

दिल्ली दंगों के पाँच साल: बरी होते लोग, पुलिस की जाँच पर उठते सवाल
दिल्ली के मुस्तफ़ाबाद इलाके में खींची गई ये तस्वीर 26 फ़रवरी 2020 की है. हिंसा में दंगाइयों ने कई दुकानों और घरों को आग लगा दी थी.

जब इतिहास दिल्ली दंगों को देखेगा तो यह बात जरूर चुभेगी कि जाँच एजेंसी ने सही तरीक़े से और आधुनिक वैज्ञानिक तरीक़ों का इस्तेमाल करके जाँच नहीं की. यह विफलता लोकतंत्र के पहरेदारों को निश्चित रूप से परेशान करेगी."

ये कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज विनोद यादव के शब्द हैं.

इन्होंने अपने दो फ़ैसलों में ये टिप्पणी की. उन्होंने यह भी कहा था कि इन दो मामलों में जाँच बहुत ख़राब तरीक़े से हुई है और 'जाँच एजेंसी ने बस अदालत की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश की है.'

पुलिस के कामकाज पर यह एक तल्ख़ टिप्पणी मानी जा सकती है.

पिछले पाँच सालों में ऐसे कई मामले हैं जिसमें कोर्ट ने पुलिस की बहुत आलोचना की है. जैसे, कोर्ट ने किसी मामले में कहा कि 'जाँच सही से नहीं की गई' या 'अभियुक्त को ग़लत तरीक़े से फँसाया गया है' तो किसी मामले में कहा, 'पहले से तय धारणा के आधार पर चार्जशीट दायर की गई है.'

साल 2020 के फरवरी में दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में दिए आँकड़ों के मुताबिक़ दंगों में 53 जानें गई थीं. इनमें 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे. इनके अलावा सैकड़ों लोग घायल हुए. करोड़ों की संपत्ति का नुक़सान हुआ.

पुलिस ने दंगों से जुड़े 758 एफ़आईआर दर्ज़ किए. ख़बरों के मुताबिक, पुलिस ने दो हज़ार से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया था.

लेकिन बड़ा सवाल है, पाँच साल बाद कितनों को इंसाफ़ मिला?

पिछले 2 महीनों में इन सारी एफ़आईआर की मौजूदा स्थिति देखी. कोर्ट के फैसलों का अध्ययन किया.

हमने पाया कि बहुत कम मुकदमों में अभियुक्तों को दोषी पाया जा रहा है. यही नहीं, 80 फ़ीसदी से ज़्यादा केसों में अभियुक्त या तो बरी हो रहे हैं या 'डिस्चार्ज'.

डिस्चार्ज यानी वो मामले जिसमें पुलिस की चार्जशीट दायर होने के बाद कोर्ट को आरोप तय कर करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दिखे.

120 से ज़्यादा फ़ैसलों में 20 केस ऐसे मिले जिसमें लोग दोषी पाए गए हैं. इसमें भी 12 मामले ऐसे हैं जिनमें अभियुक्तों ने अपना गुनाह क़बूल कर लिया था.

यह जानने के लिए कि आख़िर इतने कम मामलों में लोग दोषी क्यों पाए जा रहे हैं, बीबीसी हिंदी ने 126 फ़ैसलों का भी विश्लेषण किया.

हमने इस बारे में दिल्ली पुलिस से मिलकर बात करने की कोशिश की.

उनको ई-मेल के ज़रिए कई बार सवाल भी भेजे पर हमें जवाब नहीं मिला. हालाँकि, दिल्ली हाईकोर्ट में दाख़िल एक जवाब में दिल्ली पुलिस ने कहा कि हर केस की जाँच 'निष्पक्ष और सही तरीक़े से हुई है.'

758 एफ़आईआर की 'स्टेटस' जानने के लिए सूचना के अधिकार के तहत जानकारी पाने के लिए आवेदन किया. हमें आरटीआई से 62 केस की सूचना मिली. ये सारे केस हत्या से जुड़े हैं.

अप्रैल 2024 में पुलिस ने कोर्ट के सामने एक 'स्टेटस रिपोर्ट' दाख़िल की थी. इसमें उन्होंने इन सभी केस में क्या चल रहा है, यह बताया था.

पुलिस ने बताया था कि क़रीब 38% (289) केसों में तहक़ीक़ात चल रही थी. क़रीब 39% (296) में तहक़ीक़ात पूरी होने के बाद कोर्ट में मुकदमा चल रहा था और बचे 23% (173) केस में या तो फ़ैसला आ गया था या उन्हें खारिज कर दिया गया था.

758 एफ़आईआर में से 62 मामले हत्या से जुड़े थे. ये मामले दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपे गए थे. हमारी आरटीआई आवेदन के जवाब में दिल्ली पुलिस ने बताया कि इनमें से अब तक सिर्फ़ एक केस में अपराधी ठहराया गया है. चार मामलों में लोग बरी हुए. वहीं, 39 में मुकदमा जारी है और 15 में जाँच.

बीते दिसंबर ही कड़कड़डूमा कोर्ट ने 22 वर्षीय मोनिश उर्फ़ मोसिन की ग़ैर इरादतन हत्या के लिए पाँच लोगों को सात साल की सज़ा दी थी.

जिन केस में फ़ैसले आए हैं, उनमें अब तक 80% से ज़्यादा केस में अभियुक्त बरी या डिस्चार्ज हो गए हैं.

पुलिस के डेटा के मुताबिक, अप्रैल 2024 तक 19 मामलों में लोगों को दोषी पाया गया. वहीं, 76 केस ऐसे थे जिनमें ट्रायल के बाद लोगों को बरी कर दिया गया. 16 केस ऐसे थे जिसमें अभियुक्त 'डिस्चार्ज' हो गए. यानी पुलिस की चार्जशीट दायर होने के बाद अदालत को इन केसों में ट्रायल शुरू करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले.

हमने इस साल जनवरी में सभी 758 मामलों की मौजूदा स्थिति कड़कड़डूमा कोर्ट की वेबसाइट पर देखी. हमने पाया कि अप्रैल 2024 से जनवरी 2025 के बीच और 18 केस में लोग बरी हुए और एक केस में अभियुक्तों को दोषी पाया गया.

पुलिस की अप्रैल 2024 तक दी गई जानकारी और बीबीसी हिंदी के विश्लेषण को मिला कर देखें तो अबतक 94 मामलों में लोगों को बरी किया गया, 16 में डिस्चार्ज और सिर्फ़ 20 में दोषी पाया गया.