-Friday World March 29,2026
अमेरिका में 'नो किंग्स' आंदोलन की लहर: ईरान युद्ध, इमिग्रेशन और घरेलू असंतोष का मिश्रण
मार्च 2026 के अंत में अमेरिका के कई शहरों में नो किंग्स' नामक बड़े पैमाने पर ट्रंप-विरोधी प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों को आयोजकों ने देश के इतिहास की सबसे बड़ी एक दिवसीय विरोध सभाओं में से एक बताया। हजारों जगहों पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे, जिनमें मिनेसोटा की राजधानी सेंट पॉल को फ्लैगशिप इवेंट बनाया गया। वहाँ ब्रूस स्प्रिंगस्टीन जैसे सितारे, सीनेटर बर्नी सैंडर्स, इल्हान ओमार और अन्य प्रमुख नेता शामिल हुए।
प्रदर्शनों के मुख्य मुद्दे थे: ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति (जिसे 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' कहा जा रहा है), इमिग्रेशन एन्फोर्समेंट (खासकर मिनेसोटा में दो अमेरिकी नागरिकों की मौत), बढ़ती महंगाई और नागरिक अधिकारों पर कथित हमले। ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने इन प्रदर्शनों को नया आयाम दिया। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने ईरानी झंडे (इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के झंडे) लहराए, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए।
ईरानी झंडे क्यों लहराए गए? प्रदर्शनों में ईरानी झंडे दिखना कई अमेरिकियों के लिए चौंकाने वाला था। कुछ वीडियो और रिपोर्ट्स में डेट्रॉइट, वाशिंगटन डीसी और अन्य जगहों पर ईरानी झंडे के साथ फिलिस्तीनी झंडे भी दिखे। आयोजक इसे **युद्ध विरोध** और ट्रंप की विदेश नीति के खिलाफ आवाज बताते हैं।
वास्तव में, ये प्रदर्शन मुख्य रूप से ट्रंप के ईरान पर सैन्य अभियान के खिलाफ थे। फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर बड़े हमले किए थे, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेता मारे गए थे। ईरान ने जवाबी हमले किए, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावित किया और क्षेत्रीय तनाव बढ़ा।
कुछ प्रदर्शनकारी ईरान के मौजूदा शासन (इस्लामिक रिपब्लिक) के समर्थन में नहीं, बल्कि युद्ध के विस्तार और अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विरोध में थे। हालांकि, ईरानी रिजीम के झंडे लहराना कई आलोचकों ने प्रो-टेरर' या विदेशी हस्तक्षेप का प्रतीक बताया। वहीं, ईरानी-अमेरिकन समुदाय के कुछ हिस्से पहले से ही ट्रंप के ईरान विरोधी कदमों का समर्थन कर रहे थे और पुराने 'लाइन एंड सन' झंडे लहरा रहे थे।
ये प्रदर्शन दिखाते हैं कि अमेरिकी समाज में विदेश नीति कितनी विभाजित है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन ईरान को 'परमाणु खतरा' और क्षेत्रीय अस्थिरता का स्रोत बता रहा है, तो दूसरी तरफ प्रगतिशील और शांति समर्थक ईरान युद्ध को 'अवैध' और 'असंवैधानिक' करार दे रहे हैं।
बर्नी सैंडर्स का बड़ा कदम: इज़रायल को 660 मिलियन डॉलर के बम सौदे पर रोक इसी बीच, सीनेटर बर्नी सैंडर्स (स्वतंत्र, वर्मोंट) ने एक ठोस राजनीतिक कदम उठाया। मार्च 2026 के मध्य में उन्होंने तीन जॉइंट रेजोल्यूशन ऑफ डिसएप्रूवल (JRD) पेश कीं, जिनका मकसद इज़रायल को लगभग 658.8 मिलियन डॉलर (करीब 660 मिलियन डॉलर) के हथियार सौदे को रोकना था।
इस सौदे में शामिल थे:
- 5,000 संबंधित डिफेंस आर्टिकल्स (250-पाउंड बमों से जुड़े)
- 10,000 पांच सौ पाउंड के बम
- 12,000 एक हजार पाउंड के बम
