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Friday, 10 April 2026

साउथ कोरिया का ईरान मिशन: अमेरिका की सुरक्षा छत्र के तले भी हार्मुज स्ट्रेट में फंसी अपनी नौकाओं को निकालने के लिए सियासी बाजी!

साउथ कोरिया का ईरान मिशन: अमेरिका की सुरक्षा छत्र के तले भी हार्मुज स्ट्रेट में फंसी अपनी नौकाओं को निकालने के लिए सियासी बाजी!
-Friday World-April 10,2026
दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक **स्ट्रेट ऑफ हार्मुज** (Strait of Hormuz) इन दिनों वैश्विक कूटनीति का नया केंद्र बन गया है। अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के सीजफायर (ceasefire) के बावजूद, यहां यातायात पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है। इसी बीच दक्षिण कोरिया (South Korea) ने एक बड़ा कदम उठाया है – वह ईरान को एक विशेष दूत (special envoy) भेज रहा है। मकसद साफ है: अपनी 26 नौकाओं और 173 क्रू सदस्यों को सुरक्षित निकालना, समुद्री यातायात बहाल करना और संभवतः पारगमन शुल्क (transit fees या royalty) जैसे मुद्दों पर बातचीत करना।

यह घटनाक्रम इसलिए दिलचस्प है क्योंकि दक्षिण कोरिया अमेरिका का करीबी सैन्य सहयोगी है। उसकी सुरक्षा का बड़ा जिम्मा अमेरिकी सेना के पास है, फिर भी वह ईरान से सीधे डिप्लोमेसी कर रहा है। क्या यह pragmatism है या मजबूरी? आइए विस्तार से समझते हैं।

हार्मुज स्ट्रेट का महत्व: दुनिया की धमनी
स्ट्रेट ऑफ हार्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। दुनिया का लगभग **20-25% समुद्री तेल** इसी संकीर्ण जलडमरूमध्य से गुजरता है। सऊदी अरब, ईरान, इराक, UAE, कुवैत जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का तेल यहीं से एशिया, यूरोप और अमेरिका पहुंचता है।

दक्षिण कोरिया जैसे ऊर्जा-निर्भर देशों के लिए यह मार्ग जीवनरेखा है। कोरिया का ज्यादातर कच्चा तेल मध्य पूर्व से आता है। अगर यह रास्ता बंद रहता है तो तेल की कीमतें आसमान छूती हैं, शिपिंग कॉस्ट बढ़ती है, इंडस्ट्री प्रभावित होती है और महंगाई का खतरा मंडराता है। फरवरी 2026 से शुरू हुए अमेरिका-ईरान तनाव के बाद ईरान ने स्ट्रेट को प्रभावी रूप से ब्लॉक कर दिया था, जिससे कई जहाज फंस गए।

दक्षिण कोरिया की स्थिति और गंभीर है – उसके 26 जहाज (Korean-related vessels) और 173 क्रू सदस्य हार्मुज में फंसे हुए हैं। अन्य देशों (जापान, फ्रांस, ओमान) के कुछ जहाज निकल पाए, लेकिन कोरियाई जहाज अभी भी अटके हैं। इससे सप्लाई चेन बाधित हुई और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा।

सीजफायर के बाद भी चुनौतियां
अप्रैल 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह का सीजफायर घोषित किया। दक्षिण कोरिया ने इसका स्वागत किया और कहा कि इससे हार्मुज में नेविगेशन बहाल होने का मौका मिला है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पार्क इल ने कहा, “हम सभी जहाजों, खासकर अपने जहाजों के लिए सुरक्षित और तेज यातायात चाहते हैं।”

लेकिन सीजफायर के बावजूद स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई। ईरान ने साफ कहा कि जहाजों को पास होने के लिए **पूर्व समन्वय (prior coordination)** जरूरी है। ईरान के राजदूत ने यहां तक कहा कि अमेरिका से व्यापार करने वाले जहाजों पर पाबंदी लग सकती है। साथ ही, ईरान **ट्रांजिट फीस** या रॉयल्टी की मांग कर रहा है – यानी जहाजों से पारगमन शुल्क वसूलना।

