-Friday World 1st March 2026
2010-12 के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर गहरा संकट मंडरा रहा था। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग चैनल बंद हो गए थे। ईरान से कच्चा तेल आयात करना मुश्किल हो गया था, क्योंकि पेमेंट का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा था। ऐसे समय में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने साहसिक फैसला लिया – भारत ईरान से तेल खरीदना जारी रखेगा, चाहे कितने भी प्रतिबंध क्यों न लगें!
डॉ. सिंह ने UCO बैंक को ईरान के लिए "एक्सक्लूसिव पेमेंट गेटवे" बनाया। यह एक ऐसी रणनीति थी जो न सिर्फ भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती थी, बल्कि एक घाटे में चल रहे बैंक को जीवनदान भी देती थी। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को सीधे पेमेंट नहीं किया जा सकता था। इसलिए भारतीय रिफाइनरियां (जैसे IOCL, HPCL आदि) ईरान से तेल खरीदकर UCO बैंक में रुपये जमा करने लगीं। महत्वपूर्ण बात यह थी कि ईरान ने इस राशि पर कोई ब्याज नहीं लिया – यह पूरी तरह "इंटरेस्ट फ्री" फंड था!
UCO बैंक में हजारों करोड़ रुपये जमा होने लगे। चूंकि ये फंड इंटरेस्ट फ्री थे और ईरान को पेमेंट में देरी हो रही थी (व्यापार असंतुलन के कारण), बैंक ने इन पैसों को निवेश करना शुरू किया। बैंक ने इन फंड्स से लोन दिए, अन्य निवेश किए और भारी मुनाफा कमाया। रिपोर्ट्स के अनुसार, UCO बैंक को लगभग 13,000-14,000 करोड़ रुपये का इंटरेस्ट मिला – जो उस समय की वैल्यू में एक बड़ा आंकड़ा था। आज की मुद्रास्फीति और मूल्य वृद्धि को देखते हुए यह राशि 50-60 हजार करोड़ या उससे भी ज्यादा हो सकती है। ईरान ने इस "इंटरेस्ट" को कभी क्लेम नहीं किया और इसे भारत के विकास में योगदान के रूप में छोड़ दिया।
यह फैसला डॉ. मनमोहन सिंह की दूरदर्शिता का नतीजा था। उन्होंने ईरान की टॉप लीडरशिप (अयातुल्लाह खामेनेई सहित) के साथ मिलकर यह रणनीति तैयार की। ईरान ने स्पष्ट कहा था कि अगर उनका पैसा भारत के विकास कार्यों में लगता है, तो यह उनकी खुशकिस्मती होगी। नतीजा? घाटे में डूबा UCO बैंक मुनाफे में आ गया। बैंक के शेयरों में तेजी आई, नेट इंटरेस्ट इनकम बढ़ी और बैंक ने अपनी बैलेंस शीट मजबूत की। यह भारत-ईरान दोस्ती का एक जीता-जागता उदाहरण था – जहां दोनों देशों ने एक-दूसरे की मुश्किलों में साथ दिया।
ईरान से तेल आयात भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण था। ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर था, और प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने 400,000 बैरल प्रतिदिन तक आयात जारी रखा। रुपये में पेमेंट मैकेनिज्म ने भारत को विदेशी मुद्रा बचाई और ईरान को भारतीय सामान (जैसे चावल, दवाइयां, चाय आदि) खरीदने का मौका दिया। यह एक विन-विन स्थिति थी, जहां ईरान ने भारत को 14,000 करोड़ का "तोहफा" दिया और भारत ने ईरान की अर्थव्यवस्था को सपोर्ट किया।
आज जब अयातुल्लाह खामेनेई की शहादत की खबरें आ रही हैं, तो यह दास्तान और भी प्रासंगिक हो जाती है। भारत-ईरान की दोस्ती एक ऋण है – डॉ. मनमोहन सिंह और खामेनेई के बीच बने विश्वास का ऋण। दोनों देश कभी इस ऋण को पूरी तरह चुका नहीं सकते। यह दोस्ती सिर्फ तेल और व्यापार की नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, सहयोग और रणनीतिक साझेदारी की है।
दुर्भाग्य से, वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक दोस्ती पर सवाल उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खामेनेई की शहादत पर कोई सार्वजनिक श्रद्धांजलि नहीं दी। क्या यह मौन भारत की विदेश नीति में बदलाव का संकेत है? क्या हम उस दोस्ती को भूल रहे हैं जिसने हमें ऊर्जा संकट से बचाया और एक बैंक को डूबने से रोका? सवाल गंभीर हैं – क्या हम "गद्दार" बन गए हैं? क्या हासिल होगा इस मौन से?
भारत-ईरान दोस्ती सदियों पुरानी है। चाबहार पोर्ट, ऊर्जा सहयोग, सांस्कृतिक संबंध – सब कुछ इस दोस्ती पर टिका है। डॉ. मनमोहन सिंह की रणनीति ने साबित किया कि साहस और दूरदर्शिता से मुश्किलें अवसर बन सकती हैं। ईरान ने भारत को 14,000 करोड़ का इंटरेस्ट गिफ्ट दिया – यह सिर्फ पैसे की बात नहीं, बल्कि विश्वास और दोस्ती की मिसाल है।
डॉ. मनमोहन सिंह का आशीर्वाद हमेशा बना रहे। अयातुल्लाह खामेनेई को सलाम! भारत-ईरान दोस्ती जिंदाबाद! जय हिंद!
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 1st March 2026