जब विपक्ष में थीं तो 20 पैसे की बढ़ोतरी पर सड़क पर उतर आती थीं, आज कहाँ तपस्या कर रही हैं?
भारत के हर घर में आजकल एक ही चर्चा चल रही है – पेट्रोल की कीमतें। एक समय था जब पेट्रोल ₹80-90 प्रति लीटर के आसपास था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। हाल ही में प्रीमियम पेट्रोल (XP95, XP100 जैसी हाई-ऑक्टेन वैरिएंट) की कीमतों में ₹2 से ₹11 तक की तेज उछाल देखी गई है। कुछ जगहों पर XP100 पेट्रोल ₹149 से बढ़कर ₹160 प्रति लीटर तक पहुंच गया है। आम पेट्रोल की कीमतें स्थिर बताई जा रही हैं (दिल्ली में लगभग ₹94.77), लेकिन प्रीमियम फ्यूल और ग्लोबल तनाव के कारण कुल ईंधन बिल आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है।
यह उछाल सिर्फ संयोग नहीं है। मध्य पूर्व में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल परिवहन प्रभावित होने से वैश्विक कीमतें 20-26% तक उछल गईं। भारत जैसे देश जो 85% से ज्यादा क्रूड आयात करते हैं, इसकी मार सीधे पेट्रोल-डीजल पर पड़ रही है। कुछ रिपोर्ट्स तो यह तक बता रही हैं कि अगर सब कुछ बाजार के हिसाब से होता तो आम पेट्रोल ₹119 और डीजल ₹192 तक जा सकता था, लेकिन सरकार ने आम नागरिकों को सीधा झटका देने से बचने के लिए प्रीमियम वैरिएंट पर फोकस किया।
फिर भी, सवाल उठता है – आम आदमी का क्या? दोपहिया वाहन, छोटी कारें, ट्रांसपोर्ट, किराना, सब्जी, दूध – हर चीज की कीमत अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ रही है। महंगाई का यह चक्र हर परिवार की बजट को बिगाड़ रहा है।
पुरानी यादें ताजा हो रही हैं: समृति ईरानी का 'रोड पर आना'
2011-2014 के बीच जब समृति ईरानी विपक्ष में थीं, तो ईंधन और एलपीजी की छोटी-छोटी बढ़ोतरी पर वे सड़कों पर उतर आती थीं। ₹50 की एलपीजी बढ़ोतरी पर उनका ट्वीट आज भी वायरल होता है – “50 rupee hike in LPG!!!!! N they call themselves Aam Aadmi ki Sarkar. What a shame!”
₹5-20 पैसे की बढ़ोतरी पर भी वे प्रदर्शन करती थीं, रोड पर बैठती थीं, आवाज उठाती थीं। कांग्रेस सरकार को “महंगाई की सरकार” कहकर घेरती थीं। युवा कांग्रेस और अन्य विपक्षी कार्यकर्ता आज उसी समृति ईरानी के घर के बाहर प्रदर्शन करते हैं और पूछते हैं – “अब क्यों चुप हैं?”