कुल मिलाकर 22,000 से ज्यादा बम। सैंडर्स ने इसे ट्रंप प्रशासन द्वारा कांग्रेस की समीक्षा को बायपास करके 'इमरजेंसी' के तहत आगे बढ़ाए जाने का विरोध किया।
सैंडर्स का बयान साफ था: “इज़रायल की चरमपंथी सरकार ने गाजा, ईरान और लेबनान में जो भयानक तबाही मचाई है, उसके बीच अमेरिकी टैक्सपेयर्स का आखिरी काम 22,000 नए बम देना नहीं होना चाहिए।” उन्होंने इसे “अवैध युद्ध” का समर्थन बताया और कहा कि कांग्रेस को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए।
इस रेजोल्यूशन के सह-प्रायोजक थे सीनेटर क्रिस वैन होलेन (डेमोक्रेट, मैरीलैंड), जेफ मर्कले (डेमोक्रेट, ओरेगन) और पीटर वेल्च (डेमोक्रेट, वर्मोंट)। सैंडर्स लंबे समय से इज़रायल को दिए जाने वाले हथियारों के आलोचक रहे हैं, खासकर गाजा संघर्ष के बाद।
ध्यान दें कि वायरल खबरों में कभी-कभी इसे 1 अरब डॉलर' बताया जा रहा है, जो थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर है। वास्तविक राशि 660 मिलियन डॉलर के आसपास है, लेकिन यह भी काफी बड़ी राशि है।
पृष्ठभूमि: ट्रंप का दूसरा टर्म और मिडिल ईस्ट का तूफान ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। फरवरी 2026 में शुरू हुए अभियान में अमेरिका-इज़रायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों, परमाणु सुविधाओं और नेतृत्व पर हमले किए। ईरान ने मिसाइल हमलों से जवाब दिया, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई – खासकर तेल परिवहन वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर।
ट्रंप प्रशासन इसे **ईरान के परमाणु कार्यक्रम** और घरेलू दमन (जनवरी 2026 के ईरानी विरोध प्रदर्शनों) का जवाब बता रहा है। वहीं, विरोधी इसे अनावश्यक विस्तारवादी युद्ध मानते हैं।
इस युद्ध ने अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी हिला दिया है। महंगाई बढ़ी, गैस की कीमतें चढ़ीं और 'नो किंग्स' जैसे आंदोलन मजबूत हुए। मिनेसोटा में इमिग्रेशन एजेंट्स द्वारा दो नागरिकों की मौत ने स्थानीय गुस्से को और भड़का दिया।
- विरोधी पक्ष: युद्ध अनावश्यक है, इससे अमेरिकी सैनिकों और टैक्सपेयर्स का नुकसान हो रहा है। बर्नी सैंडर्स जैसे नेता कांग्रेस की भूमिका मजबूत करने और हथियार निर्यात पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं।
- ईरानी-अमेरिकन समुदाय: आयतुल्लाह खामेनेई के साथ
आगे क्या? बर्नी सैंडर्स की रेजोल्यूशन पर सीनेट में वोट हो सकता है, हालांकि पास होना मुश्किल है क्योंकि ट्रंप प्रशासन और रिपब्लिकन बहुमत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रहे हैं। 'नो किंग्स' प्रदर्शन जारी रह सकते हैं, खासकर अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचा।
यह घटनाक्रम अमेरिकी लोकतंत्र की जीवंतता दिखाता है – जहां विदेश नीति भी घरेलू चुनावी और सामाजिक मुद्दों से जुड़ जाती है। एक तरफ शक्ति प्रदर्शन, तो दूसरी तरफ शांति और जवाबदेही की मांग।
ईरानी झंडे और बर्नी का कदम सिर्फ दो घटनाएं नहीं, बल्कि गहरे विभाजन का प्रतीक हैं। अमेरिका में बहस अब सिर्फ 'ट्रंप vs विरोधी' नहीं, बल्कि युद्ध vs शांति, सुरक्षा vs मानवाधिकार और अमेरिकी हित vs वैश्विक जिम्मेदारी पर केंद्रित हो गई है।
जैसा कि इतिहास सिखाता है, ऐसे समय में संवाद और संतुलित नीति ही स्थायी समाधान ला सकती है। क्या कांग्रेस हथियार सौदों पर अपनी भूमिका निभाएगी? क्या प्रदर्शन युद्ध की दिशा बदल पाएंगे? समय बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 29,2026