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Wednesday, 21 January 2026

देवेंद्र फडणवीस का 'स्विस निवेश' ड्रामा: मुंबई से दावोस तक का महंगा सफर, घरेलू कंपनी से 'विदेशी' डील!

देवेंद्र फडणवीस का 'स्विस निवेश' ड्रामा: मुंबई से दावोस तक का महंगा सफर, घरेलू कंपनी से 'विदेशी' डील! 
-Friday World January 22,2026 
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में महाराष्ट्रवासियों को एक बड़ा संदेश दिया था—वे स्विट्जरलैंड जा रहे हैं, जहां विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दावोस सम्मेलन में बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से मुलाकात करेंगे और राज्य में भारी-भरकम निवेश लाएंगे। सोशल मीडिया पर कई लोग तारीफ करने लगे: "देवेंद्र जी कितने दूरदर्शी नेता हैं! महाराष्ट्र को ग्लोबल मैप पर ला रहे हैं!" 

फिर क्या था? फडणवीस जी दावोस पहुंचे। बर्फीली वादियों में बर्फबारी का मजा लिया, स्वच्छ हवा में सांस ली, कुछ दिन आराम-फरमाया। लोग सोच रहे थे—अब असली खेल शुरू होगा, विदेशी फंडिंग की बाढ़ आएगी। 

लेकिन असली कहानी तब सामने आई, जब MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर हुए। सबसे चर्चित MoU था—लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का! यह निवेश डेटा सेंटर्स के विकास के लिए था, जो मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में बनेंगे और करीब 1.5 लाख युवाओं को रोजगार देंगे। सुनने में तो कमाल लगता है, लेकिन निवेशक कौन था? 

निवेशक था—**लोढ़ा ग्रुप लिमिटेड** (Lodha Developers)! 

जी हां, वही लोढ़ा ग्रुप, जिसका मुख्यालय मुंबई में है। यह पूरी तरह भारतीय कंपनी है, और इसके प्रमोटर/मालिक परिवार से जुड़े हैं **मंगल प्रभात लोढ़ा**, जो महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा विधायक हैं और फडणवीस सरकार में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री के पद पर आसीन हैं। कंपनी के एमडी और सीईओ अभिषेक लोढ़ा (मंगल प्रभात लोढ़ा के बेटे) ने ही यह MoU साइन किया, और फडणवीस जी ने इसे गवाही दी। अब सवाल उठते हैं: 

- अगर निवेशक मुंबई का ही है, तो दावोस क्यों? मुंबई में ही साइन क्यों नहीं कर लिया?

 - क्या यह सिर्फ एक फोटो-ऑप और 'ग्लोबल इवेंट' का ड्रामा था? 

- महाराष्ट्र सरकार ने दावोस में कुल 19 MoUs साइन किए, जिनकी कुल राशि 14.5 लाख करोड़ बताई गई। लेकिन इनमें से कई अन्य भी भारतीय कंपनियां थीं—जैसे के. रायजा ग्रुप, पंचशील रियल्टी, अल्टा कैपिटल आदि। क्या ये सभी 'विदेशी निवेश' के नाम पर घरेलू डील्स को अंतरराष्ट्रीय रंग देना है? 

विपक्ष ने इसे 'बिजार' (अजीबोगरीब) करार दिया। कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या इसमें कोई छिपा मतलब है? क्या महाराष्ट्र के टैक्सपेयर्स का पैसा विदेशी यात्रा, होटल और प्रोटोकॉल पर बर्बाद किया जा रहा है, जबकि असली डील घरेलू स्तर पर हो सकती थी? 

सरकार का पक्ष है कि दावोस जैसे प्लेटफॉर्म पर साइन करने से वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ती है, और कई MoUs में FDI (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) का हिस्सा भी है। लोढ़ा ग्रुप ने भी दावा किया कि निवेश का बड़ा हिस्सा FDI से आएगा। लेकिन आम आदमी के लिए सवाल वही है—क्या 'नए भारत' में निवेश लाने के लिए स्विस आल्प्स तक जाना जरूरी है, या यह महज शो-ऑफ है?

 यह घटना राजनीति और प्रशासन में एक पुरानी कहावत को याद दिलाती है: "निवेश दिखाओ, लेकिन घरेलू ही सही!" दावोस की चमक-दमक में छिपी यह सच्चाई महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का दावा करती है, लेकिन साथ ही सवाल भी खड़े करती है—क्या असली विकास फोटो-शूट से होता है, या जमीन पर काम से?

 नए भारत में आपका स्वागत है—जहां मुंबई से दावोस का सफर छोटा लगता है, लेकिन सवाल बड़े हो जाते हैं!

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World January 22,2026