-Friday World -March 4-2026
आज की दुनिया में जब युद्ध की आग भड़क रही है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान पर हमले की नीति ने न केवल मध्य पूर्व को अस्थिर किया है, बल्कि खुद अमेरिका में भी तूफान खड़ा कर दिया है। हालिया पोल्स बताते हैं कि 59% अमेरिकी जनता ट्रंप के ईरान पर हमलों का विरोध कर रही है। अमेरिकी सीनेट में ट्रंप के खिलाफ 52 मत पड़े, जबकि पक्ष में सिर्फ 47। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने साफ-साफ कहा कि "हम इराक की गलती नहीं दोहराना चाहते।" ट्रंप की अपीलों के बावजूद कोई अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिला, जबकि अमेरिकी अवाम सड़कों पर उतर आई है और मीडिया भी अब ट्रंप का साथ छोड़ रहा है। क्या ये सब ट्रंप, नेतन्याहू और एपस्टीन के अपराधियों की एक साजिश है, जो ध्यान भटकाने के लिए ईरान को मोहरा बना रहे हैं? आइए इस पूरे परिदृश्य को गहराई से समझते हैं।
अमेरिकी जनता का विरोध: पोल्स की हकीकत ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर हमलों को "आतंकवाद के खिलाफ जंग" का नाम दिया है, लेकिन अमेरिकी जनता इससे सहमत नहीं दिख रही। सीएनएन के हालिया पोल के मुताबिक, 59% अमेरिकियों ने ईरान पर अमेरिकी हमलों का विरोध किया है। रॉयटर्स/इप्सोस पोल में सिर्फ 27% ने समर्थन दिया, जबकि 43% ने असहमति जताई। अधिकांश अमेरिकी मानते हैं कि ट्रंप की नीति से लंबी सैन्य संघर्ष की संभावना बढ़ गई है, जो अमेरिका के लिए महंगा साबित हो सकता है। ये पोल्स बताते हैं कि ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति अब जनता को खोखली लग रही है।
ये विरोध सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। पूरे अमेरिका में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। वाशिंगटन डीसी से न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स तक हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं, नारे लगा रहे हैं- "नो वॉर ऑन ईरान!" ये प्रदर्शनकारी ट्रंप को "युद्ध पिपासु" बता रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि कांग्रेस युद्ध की शक्तियां सीमित करे। प्रदर्शनों में महिलाएं, छात्र और सैनिक परिवार भी शामिल हैं, जो डरते हैं कि ये युद्ध अमेरिकी सैनिकों की जान ले सकता है। हाल ही में ईरानी जवाबी हमलों में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत ने इस आग को और भड़का दिया है।
सीनेट में ट्रंप की हार: 52 बनाम 47 अमेरिकी सीनेट में ट्रंप की ईरान नीति पर वोटिंग ने उनके लिए बड़ा झटका दिया। वॉर पॉवर्स रेजोल्यूशन पर बहस में ट्रंप के खिलाफ 52 मत पड़े, जबकि पक्ष में सिर्फ 47। ये वोटिंग ट्रंप की अनधिकृत सैन्य कार्रवाई को चुनौती देती है। डेमोक्रेट सीनेटर टिम केन और चक शूमर ने कहा कि "ट्रंप ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना युद्ध छेड़ दिया है, जो असंवैधानिक है।" कुछ रिपब्लिकन सीनेटरों ने भी ट्रंप का साथ छोड़ा, क्योंकि वे मानते हैं कि ईरान पर हमला बिना स्पष्ट योजना के है।
ये वोटिंग इराक युद्ध की याद दिलाती है, जहां कांग्रेस की अनदेखी ने लंबा संघर्ष पैदा किया। अब सीनेट ट्रंप को आगे की कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने पर मजबूर कर रहा है। अगर ये रेजोल्यूशन पास हो गया, तो ट्रंप की ईरान नीति पर ब्रेक लग सकता है।
ब्रिटेन की चेतावनी: इराक की गलती नहीं दोहराएंगे ट्रंप की अपीलों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समर्थन नदारद है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने स्पष्ट कहा, "हम इराक की गलतियां नहीं दोहराना चाहते। हम ईरान पर शुरुआती हमलों में शामिल नहीं थे और अब भी आक्रामक कार्रवाई में नहीं शामिल होंगे।" स्टार्मर ने कहा कि ब्रिटेन केवल रक्षात्मक कार्रवाई में हिस्सा लेगा, जैसे मिसाइलों को रोकना। उन्होंने ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि "कानूनी आधार और सोची-समझी योजना के बिना युद्ध खतरनाक है।"
