-Friday World-April 18,2026
रायगड़ा (ओडिशा), 18 अप्रैल 2026 — पूर्वी घाट की शांत पहाड़ियों में एक बार फिर गूंज उठी है आदिवासियों की आवाज। ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों की सिजिमाली (तिजमाली) पहाड़ियां अब सिर्फ बॉक्साइट का भंडार नहीं, बल्कि विकास बनाम आदिवासी अधिकार और पर्यावरण संरक्षण की नई लड़ाई का केंद्र बन गई हैं। तीन साल से लगातार शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासी समुदाय के लिए 7 अप्रैल 2026 का दिन भारी पड़ गया। सड़क निर्माण को लेकर पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें करीब 70 लोग घायल हुए — जिनमें 40 से ज्यादा पुलिसकर्मी शामिल थे।
आदिवासी महिलाएं और पुरुष पारंपरिक हथियारों — कुल्हाड़ी, तीर-कमान और पत्थरों — से लैस होकर सड़क पर डटे रहे। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे, जबकि ग्रामीणों ने पत्थरबाजी और हमला करने का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, कुछ गंभीर पुलिस अधिकारियों को विशाखापट्टनम रेफर किया गया। यह घटना न सिर्फ रायगड़ा जिले में तनाव बढ़ा रही है, बल्कि पूरे देश में नियमगिरि जैसे पुराने संघर्ष की याद दिला रही है।
सिजिमाली पहाड़ियां: आस्था, आजीविका और पर्यावरण का आधार
सिजिमाली पहाड़ियां 1,223 मीटर ऊंची हैं और पूर्वी घाट पर्वतमाला का हिस्सा हैं। यहां आदिवासी समुदाय — मुख्य रूप से कोंध, परजा और अन्य जनजातियां — सदियों से रह रही हैं। पहाड़ उनके लिए सिर्फ भूमि नहीं, बल्कि मां माटी माली (मां, मिट्टी, पहाड़) का प्रतीक है। यहां से निकलने वाली सैकड़ों छोटी नदियां और झरने आसपास के गांवों को पानी देते हैं। यह क्षेत्र हाथियों का महत्वपूर्ण कॉरिडोर भी है और जैव विविधता से भरपूर है।
आदिवासी कहते हैं — “यह पहाड़ हमारी पूजा का स्थान है। यहां से बॉक्साइट निकालना हमारी संस्कृति, जल स्रोतों और कृषि को नष्ट कर देगा।” मा माटी माली सुरक्षा मंच के बैनर तले वे पिछले तीन साल से लगातार पहाड़ पर धरना दे रहे हैं। उनका आरोप है कि ग्राम सभाओं में सहमति जताने के नाम पर फर्जीवाड़ा हुआ है। PESA एक्ट 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत अनुसूचित क्षेत्र में खनन के लिए वास्तविक ग्राम सभा की सहमति जरूरी है, लेकिन स्थानीय लोग दावा करते हैं कि कई गांवों में सहमति बिना चर्चा के या जबरन ली गई।
वेदांता का सिजिमाली बॉक्साइट प्रोजेक्ट: क्या है पूरा प्लान?
फरवरी-मार्च 2023 में ओडिशा सरकार ने वेदांता लिमिटेड को सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक का प्रीफर्ड बिडर घोषित किया। प्रोजेक्ट की मुख्य बातें:
- क्षेत्रफल: लगभग 1,549 हेक्टेयर (करीब 1,560 हेक्टेयर), जिसमें से लगभग 700 हेक्टेयर वन भूमि शामिल।
- रिजर्व: अनुमानित 311 मिलियन टन (31.1 करोड़ टन) हाई-ग्रेड बॉक्साइट।
- उत्पादन क्षमता: प्रति वर्ष 9 मिलियन टन (90 लाख टन) बॉक्साइट।
- उद्देश्य: लांजीगढ़ स्थित वेदांता की एल्युमिना रिफाइनरी को कच्चा माल मुहैया कराना। कंपनी इसे अपनी पहली कैप्टिव बॉक्साइट माइन के रूप में देख रही है।
खनन 50 साल की लीज पर प्रस्तावित है। ओपन कास्ट माइनिंग का तरीका अपनाया जाएगा, जिसमें ड्रिलिंग, ब्लास्टिंग और क्रशिंग शामिल है। कंपनी का दावा है कि इससे स्थानीय रोजगार बढ़ेगा और क्षेत्र का विकास होगा।
दिसंबर 2025 में प्रोजेक्ट को स्टेज-1 फॉरेस्ट क्लियरेंस (इन-प्रिंसिपल) मिल गई, लेकिन स्टेज-2 अभी लंबित है। प्रस्तावित 3 किलोमीटर लंबी एप्रोच रोड (शगाबाड़ी गांव से) के लिए भी फॉरेस्ट क्लियरेंस की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। रोड के लिए 11.3 हेक्टेयर भूमि की जरूरत है, जिसमें 4.9 हेक्टेयर वन क्षेत्र शामिल है।
7 अप्रैल 2026 की हिंसक झड़प: क्या हुआ?
