-Friday World January 20,2026
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें NDTV के संस्थापकों प्रणव रॉय और राधिका रॉय के खिलाफ 2016 में जारी किए गए इनकम टैक्स के री-असेसमेंट नोटिस को पूरी तरह रद्द कर दिया गया है। अदालत ने न केवल इन नोटिस को 'मनमाना' और 'बिना अधिकार' वाला करार दिया, बल्कि इनकम टैक्स विभाग पर 2 लाख रुपये का टोकन जुर्माना भी लगाया। प्रत्येक याचिकाकर्ता (प्रणव और राधिका) को 1-1 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया है। यह फैसला 19 जनवरी 2026 को जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विनोद कुमार की बेंच ने दिया।
मामला क्या था? यह पूरा विवाद RRPR होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड (NDTV का प्रमोटर ग्रुप) द्वारा प्रणव और राधिका रॉय को दिए गए इंटरेस्ट-फ्री लोन से जुड़ा था। इनकम टैक्स विभाग ने 2009-10 के अस्सेसमेंट ईयर के लिए इन लोन को 'अनडिस्क्लोज्ड इनकम' मानते हुए री-असेसमेंट की प्रक्रिया शुरू की थी। नोटिस मार्च 2016 में जारी किए गए थे। लेकिन अदालत ने पाया कि यह दूसरी बार एक ही मुद्दे पर री-असेसमेंट की कोशिश थी, जो कानूनी रूप से गलत और अस्सेसी (टैक्सपेयर) के लिए उत्पीड़न (harassment) के समान है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी की: "री-असेसमेंट की ऐसी प्रक्रिया अनावश्यक उत्पीड़न का कारण बनती है और कानूनी अनिश्चितता पैदा करती है, जो लगभग अराजकता जैसी स्थिति है।" बेंच ने आगे कहा कि "इन मामलों में कोई भी जुर्माना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, लेकिन हम इन्हें बिना किसी लागत के नहीं छोड़ सकते।" यह टिप्पणी विभाग की कार्रवाई को स्पष्ट रूप से 'मनमाना' और संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ बताती है।
NDTV का अधिग्रहण और राजनीतिक संदर्भ 2016 से ही NDTV पर विभिन्न जांच एजेंसियों – इनकम टैक्स, ED (प्रवर्तन निदेशालय) आदि – की नजर रही है। कई लोग इसे मीडिया पर दबाव का हिस्सा मानते थे, खासकर तब जब चैनल की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग सरकार के खिलाफ मानी जाती थी। 2022 में गौतम अडानी ग्रुप ने NDTV में बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर ली, और प्रणव-राधिका रॉय ने डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया। आज NDTV अडानी ग्रुप का हिस्सा है।
यूजर के सवाल में उठाया गया मुद्दा बिल्कुल सटीक है: "जिस काम के लिए ये सब नौटंकी किया गया था वो पूरा हुआ।" कई विश्लेषकों और सोशल मीडिया पर चर्चा होती रही है कि ये टैक्स और ED जांचें NDTV को 'कंट्रोल' करने या खरीदने के लिए दबाव बनाने का तरीका थीं। अब जब चैनल अडानी के हाथ में है, तो पुरानी जांचों को 'खत्म' करने का फैसला आया है। ED या अन्य एजेंसियों को अब टैक्सपेयर्स के पैसे से जुर्माना भरना पड़ रहा है – एक तरह से जनता का पैसा एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर हो रहा है।
क्या अब सभी केस खत्म होने चाहिए? यह फैसला NDTV और रॉय दंपति के लिए बड़ी राहत है। लेकिन सवाल उठता है: क्या अब बाकी लंबित जांचों – जैसे ED के मनी लॉन्ड्रिंग केस या अन्य टैक्स डिमांड – को भी बंद किया जाना चाहिए? अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दोबारा एक ही मुद्दे पर कार्रवाई उत्पीड़न है। अगर अन्य जांचें भी इसी तरह की हैं, तो उन्हें भी रिव्यू करने की जरूरत है।
यह मामला भारतीय मीडिया और टैक्स सिस्टम में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है। जब जांचें राजनीतिक लगती हैं, तो न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल रॉय दंपति को न्याय देता है, बल्कि टैक्स विभाग को भी चेतावनी देता है कि मनमानी कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अंत में, यह घटना याद दिलाती है कि स्वतंत्र मीडिया पर दबाव के दौर में भी कानून अपना काम कर सकता है। लेकिन सवाल बाकी है: क्या यह 'नौटंकी' का असली अंत है, या सिर्फ एक अध्याय का?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 20,2026