ये वो आतंकवादी चेहरा है जो मीडिया "शांति और सुरक्षा" का प्रतीक बताता है।
पश्चिमी मीडिया और वैश्विक राजनीतिक नैरेटिव ने पिछले कई दशकों में आतंकवाद की एक बहुत ही सुविधाजनक तस्वीर गढ़ ली है। आतंकवादी का मतलब है—लंबी दाढ़ी, कुर्ता-पाजामा या कफन जैसा लिबास, हाथ में AK-47 या रॉकेट लॉन्चर, आंखों में कट्टरता और मुंह से जिहादी नारे। ये इमेज इतनी बार-बार दिखाई गई कि दुनिया भर के लोग इसे ही "आतंक" का एकमात्र चेहरा मान बैठे। लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल और खतरनाक है।
आतंकवाद के असली मास्टरमाइंड अक्सर सूट-बूट में, सफेद कमीज-टाई में, हाई-प्रोफाइल मीटिंग रूम्स में, प्रेस कॉन्फ्रेंस के स्टेज पर या व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में बैठे होते हैं। ये वो लोग हैं जो खुद कभी ट्रिगर नहीं खींचते, लेकिन छोटे-छोटे गिरोहों को जन्म देते हैं, उन्हें फंड करते हैं, हथियार सप्लाई करते हैं, खुफिया जानकारी देते हैं, ट्रेनिंग कैंप चलवाते हैं और फिर दुनिया को बताते हैं कि वो "आतंकवाद के खिलाफ सबसे मजबूत योद्धा" हैं।
ट्रंप और नेतन्याहू की जोड़ी इसका सबसे ताजा और स्पष्ट उदाहरण है। दोनों नेता बार-बार ईरान को "टेरर का सबसे बड़ा राज्य प्रायोजक" करार देते हैं। हिजबुल्लाह, हमास, हूती—इन सबको ईरान का प्रॉक्सी बताया जाता है। ईरान पर प्रतिबंध, ड्रोन अटैक, साइबर वारफेयर, रेजिम चेंज की कोशिशें—सब कुछ "आतंकवाद विरोध" के नाम पर जायज ठहराया जाता है। लेकिन सवाल ये उठता है: क्या प्रॉक्सी पॉलिटिक्स सिर्फ एक तरफ होती है?
देखिए इतिहास के कुछ पन्ने:
- अमेरिका ने अफगानिस्तान में मुजाहिदीन को सोवियत के खिलाफ हथियार और ट्रेनिंग दी—वही मुजाहिदीन बाद में अल-कायदा बने।
- इजरायल पर कई आरोप लगे कि उसने सीरिया, लेबनान में विभिन्न मिलिशिया को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया ताकि विरोधी ताकतें कमजोर हों।
- गाजा में चल रहे ऑपरेशन, जहां हजारों बच्चे-महिलाएं मारे जा रहे हैं, उसे "हमास को खत्म करने" का नाम दिया जाता है—लेकिन क्या ये बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं है जो नए-नए बदले की भावना पैदा कर रही है?
- ड्रोन हमलों में निर्दोष नागरिकों की मौत को "कोलैटरल डैमेज" कहकर खारिज कर दिया जाता है।
ये दोहरा मापदंड क्यों? क्योंकि जब सूट-बूट वाला नेता ऐसा करता है तो उसे "स्ट्रैटेजिक डिसीजन" कहते हैं। जब वही काम कोई दूसरा करता है तो "स्टेट-स्पॉन्सर्ड टेररिज्म"। मीडिया इसी नैरेटिव को बढ़ावा देता है—क्योंकि बड़े खिलाड़ी ही मीडिया के मालिक होते हैं, उनके फंडर होते हैं।
ट्रंप साहब, आपने "अमेरिका फर्स्ट" का नारा दिया, लेकिन मिडिल ईस्ट में आपकी नीतियां क्या सच में शांति ला रही हैं? नेतन्याहू जी, इजरायल की सुरक्षा के नाम पर कितनी बार "प्रॉपोर्शनेट रिस्पॉन्स" की परिभाषा बदलनी पड़ी? दोनों की हालिया मुलाकातें—हाथ मिलाना, मुस्कुराना, फोटो सेशन—ये सब "मजबूत गठबंधन" दिखाने के लिए हैं, लेकिन असल में ये वो हैंडशेक है जो दुनिया में और अधिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
आज दुनिया जाग रही है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं—क्या सूट-बूट वाला आतंकवादी कम खतरनाक है? क्या राज्य द्वारा समर्थित हिंसा को "युद्ध" कहकर जायज ठहराना सही है? क्या "डेमोक्रेसी और फ्रीडम" के नाम पर लाखों जिंदगियां तबाह करना आतंकवाद नहीं?
अगर सच में आतंकवाद को जड़ से खत्म करना है, तो पहले अपने घर को देखिए। प्रॉक्सी ग्रुप्स बनाना बंद कीजिए। दोहरे मापदंड खत्म कीजिए। निर्दोषों की मौत को "कोलैटरल" कहना बंद कीजिए। क्योंकि जब तक बड़े नेता छोटे आतंकियों को जन्म देते रहेंगे—चाहे वो फंडिंग से हो या नीतियों से—तब तक दुनिया में शांति नाम की चीज नहीं आएगी।
ये समय है सच बोलने का। ये समय है उस सूट-बूट वाले आतंक को बेनकाब करने का, जो मुस्कुराते हुए हाथ मिलाता है और पीठ पीछे से हिंसा की जड़ें बोता है।
आतंकवाद का कोई एक चेहरा नहीं—कई चेहरे हैं। और सबसे खतरनाक वो है जो आईने में दिखाई नहीं देता।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March-3-2026