दक्षिण कोरिया ने पहले फीस देने की खबरों का खंडन किया था, लेकिन अब विशेष दूत भेजकर सीधे बातचीत का रास्ता अपनाया जा रहा है। विदेश मंत्री चो ह्यून ने ईरानी समकक्ष अब्बास अराघची से फोन पर बात की और विशेष दूत भेजने का फैसला किया। यह दूत मध्य पूर्व की स्थिति, द्विपक्षीय मुद्दों और समुद्री सुरक्षा पर चर्चा करेगा।

 अमेरिका की सुरक्षा छत्र और कोरिया की मजबूरी
दक्षिण कोरिया अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है। कोरियाई प्रायद्वीप पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति (US Forces Korea) उत्तर कोरिया के खतरे से सुरक्षा प्रदान करती है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सुरक्षा समझौते मजबूत हुए हैं – wartime operational control ट्रांसफर, न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन्स आदि।

फिर भी, हार्मुज संकट में कोरिया अमेरिका की पूरी तरह पर निर्भर नहीं रह सका। अमेरिका ने सहयोगियों से हार्मुज में नौसेना सहायता मांगी थी, लेकिन कोरिया ने सावधानी बरती। ट्रंप प्रशासन ने सहयोगियों से “Hormuz coalition” बनाने की अपील की, लेकिन कोरिया ने सीधे सैन्य योगदान से परहेज किया।

कारण स्पष्ट हैं:
- ऊर्जा सुरक्षा: कोरिया का तेल आयात हार्मुज पर निर्भर है। लंबा ब्लॉकेज अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है।
- डिप्लोमेसी का संतुलन: अमेरिका से दोस्ती रखते हुए ईरान से भी संबंध खराब नहीं करने की कोशिश।
- आर्थिक दबाव: फंसे जहाजों को निकालना तत्काल जरूरी है। शिपिंग लागत पहले ही बढ़ चुकी है।

अब विशेष दूत भेजना इसी संतुलन की कोशिश है। दूत चung Byung-ha (पूर्व कुवैत राजदूत, मध्य पूर्व विशेषज्ञ) ईरान जाएंगे और सुरक्षित निकासी, नेविगेशन की स्वतंत्रता और संभवतः फीस या समन्वय के मुद्दे पर बात करेंगे।

वैश्विक प्रभाव और भविष्य की चुनौतियां
यह घटना दिखाती है कि भू-राजनीति कितनी जटिल हो गई है। एक क्षेत्रीय संघर्ष (अमेरिका-ईरान) पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। दक्षिण कोरिया जैसा देश, जो अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भर है, फिर भी स्वतंत्र कूटनीति चला रहा है – यह “strategic autonomy” की मिसाल है।

भारत के लिए भी यह सबक है। हम भी मध्य पूर्व से तेल आयात करते हैं और हार्मुज हमारी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे संकटों में विविध साझेदारियां (US, Gulf countries, Iran आदि) बनाए रखना जरूरी है।

ईरान की फीस मांग अंतरराष्ट्रीय कानून से टकरा सकती है। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग माना जाता है, जहां फ्री पैसेज का सिद्धांत लागू होता है। लेकिन ईरान इसे अपनी संप्रभुता का मुद्दा बताता है। अगर फीस की व्यवस्था बनी तो वैश्विक व्यापार की लागत बढ़ेगी और छोटे देशों पर बोझ पड़ेगा।

दक्षिण कोरिया का यह मिशन सफल हो या नहीं, लेकिन यह दिखाता है कि आधुनिक दुनिया में कोई देश पूरी तरह एक पक्ष पर निर्भर नहीं रह सकता। अमेरिका की सुरक्षा छत्र में रहते हुए भी कोरिया ईरान से बात कर रहा है – यह कूटनीति की नई सच्चाई है।

दक्षिण कोरिया का ईरान दूत मिशन सिर्फ 26 जहाजों की निकासी नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और बहुपक्षीय कूटनीति का संकेत है। सीजफायर के बावजूद हार्मुज में अनिश्चितता बनी हुई है। अगर बातचीत सफल हुई तो जहाज निकलेंगे और सप्लाई चेन सुधरेगी। असफल हुई तो वैश्विक तेल बाजार में नई अस्थिरता आ सकती है।

दुनिया देख रही है कि छोटे-बड़े देश कैसे इस जटिल खेल में अपनी जगह बना रहे हैं। दक्षिण कोरिया का यह कदम pragmatism का बेहतरीन उदाहरण है – सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा, लेकिन संकट के समय अपनी डिप्लोमेसी खुद चलाना।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 10,2026