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Saturday, 14 March 2026

कु ची की सुरंगें: जब फावड़े-टोकरी ने अमेरिका की परमाणु शक्ति को धूल चटा दी वियतनाम युद्ध की वो कहानी जो आज भी अमेरिकी सेना को रातों की नींद हराम करती है – और ईरान के संदर्भ में फिर से सुर्खियों में

कु ची की सुरंगें: जब फावड़े-टोकरी ने अमेरिका की परमाणु शक्ति को धूल चटा दी वियतनाम युद्ध की वो कहानी जो आज भी अमेरिकी सेना को रातों की नींद हराम करती है – और ईरान के संदर्भ में फिर से सुर्खियों में -Friday 🌎 World March 15, 2026
साल 1966। वियतनाम युद्ध अपने चरम पर था। साइगॉन से महज 30 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में अमेरिकी सेना ने अपना सबसे मजबूत और अभेद्य ठिकाना बनाया – कु ची बेस कैंप। 

चारों तरफ कंटीले तारों की बाड़, वॉच टावर, फ्लडलाइट्स, टैंक, हेलीकॉप्टरों की पूरी बटालियन – यह एक चलता-फिरता किला था। 

अमेरिकी सेना को लगता था कि अब कोई भी वियत कांग लड़ाका उनके पास नहीं फटक सकता। लेकिन रात होते ही सब बदल जाता। 

बैरकों में अचानक धमाके, गोलियों की बौछार, चीखें और तब तक जब सैनिक हथियार उठाते, हमलावर गायब। कोई सुराग नहीं, कोई निशान नहीं। ऐसा लगता मानो वे भूतों से जंग लड़ रहे हों। 

अमेरिकी सेना ने पूरा जंगल छान मारा, लेकिन कुछ नहीं मिला। 

→ महीनों बाद एक पेट्रोलिंग टीम को झाड़ियों के नीचे एक छोटा-सा छेद मिला। जब टॉर्च की रोशनी डाली गई, तो नीचे अंधेरे में उतरती एक संकरी सुरंग दिखी। 

अमेरिका को तब तक अंदाजा भी नहीं था कि जिस जमीन पर वे खड़े हैं, उसके नीचे वियत कांग ने 250 किलोमीटर लंबी सुरंगों का जाल बिछा रखा था। 

यह कोई रातों-रात बना जाल नहीं था। 1940 के दशक से ही फ्रांसीसी बमबारी से बचने के लिए वियतनामी इन सुरंगों को खोद रहे थे।

 कु ची की लाल मिट्टी सूखने पर कंक्रीट जैसी सख्त हो जाती थी – इसलिए फावड़े और टोकरियों से खुदाई आसान थी। रात में खुदाई होती, मिट्टी को खेतों में बिखेर दिया जाता, ताकि ऊपर से उड़ते विमानों को कुछ पता न चले। 

→ ये सुरंगें तीन मंजिला थीं: 

- पहला स्तर – जमीन से 3 मीटर नीचे 

- दूसरा स्तर 

– 6 मीटर नीचे 

- तीसरा स्तर – 9 मीटर की गहराई पर 

डिजाइन इतना शानदार था कि अगर अमेरिकी बम भी गिराते, तो सिर्फ ऊपरी लेयर क्षतिग्रस्त होती, नीचे की जिंदगी और लड़ाई चलती रहती।

 सुरंगों में पूरी बस्ती बसी थी: 

- अस्पताल जहां मोमबत्ती की रोशनी में ऑपरेशन होते 

- रसोईघर जहां धुआं सैकड़ों मीटर दूर निकलता 

- हथियार कारखाने जहां अमेरिकी कारतूसों को रीसायकल कर नई गोलियां बनाई जातीं करीब 10,000 लोग इन सुरंगों में सालों तक रहे, लड़े, बच्चे पैदा किए और वहीं मर गए।

 सूरज की रोशनी के बिना भी वे लड़ते रहे और अमेरिका को छकाते रहे। 

→ अमेरिकी सेना ने इन सुरंगों को तबाह करने के लिए हर हथियार झोंक दिया:

 - हजारों टन बम गिराए - जंगल जला डाला (एजेंट ऑरेंज और नेपाम)

