-Friday World-April 25,2026
अबू धाबी, 25 अप्रैल 2026 – संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से एक चौंकाने वाला और अहम घटनाक्रम सामने आया है। प्रमुख राजनीतिक टिप्पणीकार, पश्चिम एशिया विशेषज्ञ और यूएई यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर **डॉ. अब्दुल खालिक अब्दुल्ला** (Abdulkhaleq Abdulla) ने साफ कहा है कि यूएई को अब अपनी रक्षा के लिए अमेरिका की जरूरत नहीं है। उन्होंने ईरानी हमलों के दौरान यूएई की सेना द्वारा दिखाई गई क्षमता का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अब बोझ माना जा रहा है, न कि रणनीतिक संपत्ति। इसलिए अब इन बेसों को बंद करने पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब **ईरान-अमेरिका युद्ध** के कारण पूरे पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है। खाड़ी क्षेत्र में यूएई को लंबे समय से ईरान का विरोधी और अमेरिका-इजरायल का करीबी सहयोगी माना जाता रहा है। लेकिन अब यूएई की तरफ से इस तरह की स्वतंत्र आवाज उठना न केवल क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
### अब्दुल्ला का साफ-साफ संदेश
अब्दुल खालिक अब्दुल्ला ने रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू और अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में कहा:
> “यूएई को अब अमेरिका की जरूरत नहीं है कि वह उसकी रक्षा करे। ईरानी आक्रामकता के दौरान हमने खुद को साबित कर दिया है कि हम अपनी रक्षा बखूबी कर सकते हैं। हमने जो प्रदर्शन किया, वह बेहद प्रभावशाली रहा।”
उन्होंने आगे जोड़ा:
> “यूएई को केवल अमेरिका से सबसे बेहतर और नवीनतम हथियार खरीदने की जरूरत है। इसलिए अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने के बारे में सोचने का समय आ गया है, क्योंकि वे अब रणनीतिक संपत्ति नहीं रहे, बल्कि एक बोझ बन गए हैं।”
डॉ. अब्दुल्ला, जो अबू धाबी क्राउन प्रिंस के पूर्व सलाहकार भी रह चुके हैं, ने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिकी बेसों की मौजूदगी यूएई को उन क्षेत्रीय संघर्षों में घसीट सकती है जिनमें उसका सीधा हित नहीं है। ईरानी हमलों के दौरान कई जगहों पर अमेरिकी ठिकानों की वजह से यूएई को निशाना बनाया गया, जिससे आर्थिक नुकसान भी हुआ।
### अल-धाफरा एयरबेस और अमेरिकी उपस्थिति
यूएई में अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें सबसे प्रमुख **अल-धाफरा एयरबेस** (Al Dhafra Air Base) है। यहां करीब 3,500 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। यह बेस अमेरिका, फ्रांस और यूएई के बीच साझा है और ईरान के खिलाफ अमेरिकी-इजरायली अभियानों में इस्तेमाल होता रहा है। ईरान ने हाल के हमलों में खाड़ी देशों में अमेरिकी या इससे जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया, जिससे यूएई को भी सीधा खतरा महसूस हुआ।
अब्दुल्ला का तर्क है कि ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों के ज्यादातर हमलों को यूएई ने अपनी एयर डिफेंस सिस्टम (अमेरिकी हथियारों की मदद से) से ही रोक लिया। अमेरिकी बेसों ने इसमें ज्यादा योगदान नहीं दिया, बल्कि उल्टा ईरान को हमला करने का “बहाना” मुहैया कराया।