आज जब पेट्रोल के प्रीमियम वैरिएंट में ₹2-11 की उछाल आई है, तो सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं – “समृति जी, अब कहाँ हैं? किस गुफा में तपस्या कर रही हैं?” यह व्यंग्य नहीं, बल्कि एक सच्चाई की याद दिलाता है। सत्ता में आने के बाद कई नेताओं का रुख बदल जाता है, लेकिन आम आदमी की पीड़ा वही रहती है।
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें? ग्लोबल और लोकल फैक्टर्स
1. मध्य पूर्व संकट: ईरान-इजराइल तनाव ने क्रूड ऑयल को $80-100+ प्रति बैरल तक पहुंचा दिया। भारत का क्रूड बास्केट महंगा हो रहा है।
2. रुपया कमजोर: डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य घटने से आयात महंगा पड़ रहा है।
3. टैक्स स्ट्रक्चर: पेट्रोल की कीमत में केंद्रीय और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी, VAT आदि का बड़ा हिस्सा है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जाता है, लेकिन आम आदमी को राहत नहीं मिलती।
4. प्रीमियम फ्यूल का फोकस: सरकार कह रही है कि सिर्फ 2-5% लोग प्रीमियम पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आम आदमी पर असर कम है। लेकिन अप्रत्यक्ष प्रभाव – ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ना, सामान महंगा होना – हर किसी को छू रहा है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रेगुलर पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ीं, लेकिन अंडर-रिकवरी (₹24 प्रति लीटर पेट्रोल पर) बढ़ रही है। यानी भविष्य में और दबाव बन सकता है।
आम भारतीय की पीड़ा: एक सच्ची कहानी
कल्पना कीजिए एक मध्यमवर्गीय परिवार। पिता ऑफिस जाते हैं, बेटा कॉलेज, मां सब्जी मंडी। पेट्रोल महंगा होने से ऑटो-रिक्शा, बस, टैक्सी का किराया बढ़ जाता है। दूधवाला, सब्जीवाला अपना खर्चा बढ़ा देते हैं। महीने के अंत में बजट बिगड़ जाता है। छोटे व्यापारी तो और भी परेशान – उनकी डिलीवरी वैन का खर्चा बढ़ने से प्रॉफिट मार्जिन घटता है।
एक समय था जब विपक्षी नेता कहते थे – “पेट्रोल ₹100 पार कर गया तो सरकार गिरा देंगे।” आज ₹100+ के आसपास पहुंच चुका है (मुंबई में ₹103+), लेकिन कोई सड़क पर नहीं उतर रहा। विपक्ष अब सत्ता पक्ष को घेर रहा है, और सत्ता पक्ष कह रहा है – “ग्लोबल फैक्टर है, हम कंट्रोल कर रहे हैं।”
राजनीति vs वास्तविकता
यह मुद्दा सिर्फ समृति ईरानी तक सीमित नहीं है। यह हर उस नेता की याद दिलाता है जो विपक्ष में रहते हुए महंगाई पर रोता है और सत्ता में आकर चुप हो जाता है। लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है। जनता पूछ रही है:
- 20 पैसे पर सड़क पर उतरने वाली आवाज अब क्यों गायब है?
- क्या सत्ता में आने के बाद आम आदमी की पीड़ा भूल जाती है?
- क्या प्रीमियम फ्यूल पर बढ़ोतरी “कोई बड़ी बात नहीं” है, जबकि हर चीज की कीमत बढ़ रही है?
सरकार का दावा है कि महंगाई कंट्रोल में है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी अलग कहानी बयां कर रही है। एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हो चुका है। कई जगहों पर व्यावसायिक सिलेंडर में ₹195+ की बढ़ोतरी की खबरें हैं।
क्या समाधान हो सकता है?
- लंबी अवधि की योजना: घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाना, रिन्यूएबल एनर्जी (इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर) पर जोर।
- टैक्स रेशनलाइजेशन: पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करके आम आदमी को राहत।
- सब्सिडी टारगेटेड: गरीबों और जरूरतमंदों के लिए सीधा लाभ हस्तांतरण।
- वैश्विक कूटनीति: मध्य पूर्व में स्थिरता के लिए भारत की भूमिका बढ़ाना।
लेकिन फिलहाल आम नागरिक को इंतजार है – कीमतें कब स्थिर होंगी?
याद रखिए, जनता सबसे बड़ी ताकत है
पेट्रोल के भाव में यह उछाल सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह हर उस परिवार की कहानी है जो महंगाई से जूझ रहा है। समृति ईरानी या कोई भी नेता हो, जब वे विपक्ष में थे तो सड़क पर उतरते थे। आज सत्ता पक्ष में हैं तो चुप हैं। यह राजनीति का चक्र है, लेकिन आम भारतीय इस चक्र से बाहर निकलना चाहता है।
आज हर भारतीय को समृति ईरानी की याद इसलिए आ रही है क्योंकि वे पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं – सड़क पर बैठी हुई, नारेबाजी करती हुई। आज उसी ऊर्जा की जरूरत है – चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। महंगाई किसी की नहीं सुनती, वह हर घर में घुस जाती है।
जनता अब जाग चुकी है। सोशल मीडिया पर चर्चाएं तेज हैं। अगले चुनावों में यह मुद्दा जरूर उठेगा। तब तक, हर नागरिक को अपनी आवाज उठानी चाहिए – शांतिपूर्ण तरीके से, लेकिन मजबूती से। क्योंकि आखिरकार, लोकतंत्र में असली ताकत जनता के हाथ में है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 3,2026