-Friday World January 22,2026
प्रयागराज के माघ मेले में चल रहा विवाद अब और गहरा गया है। मौनी अमावस्या (18-19 जनवरी 2026) के दिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गंगा स्नान से रोके जाने और उनके समर्थकों के साथ कथित दुर्व्यवहार के बाद मामला राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर गरमाया हुआ है। अब इस विवाद में द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने खुलकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया है। उन्होंने प्रशासन की कड़ी निंदा की और चेतावनी दी कि सत्ता का अहंकार कभी स्थायी नहीं होता।
स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा, "प्रशासन को इस पूरे मामले पर माफी मांगनी चाहिए। ब्राह्मण बटुकों को पुलिस ने चोटी (शिखा) पकड़कर घसीटा, जो घोर अपमान है। शिखा के अंदर ब्रह्मरंध्र होता है, इसका अपमान करना धर्म और संस्कृति का अपमान है।" उन्होंने आगे जोर देकर कहा, "यह शासन का अहंकार है। सत्ता हर दिन नहीं रहेगी। कभी अपनी ताकत का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।"
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने गंगा स्नान से रोकने को लेकर और भी गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा, "गंगा स्नान से रोकने वालों को गो-हत्या का पाप लगता है। संतों और श्रद्धालुओं को पवित्र स्नान से वंचित करना गोहत्या के समान पाप है, जिसका दंड भुगतना पड़ता है।" यह बयान ऐसे समय में आया है जब माघ मेले में भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के नाम पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे, लेकिन धार्मिक परंपराओं का सम्मान न होने से विवाद बढ़ गया।
विवाद की पृष्ठभूमि माघ मेला 2026 में मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे, जैसा कि परंपरा रही है। लेकिन मेले प्रशासन ने बैरिकेडिंग और भीड़ नियंत्रण के कारण उन्हें रोका। इससे उनके समर्थकों में आक्रोश फैला और झड़प हुई। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि पुलिस ने बटुकों और संतों के साथ कथित रूप से कठोर व्यवहार किया, जिसमें शिखा खींचने जैसी घटनाएं शामिल हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन को नोटिस जारी करने के जवाब में चेतावनी दी कि अगर नोटिस वापस नहीं लिया गया तो मानहानि का मुकदमा करेंगे। वे धरने पर बैठे हुए हैं और माघी पूर्णिमा तक यही स्थिति बनाए रखने की बात कही है।
स्वामी सदानंद सरस्वती और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद दोनों ही दिवंगत शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य थे। स्वरूपानंद जी के निधन के बाद दोनों ने अलग-अलग पीठों पर आसीन होकर सनातन धर्म की सेवा में लगे हैं। इस वजह से सदानंद सरस्वती का समर्थन गुरुभाई के रूप में और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धार्मिक और सामाजिक महत्व शंकराचार्य सदानंद सरस्वती का यह बयान सिर्फ एक घटना की निंदा नहीं है, बल्कि सत्ता और धर्म के बीच संतुलन की याद दिलाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्ता मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह क्षणिक है। गंगा स्नान और गो-हत्या का पाप जोड़कर उन्होंने धार्मिक भावनाओं को और मजबूत किया है। कई संतों और श्रद्धालुओं का मानना है कि मेले में सुरक्षा जरूरी है, लेकिन धार्मिक परंपराओं का अपमान नहीं सहन किया जा सकता।
यह विवाद अब सिर्फ प्रयागराज तक सीमित नहीं रहा। विभिन्न शंकराचार्यों के बयानों से यह स्पष्ट हो रहा है कि सनातन धर्म के प्रमुख आस्थानों में एकता और सम्मान की मांग बढ़ रही है। कुछ पक्षों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद को लेकर पुराने विवाद भी जुड़ गए हैं, लेकिन सदानंद सरस्वती जैसे प्रमुख संत के समर्थन से उनका पक्ष मजबूत हुआ है।
स्वामी सदानंद सरस्वती का यह संदेश समाज को सोचने पर मजबूर करता है – सत्ता का दुरुपयोग कितना खतरनाक हो सकता है और धर्म की रक्षा में संतों की आवाज कितनी महत्वपूर्ण है। उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले को संवेदनशीलता से देखेगा और आवश्यक कदम उठाएगा, ताकि माघ मेला की पवित्रता बनी रहे और कोई धार्मिक भावना आहत न हो।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 22,2026