### क्यों बदली यूएई की सोच?
विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान यूएई की बढ़ती **सैन्य आत्मनिर्भरता** और क्षेत्रीय सुरक्षा की नई वास्तविकताओं को दर्शाता है। पिछले वर्षों में यूएई ने अपनी सेना को आधुनिक बनाया है, उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम खरीदे हैं और क्षेत्रीय संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई है।
ईरान-अमेरिका युद्ध की पृष्ठभूमि में यूएई को महसूस हुआ कि अमेरिकी बेस अब सुरक्षा के बजाय खतरे का सबब बन सकते हैं। ट्रंप प्रशासन की “मैक्सिमम प्रेशर” नीति के तहत ईरान पर हमले शुरू होने के बाद खाड़ी देशों पर प्रतिशोधी हमले बढ़े, जिससे आर्थिक झटका लगा। यूएई की अर्थव्यवस्था पहले ही दशकों के सबसे बुरे संकट से गुजर रही है।
अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया कि भविष्य में यूएई को हथियार खरीदने तक संबंध सीमित रखने चाहिए, न कि विदेशी सैनिकों को अपनी जमीन पर बेस बनाने की अनुमति देनी चाहिए।
### ट्रंप प्रशासन पर क्या असर?
यह बयान डोनाल्ड ट्रंप के लिए चिंता का विषय बन सकता है। अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए यूएई जैसे सहयोगियों पर निर्भर है। अगर यूएई जैसे देश अमेरिकी बेसों पर सवाल उठाने लगें, तो पूरे क्षेत्र में “अमेरिकी उपस्थिति” पर बहस तेज हो सकती है।
सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देश भी इस बहस को ध्यान से देख रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह यूएई की बढ़ती स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत है, जहां अबू धाबी अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय चीन, रूस और अन्य शक्तियों के साथ भी संतुलित संबंध बनाना चाहता है।
### क्षेत्रीय प्रभाव और भारत की नजर
भारत के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। यूएई भारत का प्रमुख व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, निवेश, सुरक्षा और प्रवासी मुद्दों पर गहरे संबंध हैं। अगर खाड़ी में अमेरिकी बेसों पर बहस बढ़ी और तनाव बना रहा, तो तेल की कीमतें, शिपिंग मार्ग और क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
नई दिल्ली पहले से ही खाड़ी देशों के साथ अपनी “एक्ट ईस्ट” और “वेस्ट एशिया” नीति के तहत मजबूत कूटनीतिक संपर्क बनाए हुए है। यूएई की यह स्वतंत्र आवाज भारत को भी क्षेत्रीय सुरक्षा की नई वास्तविकताओं पर सोचने का मौका देती है।
### आगे क्या?
अब्दुल खालिक अब्दुल्ला का बयान व्यक्तिगत नहीं, बल्कि यूएई की ऊपरी नेतृत्व से जुड़े विचारों को प्रतिबिंबित करता माना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर अभी कोई बड़ा ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन बहस शुरू हो चुकी है।
विश्लेषक कहते हैं कि अगर यूएई अमेरिकी बेसों को सीमित या बंद करने की दिशा में कदम उठाता है, तो यह खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा वास्तुकला को पूरी तरह बदल सकता है। अमेरिका को तब नए सहयोगी या वैकल्पिक ठिकानों की तलाश करनी पड़ सकती है।
दूसरी ओर, ईरान इस बहस को अपने पक्ष में प्रचारित कर सकता है और कह सकता है कि खाड़ी देश अब अमेरिकी “कब्जे” से मुक्त होना चाहते हैं।
**निष्कर्ष:**
डॉ. अब्दुल खालिक अब्दुल्ला का बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं है – यह खाड़ी की नई भू-राजनीति का संकेत है। “हम खुद अपनी रक्षा कर सकते हैं” वाला आत्मविश्वास यूएई की बढ़ती ताकत को दिखाता है। लेकिन साथ ही यह अमेरिका-खाड़ी संबंधों में एक मोड़ भी साबित हो सकता है।
दुनिया अब देख रही है कि क्या यूएई अमेरिकी बेसों को “बोझ” मानकर उन्हें अलविदा कहने की राह पर बढ़ेगा, या यह सिर्फ एक रणनीतिक दबाव की रणनीति है। फिलहाल, पश्चिम एशिया में तनाव के बीच यह आवाज निश्चित रूप से गूंज रही है और भविष्य के समीकरणों को आकार देगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 25,2026