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Thursday, 5 February 2026

"अंधेरे सुरंगों में दम तोड़ते मजदूर: मेघालय का एक और रैट-होल हादसा, 18 जिंदगियां राख, कानून की नींद अभी भी गहरी"

"अंधेरे सुरंगों में दम तोड़ते मजदूर: मेघालय का एक और रैट-होल हादसा, 18 जिंदगियां राख, कानून की नींद अभी भी गहरी" -Friday world 5/2/2026
        प्रतिकात्मक तस्वीर 
मेघालय खदान हादसा: मौत का आंकड़ा 18 पर पहुंचा, रैट-होल माइनिंग की काली सच्चाई फिर उजागर 

मेघालय के पूर्वी जैंतिया हिल्स जिले में 5 फरवरी 2026 को एक बार फिर मौत ने दस्तक दी। थंगस्काई (Thangskai) इलाके की एक गैर-कानूनी रैट-होल कोयला खदान में विस्फोट हुआ, जिसमें अब तक 18 मजदूरों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। एक घायल मजदूर को शिलांग के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि कई और लोग अभी भी सुरंग के अंदर फंसे होने की आशंका है। 

पूर्वी जैंतिया हिल्स के पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने मीडिया को बताया, "हादसे के दौरान बचाव अभियान में 18 शव बरामद हुए हैं। शवों की अभी पहचान नहीं हो पाई है। हम खदान मालिकों और संचालकों की जानकारी जुटा रहे हैं, जल्द सख्त कार्रवाई होगी।" डीजीपी आई. नोंगरांग ने भी कहा कि खदान के अंदर कितने लोग थे और कितने फंसे हैं, इसकी सटीक जानकारी अभी नहीं है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्थानीय बचाव दल लगातार कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उपकरणों की कमी और सुरंग की गहराई ने काम को मुश्किल बना दिया है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएमएनआरएफ से प्रत्येक मृतक के परिजनों को 2 लाख रुपये और घायल को 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की है। मुख्यमंत्री कोनराड के. सांगमा ने भी घटना की जांच के आदेश दिए हैं और जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया है। लेकिन सवाल ये है—क्या ये घोषणाएं और जांचें मौतों को रोक पाएंगी? 

 रैट-होल माइनिंग: मौत का काला खेल रैट-होल माइनिंग कोयला निकालने की सबसे खतरनाक और गैर-कानूनी विधि है। इसमें संकरी, क्षैतिज सुरंगें बनाई जाती हैं—जिन्हें 'चूहे के बिल' जैसा कहा जाता है। एक व्यक्ति मुश्किल से अंदर जा सकता है। कोई सुरक्षा उपकरण नहीं, कोई वेंटिलेशन सिस्टम नहीं, कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं। डायनामाइट से ब्लास्टिंग होती है, जिससे मीथेन गैस या धूल जमा होकर विस्फोट हो जाता है। 

2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मेघालय में रैट-होल माइनिंग और कोयला परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। कारण—पर्यावरण को भारी नुकसान और बार-बार होने वाले हादसे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रतिबंध को बरकरार रखा। लेकिन हकीकत ये है कि प्रतिबंध सिर्फ कागजों पर है। कोयला माफिया, स्थानीय प्रभावशाली लोग और राजनीतिक संरक्षण के चलते ये खदानें दिन-रात चल रही हैं। 

2018 में इसी पूर्वी जैंतिया हिल्स के क्षान (Ksan) इलाके में एक रैट-होल खदान में पानी भर जाने से 15 मजदूरों की मौत हो गई थी। वे 370 फीट गहराई में फंस गए थे। तब भी बड़े-बड़े वादे हुए, जांच हुई, लेकिन बदलाव कुछ नहीं आया। 2025 के अंत में भी एक और हादसा हुआ था। आंकड़े बताते हैं कि 2012 से अब तक पूर्वोत्तर में रैट-होल माइनिंग से 63 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। लेकिन ये सिर्फ आंकड़े हैं—हर मौत के पीछे एक परिवार बिखरता है, बच्चे अनाथ होते हैं, मांएं विधवा। 

 मजदूरों की मजबूरी, मालिकों की कमाई ज्यादातर मजदूर असम, बिहार, झारखंड और पड़ोसी राज्यों से आते हैं। वे गरीबी और बेरोजगारी के कारण यहां आते हैं। रोजाना 500-1000 रुपये कमाने के लिए वे मौत के मुंह में कूद पड़ते हैं। खदान मालिकों को सस्ता कोयला निकालने में फायदा है—क्योंकि कोई लाइसेंस फीस, कोई टैक्स, कोई सुरक्षा खर्च नहीं। कोयला स्थानीय बाजारों और बाहर भेजा जाता है। परिवहन पर भी रोक है, लेकिन ट्रकों में छिपाकर कोयला निकाला जाता है। 

इस पूरे सिस्टम में राजनीतिक-प्रशासनिक मिलीभगत साफ दिखती है। चुनाव के समय कोयला माफिया फंडिंग करते हैं, बदले में संरक्षण मिलता है। हादसे के बाद जांच होती है, कुछ गिरफ्तारियां, फिर सब शांत। मजदूरों के परिवारों को कुछ मुआवजा मिलता है, लेकिन जिंदगी नहीं लौटती। 

क्या कभी रुकेगा ये सिलसिला? मेघालय सरकार ने कई बार कहा है कि अवैध खदानों पर कार्रवाई हो रही है। लेकिन हकीकत में खदानें फिर से खुल जाती हैं। एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं हो रहा। केंद्र सरकार भी चुप है। मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार की कोई योजना नहीं। पर्यावरण बचाने के नाम पर प्रतिबंध लगा, लेकिन मजदूरों की जान बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं।

 ये हादसा सिर्फ एक विस्फोट नहीं है—ये हमारी व्यवस्था की नाकामी है। जहां गरीब की जान सस्ती है, जहां कानून अमीरों के लिए लचीला है, जहां जांचें सिर्फ समय काटने के लिए होती हैं। 

18 जिंदगियां चली गईं। कितनी और जाएंगी? क्या हम इंतजार करेंगे अगले हादसे का? या अब सच में कुछ बदलेगा—प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया जाएगा, माफियाओं पर कार्रवाई होगी, मजदूरों को सुरक्षित रोजगार मिलेगा?

 भाड़ में जाए ऐसी व्यवस्था जो मजदूरों को मौत की खदानों में धकेलती है।

 अब वक्त है जागने का—क्योंकि हर मौत हमें चेतावनी दे रही है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 5/2/2026