इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई लंबी शांति वार्ता 21 घंटे चली लेकिन अंत में नाकाम हो गई। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि ईरान ने उनके प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए, जबकि ईरान अमेरिका की "अत्यधिक मांगों" को जिम्मेदार ठहरा रहा है। ठीक इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना पहला बड़ा बयान दिया और सीधे चीन को निशाने पर लिया। ट्रंप ने चेतावनी दी – अगर चीन ईरान को हवाई सुरक्षा प्रणालियां (एयर डिफेंस सिस्टम) सप्लाई करता है तो चीन को "बड़ी मुश्किलें" झेलनी पड़ेंगी।
यह घटनाक्रम मध्य पूर्व की नाजुक स्थिति को और जटिल बना रहा है। दुनिया के 20% तेल परिवहन वाले हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान का नियंत्रण अभी भी विवादास्पद है। एक तरफ युद्धविराम की कोशिशें जारी हैं, दूसरी तरफ हथियारों की नई आपूर्ति की खबरें तनाव बढ़ा रही हैं।
वार्ता क्यों फेल हुई? दोनों पक्षों की दलीलें
पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में हुई इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ चर्चा की। अमेरिका के मुख्य मुद्दे थे – ईरान का परमाणु कार्यक्रम रोकना, हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलना और क्षेत्रीय सुरक्षा। लेकिन ईरान ने इन मांगों को "अनुचित" बताया। ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका ने अतिरिक्त मुद्दे उठाकर वार्ता को जटिल बनाया।
ट्रंप ने पहले ही चेतावनी दे रखी थी कि अगर वार्ता नाकाम रही तो ईरान पर फिर हमले हो सकते हैं। वार्ता के बाद ट्रंप ने कहा कि अमेरिका युद्ध में "पहले ही जीत चुका है" और अब ईरान को नुकसान हो रहा है। वहीं ईरान ने अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वह अपनी संप्रभुता और हॉर्मुज पर अधिकारों से समझौता नहीं करेगा।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की अहमियत समझना जरूरी है। विश्व का लगभग एक पांचवां तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने युद्ध के दौरान इसे प्रभावित किया था, जिससे वैश्विक तेल कीमतें बढ़ीं और कई देश चिंतित हो गए। ईरान ने साफ कहा है कि वह इस रास्ते को बिना शर्त नहीं खोलेगा।
ट्रंप का चीन पर हमला: हवाई सुरक्षा प्रणाली की खबर क्यों आई?
वार्ता नाकाम होने के कुछ घंटों बाद ही ट्रंप ने चीन को कड़ी चेतावनी दी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हवाले से CNN ने रिपोर्ट दी कि चीन अगले कुछ हफ्तों में ईरान को नई हवाई सुरक्षा प्रणालियां (खासकर MANPADS – कंधे पर रखकर फायर किए जाने वाले एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम) सप्लाई करने की तैयारी कर रहा है। ये सिस्टम कम उड़ान वाले विमानों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
ट्रंप ने सफेद घर से निकलते हुए संवाददाताओं से कहा, "अगर चीन ऐसा करता है तो चीन को बड़ी समस्या हो जाएगी।" उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ऐसी कोई कार्रवाई चीन के लिए बहुत नुकसानदायक साबित होगी। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन तीसरे देशों के रास्ते ये हथियार भेज सकता है ताकि स्रोत छिपा रहे।
ट्रंप की यह चेतावनी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका-ईरान संघर्ष में ईरान की हवाई रक्षा पहले ही काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी है। अगर चीन नई प्रणालियां देता है तो ईरान अपनी रक्षा मजबूत कर सकता है, जो अमेरिका और इजराइल दोनों के लिए चिंता का विषय है। ट्रंप ने पहले भी कहा था कि ईरान की नौसेना, एंटी-एयरक्राफ्ट और एयर फोर्स "समाप्त" हो चुकी है, लेकिन MANPADS जैसी पोर्टेबल सिस्टम फिर से खतरा पैदा कर सकती हैं।
ईरान की ताकत: क्या एकाकी ईरान ने अमेरिका-इजराइल को परेशान किया?
कई विश्लेषक और ईरानी समर्थक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि युद्ध के दौरान ईरान ने अमेरिका और इजराइल को काफी परेशान किया। ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों से जवाबी कार्रवाई की। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान ने 40 दिनों तक संघर्ष को लंबा खींचा, जबकि अमेरिका ने जल्दी युद्धविराम की मांग की। ईरानी पक्ष का कहना है कि उनका देश "दिवाली के फटाकों और उड़ते रॉकेटों" जितनी साधारण तैयारी से भी मुकाबला करने में सक्षम रहा।
हालांकि, अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान की सैन्य क्षमताओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने अपने सैन्य उद्देश्यों को पार कर लिया है। वास्तविकता यह है कि दोनों पक्षों ने काफी नुकसान उठाया है, लेकिन कोई भी पूर्ण विजय का दावा नहीं कर पा रहा। ईरान ने हॉर्मुज को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
भविष्य की चुनौतियां: क्या चीन-अमेरिका टकराव बढ़ेगा?
ट्रंप की चीन को दी गई धमकी सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। यह बड़े भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा लगती है। अमेरिका और चीन पहले से ही व्यापार, ताइवान और प्रौद्योगिकी पर तनाव में हैं। अगर चीन ईरान को हथियार देता है तो ट्रंप टैरिफ या अन्य आर्थिक दबाव बढ़ा सकते हैं। कुछ रिपोर्ट्स में 50% तक टैरिफ की बात भी कही गई है।
दुनिया के कई देश इस स्थिति से चिंतित हैं। यूरोप, भारत, चीन और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं हॉर्मुज पर निर्भर हैं। अगर तनाव बढ़ा तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। अब सवाल यह है कि क्या आगे कोई नई वार्ता होगी या फिर सैन्य कार्रवाई का दौर शुरू होगा?
ईरान ने कहा है कि वह अपनी शर्तों पर बातचीत करेगा। अमेरिका "परमाणु कार्यक्रम" और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सख्त है। बीच में चीन का कदम अगर सही साबित हुआ तो मध्य पूर्व में नया समीकरण बन सकता है – ईरान-चीन गठबंधन मजबूत हो सकता है, जो अमेरिका के लिए नई चुनौती होगा।
निष्कर्ष: शांति की राह अभी लंबी
शांति वार्ता का नाकाम होना दुखद है, लेकिन यह पहला प्रयास नहीं था और शायद आखिरी भी नहीं। ट्रंप की चीन पर चेतावनी दिखाती है कि संघर्ष अब द्विपक्षीय नहीं रह गया है। यह अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता का नया अध्याय बन सकता है। हॉर्मुज खुलना, परमाणु मुद्दा और हथियार आपूर्ति – ये सभी मुद्दे एक साथ सुलझाने होंगे।
विश्व समुदाय को अब सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि छोटी चिंगारी बड़े युद्ध में न बदल जाए। फिलहाल स्थिति नाजुक है। ट्रंप की "बड़ी समस्या" वाली चेतावनी और ईरान की दृढ़ता दोनों पक्षों को सतर्क रहने का संदेश दे रही है। उम्मीद है कि कूटनीति अंततः जीत हासिल करेगी और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित होगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 12,2026