शगाबाड़ी गांव के पास 3 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के काम को लेकर तनाव बढ़ गया। आदिवासी इसे खनन का पहला कदम मानते हैं। पुलिस ने सड़क निर्माण की सुरक्षा के लिए तैनाती की, लेकिन ग्रामीणों ने विरोध किया।
- पुलिस का दावा: ग्रामीणों ने पत्थर, तलवार, कुल्हाड़ी और तेज हथियारों से हमला किया। 40 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए।
- ग्रामीणों का आरोप: पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज किया, गांव में बिजली काटी और घरों में घुसकर मारपीट की। एक गाय की मौत भी आंसू गैस से हुई। कई महिलाएं और बच्चे प्रभावित हुए।
झड़प के बाद रायगड़ा कलेक्टर और प्रशासन ने स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन आदिवासी अब और मजबूत होकर कह रहे हैं — “सड़क नहीं बनेगी, खनन नहीं होगा।” कई राजनीतिक दल, मानवाधिकार संगठन और कार्यकर्ता पुलिस कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं। कुछ ने इसे “कॉर्पोरेट के लिए राज्य की दमनकारी नीति” बताया।
व्यापक बहस: विकास किसके लिए?
यह संघर्ष नया नहीं है। ओडिशा में बॉक्साइट खनन के कई प्रोजेक्ट्स पहले भी विवादों में रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि:
- पर्यावरणीय प्रभाव: खनन से जल स्रोत सूख सकते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटेगी, वन क्षेत्र नष्ट होंगे और वन्यजीव प्रभावित होंगे।
- सामाजिक प्रभाव: हजारों आदिवासियों की आजीविका (खेती, वन उपज, पशुपालन) खतरे में पड़ सकती है। विस्थापन और सांस्कृतिक क्षति की आशंका है।
- कानूनी पहलू: अनुसूचित क्षेत्र में PESA और FRA का सख्त पालन जरूरी है। कई संगठन फर्जी ग्राम सभा और सहमति के आरोप लगा रहे हैं।
सरकार और कंपनी का पक्ष है कि खनन से राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार मिलेगा और एल्युमिनियम उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। ओडिशा भारत का बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है।
लेकिन आदिवासी पूछ रहे हैं — “विकास अगर हमारी जमीन, जंगल और संस्कृति छीन ले, तो वह विकास किसका?” वे मांग कर रहे हैं कि प्रोजेक्ट रद्द किया जाए, फर्जी सहमति की जांच हो और वन अधिकारों का सम्मान किया जाए।
आगे क्या?
वर्तमान में क्षेत्र में तनाव बना हुआ है। प्रशासन ने प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं। विरोध प्रदर्शन भुवनेश्वर समेत अन्य जगहों पर भी हो रहे हैं। कांग्रेस, वामपंथी दल और नागरिक समाज ने सरकार पर दबाव बनाया है।
सिजिमाली का संघर्ष सिर्फ एक पहाड़ी का नहीं, बल्कि पूरे देश के आदिवासी इलाकों में चल रही लड़ाई का प्रतीक बन गया है — जहां प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और स्थानीय समुदायों के अधिकार अक्सर टकराते हैं।
क्या सरकार और कंपनी आदिवासियों की चिंताओं को गंभीरता से लेगी? क्या कानूनी प्रक्रियाओं का पूरा पालन होगा? या फिर दमनकारी रवैया जारी रहेगा? सिजिमाली पहाड़ियां अब इस सवाल का जवाब मांग रही हैं।
Sajjadali Nayani ✍
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