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Saturday, 21 March 2026

श्रीलंका ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को "नो" कहा: तटस्थता की जीत, लेकिन" एपस्टीन फाइल्स का साया—क्या ब्लैकमेल ने विदेश नीति को कमजोर किया?

श्रीलंका ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को "नो" कहा: तटस्थता की जीत, लेकिन" एपस्टीन फाइल्स का साया—क्या ब्लैकमेल ने विदेश नीति को कमजोर किया?
-Friday World March 21,2026
मार्च 2026 में, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमले शुरू किए और मध्य पूर्व में युद्ध की आग फैल रही थी, तब एक छोटे से द्वीप देश ने दुनिया को हैरान कर दिया। श्रीलंका ने अमेरिका के दो सशस्त्र फाइटर जेट्स को अपने मैटाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पर उतरने और पार्क करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।

 राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिस्सनायके ने 20 मार्च को संसद में इसकी पूरी डिटेल बताई: 

"26 फरवरी को अमेरिकी दूतावास ने अनुरोध किया था कि दो कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को मैटाला एयरपोर्ट पर लैंडिंग और पार्किंग की इजाजत दी जाए। ये जेट्स जिबूती के अमेरिकी बेस से आ रहे थे और इनमें आठ एंटी-शिप मिसाइलें लोड थीं। अनुरोध मार्च 4 और 8 के लिए था, लेकिन हमने दोनों बार ठुकरा दिया।" 

 संसद में इस बयान पर तालियां गूंजीं। यह छोटे देश की उस हिम्मत का प्रतीक था जो सुपरपावर के सामने भी नहीं झुकी। श्रीलंका ने न सिर्फ अमेरिका को मना किया, बल्कि उनका गरुर को भी तोड़ा 

 महाशक्ति से दूरी बनाकर अपनी संप्रभुता साबित की। 

श्रीलंका की तटस्थता: छोटा देश, बड़ा संदेश श्रीलंका की विदेश नीति का मूल आधार तटस्थता है। भारत-चीन के बीच संतुलन बनाए रखते हुए, अमेरिका के साथ अच्छे संबंध रखते हुए भी, श्रीलंका ने कभी अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र को बड़े युद्धों में इस्तेमाल नहीं होने दिया। मैटाला एयरपोर्ट—जिसे कभी "व्हाइट एलीफेंट" कहा जाता था—मुख्य रूप से सिविलियन उपयोग के लिए है। श्रीलंका ने इसे सैन्य बेस नहीं बनने दिया।

 इस फैसले ने वैश्विक मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरीं:

 - न्यूयॉर्क टाइम्स, रॉयटर्स, अल जजीरा, द हिंदू—सभी ने रिपोर्ट किया।

 - राष्ट्रपति दिस्सनायके की तारीफ हुई कि उन्होंने दबाव में नहीं आए। 

- यह दिखाता है कि छोटे देश भी सुपरपावर को "नहीं" कह सकते हैं, अगर नीति स्पष्ट और हिम्मत हो। 

ईरान-अमेरिका युद्ध में इंडियन ओशन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिका को लॉजिस्टिक्स, रिफ्यूलिंग और इमरजेंसी लैंडिंग की जरूरत थी। श्रीलंका ने इनकार करके साफ संदेश दिया—हम किसी के पाले में नहीं हैं। इससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है, लेकिन तटस्थता प्राथमिकता बनी रही। 

 "विश्व गुरु" की छवि पर सवाल: एपस्टीन फाइल्स का कनेक्शन? 

श्रीलंका की इस घटना को सोशल मीडिया पर भारत से जोड़कर देखा जा रहा है। कई यूजर्स कह रहे हैं—श्रीलंका ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को "नहीं" कहा, जबकि "विश्व गुरु" कहलाने वाले देश में अमेरिकी सैन्य जहाजों को बंदरगाहों पर खुली छूट, क्वाड अभ्यासों में हिस्सेदारी और कई अन्य गतिविधियां जारी हैं। 

