भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा: रूसी क्रूड का युग अंतिम चरण में?
15 फरवरी 2026: भारत और अमेरिका के बीच 2 फरवरी 2026 को घोषित अंतरिम व्यापार समझौते ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी हलचल मचा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की घोषणा करते हुए दावा किया कि भारत ने रूसी क्रूड ऑयल की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात पूरी तरह बंद करने का वादा किया है। बदले में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगे 25% पेनल्टी टैरिफ हटा दिए हैं और मुख्य रेसिप्रोकल टैरिफ को 18% तक घटा दिया है। यह बदलाव 7 फरवरी 2026 से लागू हो गया है।
इस समझौते के बाद भारतीय रिफाइनर्स रूसी तेल की नई खरीद से दूर रह रहे हैं, खासकर मार्च-अप्रैल 2026 की डिलीवरी के लिए। ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी तेल की आयात में उल्लेखनीय कमी आई है और अमेरिकी क्रूड तथा वेनेजुएला की ओर रुख किया जा रहा है। सरकारी और निजी रिफाइनर्स को स्पॉट मार्केट में अमेरिकी तेल को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है, जबकि वेनेजुएला के तेल के लिए प्राइवेट ट्रेडर्स (विटोल, ट्रेफिगुरा) के साथ बातचीत जारी है।
रूसी तेल आयात में तेज गिरावट: अमेरिकी दबाव, प्रतिबंध और व्यापार समझौते का परिणाम** यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी तेल डिस्काउंट पर मिलने से भारत ने इसकी आयात में भारी वृद्धि की थी – 2025 में रूस 30-35% हिस्सेदारी रखता था और कभी-कभी 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mb/d) तक पहुंच गया था। लेकिन अमेरिकी दबाव, 25% पेनल्टी टैरिफ और नए प्रतिबंधों के कारण रुझान बदल रहा है:
- जनवरी 2026 में रूसी तेल आयात 1.1 mb/d रहा, जो तीन साल में सबसे कम है (2022 के बाद का निचला स्तर)।
- दिसंबर 2025 में आयात दो साल के निचले स्तर पर पहुंचा, 22% की गिरावट।
- अप्रैल-दिसंबर 2025 में रूसी तेल आयात 17% घटकर $33.1 बिलियन रहा।
- विशेषज्ञों (Kpler, J.P. Morgan, Vortexa) के अनुमान के अनुसार मार्च 2026 तक हिस्सेदारी 15-17% रह सकती है, वॉल्यूम 0.8-1.0 mb/d तक गिर सकता है और लंबे समय में 500,000-600,000 bpd तक पहुंच सकता है।
भारत सरकार और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा, विविधता और रणनीतिक स्वायत्तता प्राथमिकता है। फैसले लागत, जोखिम और उपलब्धता के आधार पर लिए जाएंगे, राजनीतिक दबाव से नहीं। अमेरिकी दावों को सीधे स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने पर जोर दिया गया है।
अमेरिकी और वेनेजुएला तेल: फायदे, चुनौतियां और बढ़ती खरीद** अमेरिकी क्रूड 'लाइट एंड स्वीट' (कम सल्फर वाला) है, जबकि भारतीय रिफाइनरियां मीडियम-हैवी क्रूड के लिए अनुकूल हैं। दूरी ज्यादा होने से फ्रेट खर्च बढ़ता है। फिर भी:
- अमेरिका से आयात में 65% से अधिक वृद्धि (अप्रैल-दिसंबर 2025 में $8.2 बिलियन)।
- यूएस क्रूड अब भारत की कुल आयात का लगभग 10% है।
- भारतीय रिफाइनर्स सालाना 20 मिलियन टन (400,000 bpd) अमेरिकी तेल ले सकते हैं, जो पिछले साल से दोगुना है।
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। अमेरिकी लाइसेंस मिलने से आयात फिर शुरू हुआ है। IOC, HPCL, BPCL ने 40 लाख बैरल से ज्यादा खरीदा है। रिलायंस ने भी हाल ही में खरीद शुरू की है। अमेरिका ने वेनेजुएला तेल को भारत के लिए विकल्प के रूप में प्रोत्साहन दिया है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा: विविधता, स्वायत्तता और नए विकल्प** भारत 85-90% तेल आयात करता है। रूसी डिस्काउंट का फायदा मिलता था, लेकिन अब भू-राजनीतिक दबाव और व्यापार समझौते के कारण अमेरिका, वेनेजुएला, सऊदी अरब, इराक और UAE की ओर रुख किया जा रहा है। सऊदी अरब फरवरी 2026 के पहले 10 दिनों में शीर्ष सप्लायर बन गया है।
इस बदलाव से खर्च बढ़ सकता है (रूसी तेल की कमी से 1-2% ज्यादा आयात बिल), रिफाइनरियों को अनुकूलन करना पड़ेगा और ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। भारत की ऊर्जा नीति अब केवल आर्थिक नहीं रही, बल्कि राजनीतिक और वैश्विक संतुलन का हिस्सा बन गई है। रूसी तेल का युग खत्म हो रहा है या नहीं, समय ही बताएगा, लेकिन अमेरिका की ओर मुड़ना अब अपरिहार्य हो गया है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर इसका कितना असर पड़ेगा? यह सवाल अभी लंबित है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 🌎 15 Feb 2026