वक्त का पहिया घूमता है – कल जो मजबूर था, आज उसीसे मदद मांग रहा है!
दुनिया की राजनीति में वक्त का पहिया कितनी तेजी से घूमता है, इसका सबसे बड़ा सबूत हाल के घटनाक्रम हैं। ज्यादा पुरानी बात नहीं है – फरवरी 2025 में जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की व्हाइट हाउस पहुंचे थे, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया, वह पूरी दुनिया ने देखा। ओवल ऑफिस में हुई मुलाकात चिल्ल-पौं और गाली-गलौज में बदल गई। ट्रंप ने जेलेंस्की को "बहुत असम्मानजनक" बताया, कहा कि "तुम वर्ल्ड वॉर थ्री से जुआ खेल रहे हो" और "तुम अमेरिका का अपमान कर रहे हो"। वेंस ने भी जेलेंस्की पर "असम्मान" का आरोप लगाया। मुलाकात इतनी गरम हो गई कि जेलेंस्की की बाकी विजिट कैंसल कर दी गई और कोई डील नहीं हुई।
जेलेंस्की ने तब शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा था – "कल अमेरिका को भी मदद की जरूरत पड़ सकती है।" ट्रंप ने उस वक्त इस बात को नजरअंदाज कर दिया और बदतमीजी से पेश आए। लेकिन साल भर भी नहीं बीता और वही ट्रंप अब यूक्रेन से मदद मांग रहे हैं। ईरान के साथ चल रहे तनाव और ड्रोन हमलों के बीच अमेरिका और इजराइल को यूक्रेन की ड्रोन डिफेंस टेक्नोलॉजी और इंटरसेप्टर ड्रोन्स की सख्त जरूरत पड़ गई है।
ट्रंप-नेतन्याहू की यूक्रेन से ड्रोन मदद की मांग मार्च 2026 में जब ईरान के साथ युद्ध तेज हुआ, तो अमेरिका और इजराइल ने ईरानी शाहेद ड्रोन्स से निपटने के लिए यूक्रेन की बैटल-टेस्टेड टेक्नोलॉजी पर नजरें गड़ा दीं। यूक्रेन ने सालों से रूसी हमलों में इन ड्रोन्स को मार गिराने की किफायती और प्रभावी तकनीक विकसित की है। इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने जेलेंस्की से बातचीत की गुहार लगाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू ने यूक्रेन के इंटरसेप्टर ड्रोन्स पर सहयोग की बात की। ट्रंप ने भी पहले यूक्रेन से ड्रोन टेक्नोलॉजी मांगी, लेकिन बाद में सार्वजनिक रूप से कहा – "हमें उनकी मदद की जरूरत नहीं, हम सबसे अच्छे ड्रोन्स वाले हैं।"
लेकिन जेलेंस्की ने साफ कर दिया – "पहले पैसे और टेक्नोलॉजी दो, फिर बात होगी।" उन्होंने कहा कि यूक्रेन तैयार है सहयोग करने के लिए, लेकिन इसके बदले अमेरिका से ड्रोन प्रोडक्शन डील, पैट्रियट मिसाइलें और अन्य हथियारों की जरूरत है। जेलेंस्की ने कई बार दोहराया कि "हमने अमेरिका को ऑफर किया था, लेकिन व्हाइट हाउस से अप्रूवल नहीं मिला। अब मिडिल ईस्ट में चुनौतियां हैं, तो डील रिलेवेंट हो गई है।" उन्होंने यहां तक कहा कि "रेटोरिक रेटोरिक है, मुख्य बात यह है कि हम जानते हैं क्या करना है।"
यह स्थिति आईरनिक है – जहां कल ट्रंप जेलेंस्की को "असम्मानजनक" बता रहे थे, आज वही यूक्रेन की मदद पर निर्भर हैं। यूक्रेन ने जॉर्डन, सऊदी अरब, यूएई जैसे देशों में अपने एक्सपर्ट्स और इंटरसेप्टर ड्रोन्स भेजे हैं, लेकिन अमेरिका के साथ डील अभी लंबित है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मदद की गुहार और मना करना
ईरान के साथ तनाव बढ़ने पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऑयल रूट – बंद होने की कगार पर पहुंच गया। ईरान ने कमर्शियल शिप्स पर हमले किए, माइंस बिछाए और ड्रोन-मिसाइल अटैक किए। ट्रंप ने ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया से warships भेजने की अपील की। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा – "चीन, फ्रांस, जापान, साउथ कोरिया, यूके आदि प्रभावित हैं, वे शिप्स भेजें।"
लेकिन ज्यादातर सहयोगी मना कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने साफ कहा कि warships नहीं भेजेगा। ट्रंप ने "बहुत सरप्राइज" जताया। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स, जापान ने जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया कि वे "उचित प्रयासों" में योगदान देंगे, लेकिन warships भेजने से इनकार कर दिया। जर्मनी के डिफेंस मिनिस्टर ने पूछा – "ट्रंप क्या उम्मीद करते हैं कि यूरोपीय फ्रिगेट्स से क्या होगा जो अमेरिकी नेवी नहीं कर सकती?" दक्षिण कोरिया और जापान भी सतर्क हैं। कुल मिलाकर, 22 देशों ने स्टेटमेंट पर साइन किए, लेकिन कोई बड़ा मिलिट्री सपोर्ट नहीं आया।
ट्रंप ने कहा – "हम NATO सहयोगियों की मदद नहीं चाहते, हमें कभी जरूरत नहीं थी।" लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका अकेले पड़ रहा है।
वक्त का फेर: पुल की तरह पलट सकता है यह सब देखकर याद आता है पुरानी कहावत – "वक्त बड़े से बड़े को छोटा कर देता है।" कल जेलेंस्की को ट्रंप ने अपमानित किया, आज ट्रंप और नेतन्याहू उनकी मदद मांग रहे हैं। कल यूक्रेन अकेला था, आज मिडिल ईस्ट के देश उसकी टेक्नोलॉजी के भूखे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर जहां अमेरिका मदद मांग रहा है, वहां सहयोगी पीछे हट रहे हैं।
यह घटनाक्रम सिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती। आज जो मजबूत दिखता है, कल कमजोर पड़ सकता है। जेलेंस्की का जवाब साफ है – मदद चाहिए तो पहले सम्मान दो, टेक्नोलॉजी और पैसे दो। यूक्रेन अब "मजबूर" नहीं रहा, बल्कि "मजबूत" हो गया है।
दुनिया देख रही है – वक्त का पहिया घूम रहा है। जो कल अपमान कर रहा था, आज गुहार लगा रहा है। जो कल मदद मांग रहा था, आज शर्तें रख रहा है। यह सिर्फ यूक्रेन-अमेरिका की कहानी नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक राजनीति का सबक है – "टेढ़ीयाना मत, वक्त पुल की तरह पलट सकता है।"
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 23,2026