ईरान ने ट्रंप की 'तेल छूट' को ठुकराया – "समुद्र में फंसा तेल नहीं, अमेरिका बाजार को झूठी उम्मीद दे रहा है" | होर्मुज संकट, 112 डॉलर का क्रूड और भारत पर मंहगाई का साया
21 मार्च 2026। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। क्रूड ऑयल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं – पिछले एक साल में 53% का उछाल। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर तनाव के कारण दुनिया का करीब 20% तेल व्यापार ठप पड़ा हुआ है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कदम उठाया – ईरान के क्रूड ऑयल पर लगे प्रतिबंधों में 30 दिनों की अस्थायी छूट।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने घोषणा की कि 20 मार्च से 19 अप्रैल तक ईरान के उन जहाजों को तेल बेचने की इजाजत होगी जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। उनका दावा है कि इससे लगभग 14 करोड़ बैरल तेल बाजार में आ सकता है, जिससे कीमतों पर ब्रेक लगेगा और वैश्विक मंहगाई को कुछ राहत मिलेगी। लेकिन ईरान ने इस 'उदारता' को ठुकरा दिया और सीधे-सीधे अमेरिका पर झूठ बोलने का आरोप लगाया।
ईरान का साफ-साफ जवाब: "हमारे पास अतिरिक्त तेल ही नहीं है" ईरान के पेट्रोलियम मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट लिखा:
"हमारे पास समुद्र में फंसा हुआ या बाहर भेजने के लिए कोई अतिरिक्त क्रूड ऑयल नहीं है। अमेरिका जो बता रहा है, वह महज बाजार को झूठी उम्मीद देने का प्रयास है। इतना तेल है ही नहीं जितना वे दावा कर रहे हैं। इसलिए यह छूट बेकार है।"
ईरान का कहना है कि अमेरिका जानबूझकर अतिशयोक्ति कर रहा है ताकि तेल की कीमतें अचानक गिरें और ट्रंप प्रशासन को घरेलू स्तर पर राहत मिले। ईरान के अनुसार, होर्मुज संकट के बावजूद उनके पास कोई बड़ा स्टॉक समुद्र में फंसा नहीं है। जो जहाज फंसे हैं, वे बहुत कम मात्रा में हैं और वे भी पहले से ही बिक्री के लिए तैयार नहीं थे।
दोनों पक्षों के दावे – कौन बोल रहा है सच? **अमेरिका का पक्ष:**
- होर्मुज स्ट्रेट पर ईरानी हमलों और माइनिंग की वजह से दर्जनों टैंकर फंसे हुए हैं। - इनमें से अधिकांश ईरानी क्रूड से लदे हैं।
- 30 दिन की छूट से ये जहाज सुरक्षित रूप से निकल सकेंगे और बाजार में तेल आएगा।
- इससे कीमतें 100 डॉलर से नीचे आ सकती हैं, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ट्रंप की इमेज के लिए फायदेमंद होगा।
ईरान का पक्ष:
- कोई बड़ा अतिरिक्त स्टॉक समुद्र में फंसा नहीं है।
- अमेरिका प्रोपेगैंडा चला रहा है ताकि निवेशक और ट्रेडर्स घबराहट में तेल बेचना शुरू कर दें।
- असल में ईरान की तेल निर्यात क्षमता पहले ही प्रतिबंधों से बुरी तरह प्रभावित है।
- यह छूट सिर्फ दिखावा है
– क्योंकि बेचने लायक तेल ही नहीं बचा।
विश्लेषकों का मानना है कि दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से बोल रहे हैं। ट्रंप को घरेलू मंहगाई से बचना है, जबकि ईरान नहीं चाहता कि दुनिया को लगे कि अमेरिकी दबाव काम कर रहा है।
युद्ध का 21वां दिन: ट्रंप का 'एग्जिट प्लान' और होर्मुज से पीछे हटने का संकेत
युद्ध के 21वें दिन ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक लंबा पोस्ट लिखा, जिसमें उन्होंने दावा किया:
"हमारे सैन्य उद्देश्य पूरे हो चुके हैं या होने वाले हैं। हमने ईरान की मिसाइल क्षमता, रक्षा उद्योग, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह तबाह कर दिया है। हम ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे। हमने इजरायल के साथ-साथ सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत की रक्षा की है और आगे भी करेंगे।"
ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा अब उन देशों की जिम्मेदारी है जो वहां से तेल ले जाते हैं। "अमेरिका इस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करता। जरूरत पड़ने पर मदद करेंगे, लेकिन मुख्य जिम्मेदारी उन देशों की है।"
यह बयान साफ संकेत देता है कि अमेरिका धीरे-धीरे युद्ध से पीछे हटने की तैयारी में है। सीजफायर की अटकलें तेज हो गई हैं। ट्रंप इसे अपनी 'जीत' के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि ईरान इसे अमेरिकी हार के रूप में देख रहा है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा? भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। हम अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल बाहर से मंगाते हैं। भले ही भारत सीधे ईरान से लंबे समय से तेल नहीं खरीद रहा, लेकिन वैश्विक कीमतों में उछाल का असर सीधा भारत पर पड़ता है।
- क्रूड 112 डॉलर
→ पेट्रोल-डीजल में 5-10 रुपये प्रति लीटर का इजाफा संभव।
- माल ढुलाई महंगी
→ सब्जी, दाल, राशन सब महंगा।
- रुपया कमजोर
→ डॉलर के मुकाबले 88-90 तक जा सकता है।
- विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव।
अगर ट्रंप की छूट से कीमतें 90-95 डॉलर तक गिरती हैं, तो भारत को राहत मिल सकती है। पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहेंगे, रुपया मजबूत होगा और महंगाई पर कुछ ब्रेक लगेगा। लेकिन अगर ईरान का दावा सही निकला और कोई बड़ा तेल बाजार में नहीं आया, तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
बड़ी तस्वीर: ऊर्जा युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था यह सिर्फ तेल का मामला नहीं है
– यह एक बड़ी जियोपॉलिटिकल जंग है। - अमेरिका और इजरायल ईरान को कमजोर करना चाहते हैं।
- ईरान होर्मुज को हथियार बनाकर दुनिया पर दबाव बनाना चाहता है।
- चीन और भारत जैसे बड़े खरीदार मिडिल ईस्ट के युद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
- रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है जो वैश्विक सप्लाई चेन को हिला रहा है।
ट्रंप की 'छूट' और ईरान का 'नकार' दोनों ही प्रचार का हिस्सा लगते हैं। असल सवाल यह है कि युद्ध कब खत्म होगा और होर्मुज कब खुलेगा। जब तक वह नहीं होता, पेट्रोल की आग हर देश में जलती रहेगी – और सबसे ज्यादा जलन आम आदमी को होगी।
ट्रंप चाहते हैं कि वे 'विजेता' बनकर निकलें, ईरान चाहता है कि वह 'अटूट' दिखे। बीच में फंसे हैं – वैश्विक अर्थव्यवस्था और करोड़ों आम लोग।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 21,2026