-Friday World March 20,2026
पश्चिम एशिया में छिड़े ईरान-अमेरिका-इज़राइल युद्ध ने अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। जहां एक ओर भारतीय फार्मास्युटिकल निर्यातकों को मार्च महीने में ही 2,500 से 5,000 करोड़ रुपये तक का संभावित नुकसान होने का अनुमान है, वहीं दूसरी ओर कच्चे माल (API) की कीमतों में भारी उछाल से दवाइयों की कीमतें 20-25% तक बढ़ सकती हैं। यह युद्ध न सिर्फ निर्यात को प्रभावित कर रहा है, बल्कि घरेलू बाजार में भी दवाओं, सर्जिकल सामान और पैकेजिंग मटेरियल की लागत बढ़ा रहा है, जिसका बोझ अंततः आम नागरिक पर पड़ेगा।
फार्मा निर्यात पर गहरा संकट: 5,000 करोड़ का नुकसान क्यों? फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (Pharmexcil) के अनुसार, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका (WANA) क्षेत्र भारत के फार्मा निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा है। GCC देशों (जैसे UAE, सऊदी अरब, ओमान) में भारतीय जेनेरिक दवाओं की मांग बहुत अधिक है। युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट प्रभावित हो गए हैं। जहाजों को वैकल्पिक रास्ते से जाना पड़ रहा है, जिससे फ्रेट रेट दोगुने से भी अधिक हो गए हैं। कई शिपिंग कंपनियां अब इस क्षेत्र में माल ढुलाई से इनकार कर रही हैं।
Pharmexcil के चेयरमैन नमित जोशी ने चेतावनी दी है कि यदि मार्च में निर्यात पूरी तरह ठप हो जाता है, तो भारतीय फार्मा इंडस्ट्री को 2,500 से 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में WANA क्षेत्र में भारतीय फार्मा निर्यात $1,320 मिलियन से बढ़कर $1,749 मिलियन तक पहुंच चुका है। इस क्षेत्र में फार्मा निर्यात भारत के कुल फार्मा एक्सपोर्ट का करीब 5-6% है, लेकिन इसका असर पूरे सेक्टर पर पड़ता है। उच्च फ्रेट लागत, वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम और डिलीवरी में देरी से छोटे-मध्यम निर्यातक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
दवाइयों की कीमतों में उछाल: कच्चे माल पर युद्ध की मार युद्ध का सबसे बड़ा असर फार्मा रॉ मटेरियल पर पड़ रहा है। भारत अपनी ज्यादातर एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) चीन से आयात करता है, लेकिन शिपिंग रूट्स की बाधा से कंटेनरों की कमी हो गई है। परिणामस्वरूप, API और अन्य केमिकल्स की कीमतें 20-60% तक बढ़ गई हैं। कुछ प्रमुख उदाहरण:
- पैरासिटामोल (बुखार की आम दवा) के कच्चे माल की कीमत में 47% तक की बढ़ोतरी।
- डाइक्लोफेनाक (पेनकिलर) में 54% और डाइक्लोफेनाक पोटैशियम में 33% उछाल।
- अमोक्सिसिलिन ट्राइहाइड्रेट (एंटीबायोटिक) में 45% और सिप्रोफ्लोक्सासिन में 62% तक वृद्धि।
- ग्लिसरीन जैसे सॉल्वेंट्स में 64% तक की तेजी।
इन बढ़ी हुई लागतों से टैबलेट, सिरप और इंजेक्शन बनाने का खर्च बढ़ रहा है। पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, एल्युमिनियम फॉयल और अन्य मटेरियल भी महंगा हो गया है, क्योंकि ये पेट्रोकेमिकल्स पर आधारित हैं और क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल से प्रभावित हैं।
दवा निर्माता और निर्यातक लक्ष्य खन्ना जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन खर्च बढ़ने से दवाओं की कीमतों में 20-25% की बढ़ोतरी हो सकती है। सर्जिकल प्रोडक्ट्स जैसे सिरिंज, ग्लव्स और अन्य आइटम्स भी प्रभावित होंगे। दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आशीष ग्रोवर ने बताया कि थोक बाजार में पहले से ही 10-15% की बढ़ोतरी देखी जा रही है।
आम आदमी पर असर: हर घर में महंगाई की लहर यह युद्ध सिर्फ फार्मा सेक्टर तक सीमित नहीं है। ड्राई फ्रूट्स, सोया, पैकेजिंग मटेरियल और अन्य आयातित वस्तुओं के दाम भी बढ़ रहे हैं। क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी। नतीजा? बाजार में हर चीज महंगी हो जाएगी।
छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। जहां पहले से महंगाई से जूझ रहे लोग हैं, वहां दवाइयों का बढ़ना स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचा तो स्टॉक खत्म होने पर दवाओं की कमी भी हो सकती है, खासकर एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की दवाओं में।
सरकार और इंडस्ट्री की तैयारी: क्या होगा आगे? फार्मा इंडस्ट्री ने सरकार से आपातकालीन अनुमति मांगी है कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर से ऊपर जाकर अस्थायी रूप से दवाओं के दाम बढ़ाने की इजाजत दी जाए। Pharmexcil और अन्य संगठन आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए वैकल्पिक रूट्स और स्टॉक बफर पर काम कर रहे हैं। लेकिन यदि युद्ध जारी रहा तो लंबे समय तक महंगाई और कमी का खतरा बना रहेगा।
यह युद्ध एक बार फिर साबित कर रहा है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव कितनी तेजी से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देश, जो आयात पर निर्भर हैं, सबसे ज्यादा नुकसान उठाते हैं। समय आ गया है कि आत्मनिर्भर भारत के तहत API और केमिकल्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए।
अभी के लिए, आम नागरिकों को सलाह है कि जरूरी दवाओं का स्टॉक रखें और कीमतों में बदलाव पर नजर रखें। यह युद्ध न सिर्फ ईरान की जमीन पर लड़ा जा रहा है, बल्कि इसकी आंच भारत के बाजार और घर-घर तक पहुंच चुकी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 20,2026