 - जहरीली गैस छोड़ी 

- सुरंगों में पानी भरा - प्रशिक्षित कुत्तों को भेजा लेकिन वियतनामियों ने हर हमले की काट निकाल ली: 

- जहरीली गैस को वेंटिलेशन सिस्टम ने बेअसर कर दिया 

- कुत्तों के लिए मुंहाने पर अमेरिकी साबुन, सैनिकों के कपड़े, सिगरेट के ठूंठ और काली मिर्च रगड़ दी जाती 

– कुत्ते या तो भटक जाते या सूंघ नहीं पाते। 

→ आखिरकार अमेरिका ने एक खौफनाक फैसला लिया। उन्होंने अपनी सेना के सबसे छोटे-दुबले सैनिक चुने। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और फिलीपींस से रंगरूट भर्ती किए। इन्हें नाम दिया गया – 'टनल रैट्स' (सुरंगी चूहे)। ये सैनिक सिर्फ एक टॉर्च और एक पिस्तौल लेकर 60 सेंटीमीटर चौड़ी, काली, अंधेरी सुरंगों में उतरते थे।

 टनल रैट्स के बाद के बयानों में सुरंगों का खौफनाक वर्णन मिलता है: 

- बिच्छुओं और जहर वाले सांपों के मटके दरवाजों पर टंगे 

– हमलावर के ऊपर गिर जाते - जहर वाले बांस के खूंटे 

- बारूदी सुरंगें 

- अंधेरे में सामने किसी की सांसें महसूस होतीं, लेकिन देख कुछ नहीं पाते कई टनल रैट्स कभी वापस नहीं लौटे। जो लौटे, वे जीवन भर के लिए ट्रॉमा लेकर लौटे। 

→ नौ साल की जंग, अरबों डॉलर का खर्च, दुनिया की सबसे घातक तकनीक – सब कुछ मिट्टी में मिल गया। 1975 में जब अमेरिकी सेना हारकर वियतनाम से निकली, तब भी वे कु ची की सुरंगों को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पाए। आज ये सुरंगें पर्यटन स्थल बन चुकी हैं। 

लाखों लोग दूर-दूर से आकर इनमें उतरते हैं, क्रॉल करते हैं और उस जज्बे को महसूस करते हैं जिसने महाशक्ति को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। 
 अब बात ईरान की। 
डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि जरूरत पड़ी तो ईरान में पैदल सैनिक भेज सकते हैं।

 लेकिन जानकार चेतावनी दे रहे हैं – ईरान के पास कु ची से कहीं ज्यादा उन्नत और विशाल सुरंगों का जाल है।

 ईरान ने दशकों से अपनी परमाणु और सैन्य सुविधाओं को सुरंगों में छिपाया है।

 ये सुरंगें आधुनिक हैं – वेंटिलेशन, ऑक्सीजन सप्लाई, कमांड सेंटर, मिसाइल लॉन्चर और स्टोरेज से लैस। 

वियतनाम में तो सिर्फ फावड़े-टोकरी थी, ईरान के पास आधुनिक हथियार, ड्रोन, मिसाइल और रडार-चकमा देने वाली तकनीक है। 

यदि अमेरिका पैदल सेना भेजता है, तो कु ची की यादें फिर जीवित हो जाएंगी – लेकिन इस बार दुश्मन ज्यादा संगठित, ज्यादा तकनीकी और ज्यादा तैयार होगा।

 सुरंगों में लड़ाई हमेशा से घातक रही है – और अमेरिकी सेना आज भी इस डर से कांपती है। 

→ कु ची की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है। यह एक सबक है – कि महाशक्तियां कितनी भी उन्नत क्यों न हों, जज्बा, धैर्य और सही रणनीति के सामने वे अक्सर हार जाती हैं। जब फावड़े और टोकरी ने अमेरिका को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, तो ईरान जैसा देश क्या नहीं कर सकता? 

यह कहानी याद दिलाती है कि युद्ध सिर्फ हथियारों का नहीं – जज्बे और तैयारी का होता है। और सुरंगें आज भी दुनिया की सबसे सस्ती, सबसे प्रभावी और सबसे खौफनाक हथियार हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday 🌎 World March 15, 2026