यह तुलना इसलिए और तीखी हो रही है क्योंकि जनवरी-फरवरी 2026 में जारी एपस्टीन फाइल्स में कुछ अप्रत्यक्ष संदर्भ आए हैं, जिन्होंने "विश्व गुरु" की छवि पर सवाल खड़े किए। फाइल्स में ईमेल्स हैं जहां जेफरी एपस्टीन ने दावा किया कि 2017 में इज़राइल यात्रा के दौरान "सलाह" ली गई और "ट्रंप के फायदे के लिए डांस और सिंग" किया गया। कुछ ईमेल्स में अनिल अंबानी और अन्य भारतीय बिजनेस फिगर्स के साथ चर्चा का जिक्र है, जहां अमेरिकी राजनीतिक कनेक्शन और विदेश नीति पर बात हुई। 

- एपस्टीन ने एक ईमेल में लिखा: "The Indian Prime Minister took advice and danced and sang in Israel for the benefit of the US president." 

- हार्दीप सिंह पुरी के साथ भी एपस्टीन के कई ईमेल्स हैं, जहां "डिजिटल इंडिया" और अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई। 
- विदेश मंत्रालय ने इसे "ट्रैशी रुमिनेशन्स ऑफ ए कन्विक्टेड क्रिमिनल" कहा और खारिज किया कि कोई डायरेक्ट कनेक्शन नहीं है। कोई मीटिंग, फ्लाइट लॉग या पर्सनल इंटरैक्शन नहीं मिला। 

- लेकिन विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया—प्रदर्शन हुए, सवाल उठे कि क्या कोई "अप्रत्यक्ष प्रभाव" विदेश नीति पर पड़ा?

 कई विश्लेषक पूछ रहे हैं—क्या एपस्टीन फाइल्स में ब्लैकमेल या प्रभाव का कोई साया विदेश नीति पर पड़ा? श्रीलंका ने अमेरिका को "नो" कहा, लेकिन "विश्व गुरु" वाली छवि वाले देश में ईरान पर सख्ती, रूस से दूरी और अमेरिका के साथ करीबी को "कम्प्रोमाइज्ड" स्थिति माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स कह रहे हैं: "श्रीलंका ने सुपरपावर को ठुकराया, हमारे 'विश्व गुरु' नजर आते हैं—एपस्टीन फाइल्स का असर?" 

 दोनों देशों की तुलना: तटस्थता vs. सामरिक दबाव 

श्रीलंका छोटा देश है—उसकी तटस्थता संभव है क्योंकि कोई बड़ा क्षेत्रीय दबाव नहीं। लेकिन श्रीलंका ने दिखाया कि तटस्थता एक ताकत है। दूसरी तरफ "विश्व गुरु" का दावा करने वाले देश में अमेरिका के साथ करीबी, क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति—ये सब "सामरिक साझेदारी" के नाम पर होते हैं। लेकिन एपस्टीन फाइल्स के बाद सवाल उठे कि क्या कोई "अप्रत्यक्ष प्रभाव" है? 

- श्रीलंका: साफ "नो" 

→ तटस्थता की जीत। 

- "विश्व गुरु": अमेरिका के साथ करीबी, ईरान पर दूरी 

→ छवि पर सवाल।

 एपस्टीन फाइल्स ने राजनीतिक तूफान लाया। सरकार ने खारिज किया, लेकिन सवाल बाकी हैं। क्या इससे विदेश नीति प्रभावित हुई? श्रीलंका की घटना इस सवाल को और तेज करती है। 

सच्ची स्वतंत्रता की मिसाल श्रीलंका ने साबित किया कि "नहीं" कहना मुश्किल लेकिन संभव है। छोटा देश भी संप्रभुता बचा सकता है। "विश्व गुरु" का तमगा लगाने वाले देश के लिए यह सबक है—क्या नीति वाकई स्वतंत्र है, या दबाव/फाइल्स का असर है?

 एपस्टीन फाइल्स का साया अभी बाकी है। अगर कोई ब्लैकमेल या प्रभाव साबित हुआ, तो "विश्व गुरु" की छवि धूमिल हो सकती है। श्रीलंका की "नो" ने दुनिया को याद दिलाया—सच्ची ताकत हिम्मत में है, न कि मुजरे में। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 21,2026