यूरोपीय संघ के नेता भी ट्रंप से दूरी बना रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि "हम न तो सूचित थे और न ही शामिल," जबकि जर्मनी ने संयम की अपील की। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हमलों की निंदा की और कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरे में डाल रहे हैं। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति ने सहयोगियों को अलग-थलग कर दिया है, और कोई बड़ा देश उनका साथ नहीं दे रहा।
मीडिया का साथ छोड़ना: ट्रंप की असलियत उजागर ट्रंप की ईरान नीति पर मीडिया भी अब साथ छोड़ रहा है। शुरुआत में कुछ मीडिया आउटलेट्स ने ट्रंप की "साहसिक कार्रवाई" की तारीफ की, लेकिन अब आलोचना तेज हो गई है। वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स ने ट्रंप के बदलते बयानों पर सवाल उठाए- पहले ईरान को "आतंक का राज्य प्रायोजक" कहा, फिर "परमाणु खतरा," और अब "शासन परिवर्तन।" मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ट्रंप की नीति में कोई स्पष्ट योजना नहीं है, और ये सिर्फ ध्यान भटकाने का तरीका है।
सीएनएन और एनबीसी जैसे चैनलों ने ट्रंप के कई इंटरव्यू लिए, लेकिन उनमें सवालों के जवाब अस्पष्ट रहे। मीडिया अब ट्रंप की घरेलू समस्याओं को जोड़ रहा है- जैसे एपस्टीन फाइल्स, जहां ट्रंप का नाम 38,000 बार आया है, और आरोप हैं कि उन्होंने लड़कियों का शोषण किया। क्या ईरान पर हमला इन घोटालों से ध्यान हटाने की कोशिश है?
एपस्टीन के अपराधी और ध्यान भटकाने की साजिश ट्रंप, नेतन्याहू और एपस्टीन के अपराधियों ने ईरान को मोहरा बनाया है, ताकि घरेलू घोटालों से ध्यान भटका सकें। फरवरी 24, 2026 को एनपीआर ने खुलासा किया कि जस्टिस डिपार्टमेंट ने एपस्टीन फाइल्स में ट्रंप से जुड़ी दर्जनों पेज छिपाई हैं। ठीक चार दिन बाद, फरवरी 28 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया। ये टाइमिंग संदिग्ध है। ट्रंप की गिरती लोकप्रियता, सुप्रीम कोर्ट का टैरिफ नीति पर फैसला, और आईसीई की विवादास्पद कार्रवाईयां- सबको दबाने के लिए युद्ध एक सुविधाजनक distraction है।
नेतन्याहू भी अपनी राजनीतिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। इजरायल में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के केस चल रहे हैं, और ईरान पर हमला उन्हें "राष्ट्रीय नायक" बनाने की कोशिश लगती है। एपस्टीन के अपराधी नेटवर्क में ट्रंप और नेतन्याहू के कनेक्शन जगजाहिर हैं। क्या ये युद्ध इन घोटालों को दफन करने का तरीका है? कई विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप की "रेगिम चेंज" नीति खुद उनकी रक्षा के लिए है।
वैश्विक प्रभाव: अस्थिरता और मानवीय संकट ट्रंप की ईरान नीति ने मध्य पूर्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ईरान ने जवाबी हमले किए, जिसमें अमेरिकी सैनिक मारे गए। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था खतरे में है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी कि ये संघर्ष लाखों नागरिकों की जान ले सकता है। गाजा, लेबनान और सीरिया में पहले से चल रहे संघर्षों में ईरान की भूमिका को देखते हुए, ये युद्ध क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा सकता है।
अमेरिकी जनता का विरोध बताता है कि लोग "फॉरएवर वॉर्स" से थक चुके हैं। इराक और अफगानिस्तान की गलतियां दोहराई जा रही हैं, जहां ट्रंप खुद आलोचना करते थे। अब वही ट्रंप उसी रास्ते पर हैं।
शांति की अपील ट्रंप की ईरान नीति न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी। 59% अमेरिकी विरोध, सीनेट की हार, ब्रिटेन की चेतावनी, कोई अंतरराष्ट्रीय समर्थन न होना, सड़कों पर प्रदर्शन और मीडिया का साथ छोड़ना- सब ट्रंप के लिए खतरे की घंटी हैं। एपस्टीन घोटाले से ध्यान भटकाने की ये साजिश ज्यादा दिन नहीं चलेगी। दुनिया को शांति चाहिए, न कि युद्ध। ट्रंप और नेतन्याहू को अपनी नीतियां बदलनी होंगी, वरना इतिहास उन्हें युद्ध अपराधी के रूप में याद रखेगा।
ये समय है सच्चाई बोलने का। ईरान पर हमला कोई समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं का जन्म है। अमेरिकी अवाम की आवाज सुनी जानी चाहिए-
"नो मोर वॉर्स!"
Sajjadali Nayani ✍
Friday World -March 4-2026