जब दुनिया धर्म के नाम पर हिंसा देख रही है, तब ईरान ने दिखाया — शत्रु देश से लड़ाई हो, लेकिन अपने घर में रहने वाले यहूदियों, ईसाइयों और हिंदुओं को कोई सताया नहीं!
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हालिया तनाव और संघर्ष ने पूरे विश्व को प्रभावित किया। मिसाइलें चलीं, हमले हुए, लेकिन इस पूरे समय में ईरान के अंदर रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ एक अनोखा व्यवहार देखने को मिला। न किसी यहूदी को “इजरायल का एजेंट” कहकर पीटा गया, न किसी ईसाई को जबरन “अल्लाह हू अकबर” कहलवाया गया, और न ही किसी हिंदू को “भारत वापस जाओ” कहकर देश निकाला दिया गया।
यह तथ्य आज के उन्मादी दुनिया में सोचने लायक है।
ईरान में अल्पसंख्यकों की वास्तविक संख्या
ईरान में यहूदियों की आबादी वर्तमान में लगभग ८,५०० से १५,००० के बीच बताई जाती है। १९७९ की इस्लामिक क्रांति से पहले यह संख्या ८०००से 10000 तक थी, लेकिन आज भी मध्य पूर्व में इजरायल के बाहर यहूदियों की सबसे बड़ी संख्या ईरान में ही है। ईसाइयों की आबादी आधिकारिक आंकड़ों में ११७,००० से ३००,००० तक है, जबकि अनौपचारिक अनुमान लाखों तक जाते हैं — ज्यादातर आर्मेनियन, असीरियन और नए कन्वर्ट्स। हिंदुओं की संख्या लगभग ३९,००० (२०१५ के आंकड़े) है, जो मुख्य रूप से भारतीय व्यापारियों और प्रवासियों की है।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि ईरान एक बहुलतावादी समाज रहा है, भले ही संवैधानिक रूप से केवल यहूदियों, ईसाइयों और जोरोस्ट्रियन को ही आधिकारिक अल्पसंख्यक माना जाता है।
युद्ध के दौरान क्या हुआ — या नहीं हुआ?
फरवरी-मार्च-अप्रैल २०२६ के दौरान जब अमेरिका और इजरायल के हमलों की खबरें आईं, तब कई लोग उम्मीद कर रहे थे कि ईरान में रहने वाले यहूदियों पर हमले होंगे। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली।
ईरान सरकार और आम ईरानी लोगों ने इन अल्पसंख्यकों को निशाना नहीं बनाया। कोई मोब लिंचिंग नहीं हुई। कोई जबरन धार्मिक नारा लगवाने की घटना सामने नहीं आई। न किसी से देशभक्ति का “सबूत” मांगा गया, न किसी को गद्दार कहा गया। यहूदियों से इजरायल जाने को नहीं कहा गया, ईसाइयों से अमेरिका और हिंदुओं से भारत लौटने को नहीं कहा गया।
इसके उलट, जब तेहरान में स्थित रफी निया सिनेगॉग (Rafi Nia Synagogue) इजरायली हमले में पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, तो ईरानी लोग खुद वहां पहुंचे। उन्होंने यहूदियों की मदद की और सिनेगॉग को फिर से बनाने का वादा किया। किसी ने यह नहीं कहा कि “इसके नीचे हमारे इमाम की कब्र है” या कोई धार्मिक दावा किया। यह घटना दिखाती है कि युद्ध के बावजूद ईरानी समाज में कुछ हद तक सहिष्णुता बरकरार रही।
हिंदू मंदिरों का सम्मान
ईरान में हिंदू मंदिर भी मौजूद हैं। बंदर अब्बास में विष्णु मंदिर १८९२ में भारतीय व्यापारियों द्वारा बनवाया गया था। यह आज भी ऐतिहासिक स्मारक के रूप में सुरक्षित है और किसी ईरानी ने कभी इसके ऊपर अपना धार्मिक झंडा नहीं लहराया, न डीजे बजाया, न कोई जबरन धार्मिक गीत गवाया। तेहरान में भी श्री वेंकटेश्वर मंदिर जैसी जगहें हैं, जो भारतीय समुदाय की उपस्थिति की याद दिलाती हैं।
ये मंदिर ईरान-भारत के प्राचीन सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों की जीती-जागती मिसाल हैं। युद्ध के दिनों में भी इन पर कोई अतिक्रमण या अपमान की खबर नहीं आई।
यह तुलना क्यों जरूरी है?
आज विश्व में कई जगहों पर छोटी-छोटी बातों पर भी धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता है। कोई युद्ध या तनाव हो तो सबसे पहले अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले होते हैं — लिंचिंग, जबरन नारे लगवाना, “देश छोड़ो” कहना, धार्मिक स्थलों पर कब्जा या अपमान। लेकिन ईरान के इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
ईरानी लोगों ने दिखाया कि शत्रु देश से लड़ाई अलग बात है और अपने देश में शांति से रह रहे नागरिकों के साथ व्यवहार अलग। उन्होंने किसी से अपना मजहबी गीत गला दबाकर नहीं गवाया। न किसी को “देशभक्त” साबित करने के लिए लाठी-डंडे का सहारा लिया।
यह व्यवहार उन देशों के लिए एक सबक है जहां छोटी-छोटी घटनाओं पर भी अल्पसंख्यक समुदायों को आतंकित किया जाता है।
वास्तविकता के दोनों पहलू
ईरान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पूरी तरह идеальная नहीं है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में ईसाई कन्वर्ट्स, बहाई समुदाय और कुछ अन्य अल्पसंख्यकों पर दबाव, गिरफ्तारियां और भेदभाव की खबरें आती रहती हैं। यहूदियों को भी कभी-कभी इजरायल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इस बार के युद्ध में आम ईरानियों और स्थानीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के साथ जो सहिष्णु व्यवहार देखा गया, वह सराहनीय है।
रफी निया सिनेगॉग के मामले में ईरानी समाज का सहयोग इस बात को रेखांकित करता है कि आम लोग अक्सर सरकारी नीतियों से अलग सोच रखते हैं।
संदेश: शांति और सहिष्णुता की राह
ईरान की इस मिसाल से सीख मिलती है कि युद्ध की स्थिति में भी मानवता और सह-अस्तित्व को बनाए रखा जा सकता है। जब पूरी दुनिया धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर विभाजन की बात कर रही हो, तब ईरान ने दिखाया कि अपने देश के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और सम्मान दिया जा सकता है।
भारत और ईरान के बीच प्राचीन संबंध हैं। दोनों देशों के लोग एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान करते आए हैं। बंदर अब्बास का विष्णु मंदिर इसी सम्मान का प्रतीक है। आज जब होर्मुज स्ट्रेट खुल रहा है और व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं, तब ऐसे उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची दोस्ती और सहिष्णुता ही लंबे समय तक टिकती है।
ईरान के लोगों ने साबित किया — लड़ाई मैदान में हो, लेकिन दिलों में नफरत नहीं होनी चाहिए। किसी को जबरन अपना धर्म या देशभक्ति साबित करने को नहीं कहा जाना चाहिए।
यह कहानी हमें सिखाती है कि असली ताकत हिंसा में नहीं, बल्कि सहिष्णुता और भाईचारे में है। जब दुनिया नफरत फैला रही हो, तब ईरान जैसे उदाहरण हमें उम्मीद देते हैं कि शांति अभी भी संभव है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 8,2026